Verse 1
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिशूदन॥
अर्जुन ने कहा: हे महाबाहो, हे हृषीकेश, हे केशीहन्ता, मैं संन्यास और त्याग के वास्तविक तत्व को अलग-अलग समझना चाहता हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed Hrishikesha, slayer of the Keshi demon, I desire to understand the distinct principles of renunciation (Sannyasa) and abandonment of fruits (Tyaga).
Verse 2
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥
श्रीभगवान ने कहा: तत्वदर्शी ज्ञानी सकाम कर्मों के त्याग को संन्यास मानते हैं, और विचक्षण विद्वान सभी कर्मों के फलों के त्याग को ही त्याग कहते हैं।
The Supreme Lord said: Wise sages understand Sannyasa to be the relinquishment of actions performed for selfish desires, while the learned declare Tyaga to be the abandonment of the fruits of all actions.
Verse 3
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥
कुछ विचारक कहते हैं कि कर्म दोषयुक्त होते हैं इसलिए उन्हें त्याग देना चाहिए, जबकि अन्य मनीषियों का मत है कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए।
Some thinkers declare that all work should be abandoned as an evil, while other sages maintain that acts of sacrifice, charity, and austerity must never be given up.
Verse 4
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥
हे भरतश्रेष्ठ, इस त्याग के विषय में तुम मेरा पक्का निर्णय सुनो; हे पुरुषव्याघ्र, त्याग वास्तव में तीन प्रकार का कहा गया है।
Hear My decisive conclusion concerning this abandonment, O best of the Bharatas; for renunciation (Tyaga), O tiger among men, is declared to be of three kinds.
Verse 5
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥
यज्ञ, दान और तपस्या रूपी कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमान मनुष्यों को भी पवित्र करने वाले हैं।
Acts of sacrifice, charity, and penance should never be renounced but must be performed, for sacrifice, gift, and austerity purify even the wise.
Verse 6
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥
किन्तु हे पार्थ, इन सभी कर्मों को भी आसक्ति और फल की कामना छोड़कर केवल कर्तव्य मानकर करना चाहिए—यही मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
But even these activities must be executed without attachment and without longing for their fruits, O Partha; this is My decisive and supreme conviction.
Verse 7
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥
निर्धारित कर्तव्य-कर्मों का त्याग करना कभी उचित नहीं है; मोहवश ऐसे आवश्यक कर्मों का त्याग कर देना तामसिक त्याग कहा गया है।
The renunciation of obligatory duties is never justified; abandoning them out of sheer delusion is declared to be in the mode of ignorance (Tamasic).
Verse 8
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥
जो मनुष्य कर्म को कष्टप्रद मानकर शारीरिक क्लेश के भय से छोड़ देता है, वह ऐसा राजसिक त्याग करके त्याग के फल को कभी प्राप्त नहीं करता।
One who relinquishes duty merely because it is painful or out of fear of bodily discomfort performs a Rajasic renunciation and never attains the reward of true abandonment.
Verse 9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥
हे अर्जुन, जो निर्धारित कर्तव्य यह सोचकर किया जाता है कि 'इसे करना ही मेरा धर्म है', और जिसमें आसक्ति तथा फल की इच्छा छोड़ दी जाती है, वही सात्विक त्याग माना गया है।
When an obligatory work is performed solely because it ought to be done, giving up all attachment and reward, O Arjuna, that renunciation is deemed Sattvic.
Verse 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥
सत्त्वगुण में स्थित, बुद्धिमान और संशयरहित सच्चा त्यागी न तो अप्रिय कर्म से द्वेष करता है और न ही सुखदायी कर्म में आसक्त होता है।
The true renunciant imbued with purity, intelligent, and free from doubt, neither dislikes unfavorable work nor gets attached to pleasant work.
Verse 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥
किसी भी देहधारी प्राणी के लिए सभी कर्मों का पूर्ण त्याग कर पाना संभव नहीं है; अतः जो कर्मों के फल का त्याग करता है, वास्तव में वही सच्चा त्यागी कहलाता है।
Indeed, it is impossible for an embodied being to surrender action completely; therefore, one who abandons the fruits of action is truly called a renunciant.
Verse 12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥
कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों को मृत्यु के बाद बुरा, भला और मिश्रित—यह तीन प्रकार का फल भुगतना पड़ता है, किन्तु सच्चे त्यागियों को कभी कोई फल नहीं बांधता।
The threefold fruits of action—disagreeable, agreeable, and mixed—accrue after death to those who have not renounced, but never to true renunciants.
Verse 13
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥
हे महाबाहो, सांख्य दर्शन में सभी कर्मों की सिद्धि के लिए बताए गए इन पाँच कारणों को तुम मुझसे सुनो।
Learn from Me, O mighty-armed, these five factors declared in the Sankhya philosophy for the accomplishment of all actions.
Verse 14
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥
आधार (शरीर), कर्ता (जीवात्मा), विभिन्न प्रकार की इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की विविध चेष्टाएँ, और पाँचवाँ कारण दैव (प्रारब्ध या ईश्वरीय विधान) है।
The body (seat of action), the doer, the various senses, the manifold distinct efforts, and providence (divine will) as the fifth factor.
Verse 15
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥
मनुष्य शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी उचित या अनुचित कर्म आरंभ करता है, उसके यही पाँच कारण होते हैं।
Whatever action a person undertakes by body, speech, or mind, whether lawful or unlawful, these five are its causes.
Verse 16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥
ऐसा होने पर भी जो अशुद्ध बुद्धि वाला अज्ञानी केवल अपनी शुद्ध आत्मा को ही कर्ता समझता है, वह विकृत बुद्धि वाला व्यक्ति यथार्थ नहीं देखता।
Such being the case, whoever views the pure Self alone as the doer, owing to an untrained intellect, is misguided and does not see reality.
Verse 17
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
जिसके भीतर 'मैं कर्ता हूँ' का अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि सांसारिक परिणामों में लिप्त नहीं होती, वह इन सभी लोकों को मारकर भी वास्तव में न किसी को मारता है और न कर्म के बंधन में बंधता है।
One who is free from the notion of egoism and whose intellect is untainted, even if slaying all these beings, neither kills nor is bound by action.
Verse 18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥
ज्ञान, ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) और ज्ञाता—ये तीन कर्म की प्रेरणा देने वाले हैं; तथा इन्द्रियाँ, कर्म और कर्ता—ये तीन कर्म के संघटक अंग हैं।
Knowledge, the object of knowledge, and the knower constitute the threefold incentive to action; the instrument, the action itself, and the doer form the threefold basis of action.
Verse 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥
गुणों के भेद के आधार पर ज्ञान, कर्म और कर्ता भी तीन-तीन प्रकार के बताए गए हैं; तुम मुझसे उन्हें भी यथार्थ रूप में सुनो।
In the analysis of nature's modes, knowledge, action, and the doer are each declared to be of three types according to the qualities; listen duly to these as well.
Verse 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥
जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य अलग-अलग बंटे हुए समस्त प्राणियों में एक ही अविनाशी और अखंड परमात्मा को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्विक जानो।
Understand that knowledge to be Sattvic by which one sees a single imperishable and undivided divine reality present within all differentiated beings.
Verse 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥
परन्तु जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सभी प्राणियों में भिन्न-भिन्न रूपों और विविध प्रकार की आत्माओं को अलग-अलग देखता है, उस ज्ञान को तुम राजसिक जानो।
But know that knowledge to be Rajasic which perceives diverse entities of varied natures existing separately within different living beings.
Verse 22
यत्तुकृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥
जो ज्ञान बिना किसी युक्ति के किसी एक ही कार्य को सम्पूर्ण मानकर उसमें लिप्त हो जाता है और जो यथार्थ सत्य से रहित तथा तुच्छ है, वह तामसिक ज्ञान कहलाता है।
And that knowledge which clings blindly to a single trivial object as if it were all, without logic or underlying truth, is pronounced Tamasic.
Verse 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥
जो कर्म निर्धारित शास्त्रों के अनुसार, आसक्ति रहित होकर, राग-द्वेष के बिना और बिना फल की इच्छा रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया जाता है, वह सात्विक कहलाता है।
Action that is prescribed by scripture, performed without attachment, free from love and hatred, and done without desire for reward is called Sattvic.
Verse 24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥
किन्तु जो कर्म भोगों की इच्छा से, अहंकार के साथ और अत्यधिक शारीरिक व मानसिक परिश्रम उठाकर किया जाता है, वह राजसिक कर्म कहलाता है।
Action undertaken by one craving desires, prompted by egoism, and carried out with excessive strain and exertion is declared to be Rajasic.
Verse 25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥
जो कर्म भविष्य के परिणामों, हानि, दूसरों को होने वाली पीड़ा और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश शुरू किया जाता है, वह तामसिक कहलाता है।
Action begun in delusion, heedless of future consequences, loss of resources, injury to others, or one's own capability, is said to be Tamasic.
Verse 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त, अहंकार रहित वाणी बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से भरा हुआ तथा सफलता और असफलता में विकार-रहित रहता है, वह सात्विक कहलाता है।
A worker who is unattached, free from boastful ego, endowed with fortitude and enthusiasm, and unaffected by success or failure is said to be Sattvic.
Verse 27
रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥
जो कर्ता अत्यधिक आसक्त, कर्मफल का लोभी, लालची, दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाला, अपवित्र और सुख-दुःख में हर्ष व शोक से व्याकुल होने वाला है, वह राजसिक कहलाता है।
The agent who is full of passion, longing for fruits of work, greedy, hurtful, impure, and easily swept by joy and sorrow is proclaimed to be Rajasic.
Verse 28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥
जो कर्ता असंयमी, अशिक्षित (गंवार), घमंडी, कपटी, दूसरों का अपमान करने वाला, आलसी, सदा उदास रहने वाला और काम टालने वाला (दीर्घसूत्री) है, वह तामसिक कहलाता है।
An undisciplined, crude, stubborn, deceitful, malicious, indolent, despondent, and procrastinating agent is called Tamasic.
Verse 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥
हे धनंजय, अब तुम प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार बुद्धि और धृति (धैर्य) के भी तीन-तीन भेदों को मेरे द्वारा विस्तार से सुनो।
Hear now, O Dhananjaya, the threefold division of intellect and resolve according to the modes of nature, set forth completely and individually.
Verse 30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
हे पार्थ, जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग को, करने योग्य और न करने योग्य कर्म को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को ठीक-ठीक जानती है, वह बुद्धि सात्विकी है।
That intellect which discerns action and withdrawal, what ought to be done and what ought not, danger and safety, and bondage and liberation, O Partha, is Sattvic.
Verse 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥
हे पार्थ, जिसके द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को तथा करने योग्य और न करने योग्य कर्मों को यथार्थ रूप से नहीं समझ पाता, वह बुद्धि राजसी है।
That intellect which incorrectly differentiates between righteousness and unrighteousness, and between duty and non-duty, O Partha, is Rajasic.
Verse 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥
हे पार्थ, जो बुद्धि अंधकार से ढकी होने के कारण अधर्म को ही धर्म मान बैठती है और सभी बातों को उल्टे रूप में देखती है, वह बुद्धि तामसी है।
That intellect wrapped in darkness which imagines unrighteousness to be righteousness and views all things in a perverted light, O Partha, is Tamasic.
Verse 33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥
हे पार्थ, जिस अव्यभिचारी (अखंड) योगयुक्त धारणा शक्ति से मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को एकाग्र रखता है, वह धृति सात्विकी है।
That unwavering steadfastness by which one controls the activities of the mind, breath, and senses through Yoga, O Partha, is Sattvic.
Verse 34
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥
परन्तु हे अर्जुन, जिस धारण शक्ति से मनुष्य फल की तीव्र लालसा रखते हुए धर्म, अर्थ और काम को ही पकड़कर रखता है, वह धृति राजसी है।
But that tenacity by which one clings to duty, wealth, and sensual enjoyment with attachment and a craving for results, O Partha, is Rajasic.
Verse 35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥
हे पार्थ, जिस मूर्खतापूर्ण हठ से मंदबुद्धि मनुष्य नींद, भय, शोक, निराशा और उन्माद को नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है।
That stubborn resolve by which an ignorant mind refuses to let go of sleep, fear, grief, dejection, and pride, O Partha, is Tamasic.
Verse 36
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥
हे भरतश्रेष्ठ, अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो; जिस सुख में मनुष्य दीर्घकालीन अभ्यास से आनंद पाता है और जिससे दुखों का अंत हो जाता है—
Hear now from Me, O best of the Bharatas, concerning the threefold happiness in which one finds joy through constant practice and reaches the end of all suffering.
Verse 37
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्॥
जो सुख आरंभ में विष जैसा कष्टप्रद लगता है किन्तु परिणाम में अमृत के समान आनंद देता है, वह आत्मा और बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न सुख सात्विक कहलाता है।
That joy which feels like poison at first but tastes like nectar in the end, arising from the serenity of one's own self and intellect, is designated Sattvic.
Verse 38
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
जो सुख इन्द्रियों और विषयों के संयोग से आरंभ में अमृत जैसा स्वादिष्ट लगता है, किन्तु परिणाम में विष के समान दुखदायी सिद्ध होता है, वह राजसिक सुख माना गया है।
That pleasure which springs from contact of the senses with their objects, tasting sweet as nectar initially but proving like poison in the end, is remembered as Rajasic.
Verse 39
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्॥
जो सुख शुरू से लेकर अंत तक आत्मा को केवल भ्रमित रखने वाला है तथा जो नींद, आलस्य और असावधानी से पैदा होता है, वह तामसिक सुख कहलाता है।
That pleasure which deludes the soul from beginning to end, born of excessive sleep, sloth, and heedlessness, is described as Tamasic.
Verse 40
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥
पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग के देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से सर्वथा मुक्त हो।
There is no existing entity on earth or even among the gods in the celestial realms that is free from these three modes born of material nature.
Verse 41
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥
हे परंतप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्तव्य उनके अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर अलग-अलग निर्धारित किए गए हैं।
The duties of the intellectuals, rulers, merchants, and workers, O scorcher of foes, are apportioned according to the qualities born of their intrinsic nature.
Verse 42
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥
मन का संयम, इन्द्रियों का दमन, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, शास्त्रज्ञान, अनुभवजन्य ज्ञान और आस्तिकता—ये सभी ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
Serenity, sense restraint, austerity, purity, forgiveness, uprightness, knowledge, realization, and faith in the divine are the natural duties of the priestly class.
Verse 43
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्ध्ये चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥
शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से पीठ न दिखाना, उदार दानशीलता और नेतृत्व क्षमता—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
Valor, vigor, resolve, dexterity, refusal to flee from battle, generosity, and leadership constitute the natural duties of the warrior class.
Verse 44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥
खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं; तथा सेवाभाव से कार्य करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
Agriculture, cattle-rearing, and trade are the natural duties of the mercantile community, while service through physical work is the natural duty of the laborer class.
Verse 45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में निष्ठापूर्वक लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है; स्वधर्म में रत व्यक्ति जिस प्रकार सिद्धि पाता है, उसे सुनो।
Dedicated to one's own duty, a human being attains supreme fulfillment; listen now to how a person engaged in natural duties achieves perfection.
Verse 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
जिस परमात्मा से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सारा संसार व्याप्त है, उसकी अपने कर्तव्य-कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि पा लेता है।
By worshipping with one's own natural duty that Supreme Being from whom all beings originate and by whom this entire universe is pervaded, a person gains spiritual success.
Verse 47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
भली-भांति किए गए दूसरे के धर्म की अपेक्षा अपना स्वाभाविक धर्म त्रुटिपूर्ण होने पर भी श्रेष्ठ है; स्वभाव के अनुसार निर्धारित कर्म करने वाले को कोई पाप नहीं लगता।
Better is one's own natural duty, though imperfect, than another's duty performed to perfection; by executing work ordained by one's own nature, one incurs no guilt.
Verse 48
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
हे कुन्तीपुत्र, स्वाभाविक कर्म में यदि कोई दोष भी दिखाई दे तो भी उसे नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि जैसे अग्नि धुएं से ढकी रहती है, वैसे ही संसार के सभी कर्म किसी न किसी दोष से आवृत हैं।
One should not abandon inborn duty even if it has flaws, O son of Kunti, for all human undertakings are enveloped by imperfection, just as fire is shrouded by smoke.
Verse 49
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति॥
जिसकी बुद्धि सब ओर अनासक्त है, जिसने अपने मन को जीत लिया है और जिसकी सारी इच्छाएं शांत हो चुकी हैं, वह संन्यास (निष्काम भाव) द्वारा परम निष्कर्मता की सिद्धि प्राप्त कर लेता है।
One whose intellect is unattached anywhere, who has subdued the self, and is devoid of yearning attains through renunciation the supreme perfection of freedom from action.
Verse 50
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥
सिद्धि प्राप्त करने के बाद मनुष्य जिस प्रकार ज्ञान की परम निष्ठा स्वरूप परब्रह्म को प्राप्त होता है, उसे हे कुन्तीपुत्र, तुम संक्षेप में मुझसे समझो।
Learn from Me in brief, O son of Kunti, how one who has attained this perfection reaches the supreme Brahman, the ultimate stage of spiritual knowledge.
Verse 51
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥
शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग कर, राग-द्वेष को मिटाकर—
Endowed with pure intellect, controlling the self with firm resolve, casting off sensory attractions and aversions—
Verse 52
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥
एकांतवासी, अल्पाहारी, वाणी-शरीर-मन को शांत रखने वाला, नित्य ध्यानयोग में लीन, वैराग्य का आश्रय लेने वाला—
Dwelling in solitude, eating sparingly, subduing body, speech, and mind, constantly absorbed in meditation, anchored in dispassion—
Verse 53
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह का पूर्ण त्याग करके ममता-रहित एवं शांत रहने वाला साधक ब्रह्मभाव को प्राप्त करने का पात्र बन जाता है।
And discarding egoism, power, arrogance, lust, wrath, and possessiveness—serene and selfless, such a seeker is fit to attain union with Brahman.
Verse 54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
ब्रह्म भाव को प्राप्त प्रसन्नचित्त महापुरुष न किसी बात पर शोक करता है और न कोई कामना करता है; सब प्राणियों में समान भाव रखने वाला वह साधक मेरी परम पराभक्ति को प्राप्त होता है।
Having realized the divine Brahman and serene in spirit, one neither laments nor craves; viewing all beings with equal vision, that seeker attains supreme devotion unto Me.
Verse 55
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥
उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझे ठीक-ठीक जान लेता है कि मैं यथार्थ में कितना और क्या हूँ; फिर इस प्रकार तत्व से जानकर वह तत्काल मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है।
By supreme devotion alone does one truly know Me, what My extent and identity are in essence; and knowing Me in truth, that devotee forthwith enters into My being.
Verse 56
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
मेरा आश्रय लेने वाला कर्मयोगी सभी कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी असीम कृपा से उस सनातन, अविनाशी परम पद को प्राप्त हो जाता है।
Though performing all actions continually, one who takes complete refuge in Me reaches by My grace the eternal, imperishable supreme realm.
Verse 57
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥
तुम अपने सभी कर्मों को मन से मुझमें समर्पित करके, मुझे ही परम लक्ष्य मानते हुए समत्व-बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरंतर मुझमें चित्त लगाए रखो।
Mentally resigning all actions unto Me, holding Me as your highest goal, and resorting to the yoga of discernment, ever keep your mind fixed upon Me.
Verse 58
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
यदि तुम मुझमें मन लगाओगे, तो मेरी कृपा से संसार के सभी संकटों को पार कर जाओगे; किन्तु यदि अहंकारवश तुम मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम्हारा सर्वनाश हो जाएगा।
Fixing your consciousness upon Me, you shall overcome all obstacles by My grace; but if through self-conceit you will not listen, you shall perish.
Verse 59
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
यदि तुम अहंकार का आश्रय लेकर यह सोचते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है, क्योंकि तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव तुम्हें युद्ध करने के लिए विवश कर देगा।
If, relying upon your ego, you determine, "I will not fight," this resolution of yours is utterly vain; your own warrior nature will compel you to act.
Verse 60
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
हे कुन्तीपुत्र, अपने स्वाभाविक कर्मों के संस्कार से बंधे होने के कारण, जिस युद्ध को तुम मोहवश अभी नहीं करना चाहते, उसे भी विवश होकर करोगे।
Bound by your own duties born of your nature, O son of Kunti, that which you wish to avoid out of delusion, you shall be driven helplessly to do anyway.
Verse 61
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
हे अर्जुन, परमेश्वर समस्त प्राणियों के हृदय-प्रदेश में स्थित हैं और वे अपनी माया से सभी जीवों को इस प्रकार घुमाते हैं जैसे वे किसी यंत्र पर सवार हों।
The Supreme Lord abides in the hearts of all living beings, O Arjuna, directing their wanderings through His material energy, as though they were mounted on a machine.
Verse 62
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
हे भारत, तुम सम्पूर्ण भाव से केवल उसी ईश्वर की शरण में जाओ; उनकी कृपा से ही तुम परम शांति और उस सनातन परम धाम को प्राप्त करोगे।
Surrender unto Him alone with all your heart, O descendant of Bharata; by His grace you will attain supreme peace and the eternal dwelling place.
Verse 63
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥
इस प्रकार मैंने तुम्हें यह ज्ञान कह सुनाया जो रहस्यों में भी अत्यंत गोपनीय रहस्य है; अब तुम इस पर पूरी तरह विचार करो और फिर जैसा उचित समझो, वैसा करो।
Thus have I declared to you wisdom more profound than all secrets; reflect upon it thoroughly in its entirety, and then act as you choose.
Verse 64
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
सब रहस्यों में परम गोपनीय मेरे सर्वोच्च वचन को तुम पुनः सुनो; तुम मेरे अत्यंत प्रिय मित्र हो, इसलिए तुम्हारे परम हित के लिए मैं यह बात कहूँगा।
Listen once more to My supreme word, the most confidential truth of all; because you are dearly beloved to Me, I shall speak this for your ultimate welfare.
Verse 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
अपने मन को मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो और मुझे नमस्कार करो; ऐसा करने पर तुम निश्चित ही मुझे प्राप्त होगे—यह मेरी तुम्हारे प्रति सच्ची प्रतिज्ञा है, क्योंकि तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो।
Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice unto Me, bow down before Me; doing so, you shall surely come to Me—this is My solemn pledge to you, for you are beloved to Me.
Verse 66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सभी प्रकार के धर्मों और कर्तव्यों का आश्रय छोड़कर केवल मेरी एक की अनन्य शरण में आ जाओ; मैं तुम्हें समस्त पापों के बंधनों से मुक्त कर दूंगा, तुम शोक मत करो।
Abandoning all varieties of duty, surrender unto Me alone; I will deliver you from all sinful reactions, do not lament.
Verse 67
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥
यह गोपनीय ज्ञान तुम्हें कभी भी तपहीन व्यक्ति को, भक्तिहीन को, सेवा न करने की इच्छा रखने वाले को और जो मुझसे ईर्ष्या करता है, उसे नहीं बताना चाहिए।
This sacred teaching should never be disclosed by you to one devoid of penance, nor to one lacking devotion, nor to one unwilling to listen, nor to anyone who envies Me.
Verse 68
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥
जो मनुष्य मेरे इस परम गोपनीय रहस्य को मेरे भक्तों में प्रेमपूर्वक कहेगा, वह मेरी पराभक्ति को प्राप्त करके निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा।
Whoever shares this supreme secret among My devotees, out of great devotion unto Me, shall without doubt attain Me alone.
Verse 69
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥
मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला न तो कोई है, और न ही पृथ्वी पर उससे अधिक प्यारा मुझे कोई दूसरा होगा।
Nor is there anyone among human beings who does Me greater service than such a person, nor shall there be anyone on earth dearer to Me.
Verse 70
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥
जो व्यक्ति हमारे इस धर्ममय पावन संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा—यह मेरा विचार है।
And whoever studies this sacred dialogue of ours shall worship Me through the sacrifice of knowledge; such is My view.
Verse 71
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥
जो मनुष्य श्रद्धावान होकर और ईर्ष्या से रहित होकर इसे केवल सुन भी लेगा, वह भी पापों से छूटकर पुण्यवानों के पवित्र लोकों को प्राप्त करेगा।
Even the person who listens to this with reverent faith and an ungrudging heart shall be freed from evil and attain the auspicious realms of the virtuous.
Verse 72
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥
हे पार्थ, क्या तुमने इस ज्ञान को पूर्ण एकाग्र मन से सुना है? हे धनंजय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न सारा मोह नष्ट हो गया है?
Have you listened to this with an undivided mind, O Partha? Has your delusion born of ignorance been completely dispelled, O Dhananjaya?
Verse 73
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥
अर्जुन ने कहा: हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपने स्वरूप की स्मृति प्राप्त हो गई है; अब मैं संशय-रहित होकर स्थिर हूँ और आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
Arjuna said: My delusion is destroyed and I have regained memory by Your grace, O Achyuta; I stand firm, with all doubts resolved, ready to carry out Your command.
Verse 74
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥
संजय ने कहा: इस प्रकार मैंने भगवान वासुदेव और महात्मा पार्थ (अर्जुन) के बीच हुए इस अत्यंत अद्भुत और रोंगटे खड़े कर देने वाले संवाद को सुना।
Sanjaya said: Thus have I heard this extraordinary, hair-raising dialogue between the divine Vasudeva and the high-souled Arjuna.
Verse 75
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥
महर्षि वेदव्यास की विशेष कृपा से मैंने स्वयं योगेश्वर भगवान कृष्ण के मुख से प्रत्यक्ष कहे जाते हुए इस परम गोपनीय योग को सुना।
By the grace of Sage Vyasa I was blessed to hear this supreme mystic wisdom directly from the Lord of Yoga, Krishna Himself, as He spoke it.
Verse 76
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥
हे राजन् धृतराष्ट्र, भगवान केशव और अर्जुन के इस पावन और विस्मयकारी संवाद को बार-बार याद करके मैं क्षण-क्षण हर्षित हो रहा हूँ।
O King, recalling again and again this sacred and marvelous dialogue between Keshava and Arjuna, I rejoice at every moment.
Verse 77
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥
और हे राजन्, भगवान हरि के उस अत्यंत विलक्षण एवं विराट रूप का स्मरण कर-करके मुझे बड़ा आश्चर्य होता है और मैं बारम्बार आनंदित हो रहा हूँ।
And repeatedly remembering that exceedingly magnificent, cosmic form of Lord Hari, great is my wonder, O King, and I rejoice again and again.
Verse 78
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
जहाँ योगेश्वर भगवान कृष्ण हैं और जहाँ गांडीव-धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं लक्ष्मी, विजय, अलौकिक ऐश्वर्य और अचल नीति है—ऐसा मेरा पक्का विश्वास है।
Wherever there is Krishna, the Lord of Yoga, and wherever there is Partha, the wielder of the bow, there will surely be prosperity, victory, extraordinary splendor, and firm righteousness—such is my firm conviction.