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Read/Katha/Satyanarayan (Vishnu)
Satyanarayan (Vishnu) · Vrat Katha

श्री सत्यनारायण व्रत कथा

Shri Satyanarayan Vrat Katha

Complete five-chapter katha from Skanda Purana — with pujan samagri, vidhi and aarti

Pujan Samagri Pujan Vidhi Katha Aarti

Pujan Samagri

Lord Satyanarayan / Vishnu idol or picture
Kalash (copper pot filled with water, mango leaves, coconut)
Yellow or red cloth for the platform (chowki)
Mauli (yellow sacred thread) — to tie around kalash
Banana leaves — to decorate the puja area
Roli (kumkum) and Akshat (whole rice)
Haldi (turmeric) and Chandan (sandalwood paste)
Yellow and white flowers — with Tulsi garland (Tulsi is mandatory for Vishnu puja)
Dhoop (incense sticks) and Diya (ghee lamp)
Camphor (kapur) — for aarti
Panchamrit — milk, curd, ghee, honey and sugar
Fruits — banana, coconut, seasonal fruits
Sweets — peda, barfi
Prasad (Panjiri) ingredients: wheat flour (sawa measure), desi ghee, powdered sugar, ripe bananas, milk, cashews, raisins, tulsi leaves
Paan-supari (betel leaf and areca nut)
New sacred thread (janeu) — to offer to the Lord
Gangajal — for abhishek
Dakshina — as per ability, for the priest

Pujan Vidhi(2–3 घंटे / 2–3 hours)

1

Rise at dawn, bathe, and wear clean yellow or white clothes. Take the vrat sankalp (vow) while meditating on Lord Satyanarayan.

2

In the evening, spread yellow or red cloth on the chowki. Arrange mango leaves and establish the kalash — fill it with water, place mango leaves and a coconut on top, tie mauli around it.

3

Place Lord Satyanarayan's picture or idol on the chowki. Decorate with banana plants on both sides.

4

Prepare the Panjiri prasad: roast wheat flour in desi ghee until golden and fragrant. Let it cool, then mix powdered sugar, mashed ripe bananas, milk, cashews, raisins and tulsi leaves.

5

Begin with Ganesh Puja — invoke Lord Ganesha with flowers and akshat, seek his blessings to remove obstacles.

6

Invoke Lord Satyanarayan: 'Om Satyanarayanaya Namah — Avahayami.' Offer him the sixteen services (shodashopachara) — asana, padya, arghya, achaman, panchamrit abhishek, clean water bath, yellow cloth, janeu, chandan, tulsi garland, dhoop, diya, panjiri prasad, paan-supari, and dakshina.

7

Chant 'Om Namo Bhagavate Vasudevaya' 108 times and 'Om Shri Satyanarayanaya Namah' 108 times.

8

All family members and guests sit facing east, holding flowers and akshat. Listen to all five chapters of the Satyanarayan Katha with full devotion.

9

After each chapter, say: 'Shri Satyanarayan Bhagwan ki Jai!' Do not leave mid-katha — this is the most important rule.

10

After the katha, perform the aarti — Shri Satyanarayan Aarti and Om Jai Jagdish Hare. Distribute the panjiri prasad to everyone present. Never let anyone leave without prasad.

Sampurna Katha

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः॥ श्री गणेशाय नमः। श्री लक्ष्मी सहित सत्यनारायणाय नमः॥

Salutations to Lord Vasudeva. Obeisance to Lord Satyanarayan. Salutations to Lord Ganesha. Bowing to Lord Satyanarayan together with Goddess Lakshmi.

हे भगवान वासुदेव! आपको नमस्कार। श्री सत्यनारायण देव को प्रणाम। श्री गणेश जी को नमस्कार। लक्ष्मी सहित श्री सत्यनारायण भगवान को नमस्कार।

॥ प्रथम अध्याय ॥नारद-नारायण संवाद और व्रत का महत्व

एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा — 'हे प्रभु! इस कलियुग में थोड़े समय में ही पुण्य मिले और मनोवांछित फल प्राप्त हो जाए — ऐसा कोई उत्तम व्रत बताइए।' सूत जी बोले — 'जो व्रत नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था वही उत्तम व्रत मैं आपको बताऊँगा। ध्यान से सुनिए।'

Once at the holy forest of Naimisharanya, the sage Shaunaka and thousands of rishis gathered before Suta Ji and asked for an easy path to merit in the Kali age. Suta Ji agreed to share the sacred vrat that Narada Muni himself had learned from Lord Narayana.

एक बार नैमिषारण्य के पवित्र वन में शौनक आदि ऋषिगण सूत जी के पास एकत्रित हुए। उन्होंने कलियुग में आसानी से पुण्य प्राप्ति का मार्ग पूछा। सूत जी ने कहा कि जो व्रत नारद मुनि ने स्वयं भगवान नारायण से जाना वही मैं बताता हूँ।

योगीराज नारद जी एक समय अनेकों लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक में पधारे। यहाँ उन्होंने असंख्य प्राणियों को अपने कर्मों से उत्पन्न दुखों में पीड़ित देखा। उनके दुःख देखकर नारद जी ने सोचा — 'ऐसा कौन सा उपाय है जिससे इन प्राणियों के समस्त दुख दूर हो जाएं?' इसी चिंतन के साथ वे भगवान नारायण के विष्णुलोक में पहुँचे।

Narada Muni, wandering through all the worlds, came to earth and saw countless beings suffering from their own karma. Moved by their sorrow, he went to the heavenly abode of Lord Vishnu to seek a remedy.

नारद मुनि सम्पूर्ण लोकों में भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोक में आए और यहाँ के प्राणियों को कर्मजनित कष्टों में पीड़ित देखा। प्राणियों के दुख से द्रवित होकर वे भगवान विष्णु के धाम में गए।

विष्णुलोक में नारद जी ने चतुर्भुज भगवान नारायण — जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे — उनकी स्तुति की। भगवान ने प्रसन्न होकर पूछा — 'हे मुनिश्रेष्ठ! आप किस प्रयोजन से पधारे हैं?' नारद जी बोले — 'प्रभु! पृथ्वीलोक के प्राणी अनेक दुखों से पीड़ित हैं। कृपया कोई सुगम उपाय बताइए।' भगवान श्रीहरि बोले — 'हे नारद! श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत सबसे श्रेष्ठ है। यह व्रत करने से मनुष्य इसी जन्म में सुख पाता है और मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है।'

Narada prayed to Lord Vishnu. The Lord, pleased with his devotion, revealed the Satyanarayan Vrat as the supreme remedy — one that brings worldly happiness in this life and liberation after death.

नारद जी ने विष्णु भगवान की स्तुति की। भगवान ने उनके प्रश्न पर श्री सत्यनारायण व्रत का वर्णन किया और बताया कि यह व्रत इस जन्म में सुख और मृत्यु के बाद मोक्ष देता है।

भगवान ने व्रत की विधि बताई — 'हे नारद! शाम के समय परिजनों के साथ भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण का पूजन करो। गेहूँ का आटा, केले, घी, दूध और शक्कर सवाया लेकर प्रसाद (पंजीरी) बनाओ। तुलसी दल अवश्य चढ़ाओ — बिना तुलसी के यह पूजन अधूरा है। कथा श्रवण करो और सभी को प्रसाद वितरित करो।' ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥

The Lord explained the method: in the evening with family, prepare panjiri prasad with the prescribed sawa (1.25x) measure, offer tulsi, listen to the katha, and distribute prasad to all present. First chapter complete.

भगवान ने व्रत की पूरी विधि समझाई — शाम को परिवार सहित सवाया सामग्री से पंजीरी बनाकर, तुलसी अर्पित कर, कथा सुनकर और सभी को प्रसाद देकर यह व्रत करें।

॥ द्वितीय अध्याय ॥निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारे की कथा

सूत जी बोले — 'हे ऋषियों! सुनो — किसने सबसे पहले इस व्रत को किया था।' सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख-प्यास से परेशान वह भिक्षा के लिए धरती पर भटकता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम रखने वाले भगवान ने एक दिन वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर उससे पूछा — 'हे विप्र! तुम नित्य दुखी होकर क्यों भटकते हो?'

Suta Ji narrated the story of a very poor Brahmin in Kashi. One day, Lord Vishnu himself, disguised as an old Brahmin, approached him and asked why he wandered in misery every day.

काशी के एक निर्धन ब्राह्मण की बात सुनाते हुए सूत जी ने बताया — वह ब्राह्मण अत्यंत गरीब था। एक दिन स्वयं भगवान ने वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उससे उसके दुख का कारण पूछा।

दीन ब्राह्मण बोला — 'मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिए घूमता हूँ। यदि आप कोई उपाय जानते हों तो बताइए।' वृद्ध ब्राह्मण बने भगवान ने कहा — 'श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं। उनका व्रत करो — इससे तुम सभी दुखों से मुक्त होकर धनवान बन जाओगे।' यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। उस रात ब्राह्मण को नींद नहीं आई। प्रातः उठकर भिक्षा के लिए गया — उस दिन इतना धन मिला जितना पहले कभी नहीं मिला था।

The Brahmin described his poverty. The divine old man instructed him to observe the Satyanarayan Vrat and disappeared. The next morning the Brahmin went begging and received an unusually abundant sum.

ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता बताई। वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान ने सत्यनारायण व्रत का उपदेश दिया और अंतर्धान हो गए। अगले दिन उसे पर्याप्त भिक्षा मिली।

ब्राह्मण ने उस धन से परिजनों के साथ श्री सत्यनारायण व्रत पूर्ण विधि से संपन्न किया। व्रत के प्रभाव से वह समस्त दुखों से मुक्त हो गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से संपन्न हो गया। तब से वह हर माह यह व्रत करने लगा। लकड़हारे की कथा: एक बार उसी ब्राह्मण के घर व्रत हो रहा था। एक वृद्ध लकड़हारा लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर आया। प्यास से व्याकुल उसने पूछा — 'यह क्या हो रहा है?' ब्राह्मण ने व्रत की महिमा बताई। लकड़हारे ने प्रसाद ग्रहण किया और चला गया।

The Brahmin performed the vrat with his family and was freed from poverty, becoming wealthy. He began observing it monthly. A woodcutter who came to his house learned about the vrat and received prasad.

व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण धनवान हो गया और प्रति माह व्रत करने लगा। एक लकड़हारे ने व्रत के बारे में सुना और प्रसाद ग्रहण किया।

लकड़हारे ने संकल्प किया — 'आज जो धन मिलेगा उससे सत्यनारायण भगवान का व्रत करूँगा।' वह नगर गया और उस दिन लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना मिला। प्रसन्न होकर उसने घी, शक्कर, गेहूँ का आटा, केले लेकर परिजनों के साथ विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया। भगवान की कृपा से वह धन-पुत्र से युक्त होकर संसार के सुख भोगता हुआ अंतकाल में बैकुंठ धाम को गया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥

The woodcutter resolved to perform the vrat that very day. His timber fetched four times the usual price. He performed the vrat faithfully and ultimately attained liberation in Vaikuntha.

लकड़हारे ने व्रत का संकल्प लिया। उसी दिन चार गुना धन मिला। उसने विधिपूर्वक व्रत किया और अंत में बैकुंठ को गया।

॥ तृतीय अध्याय ॥साधु वैश्य, लीलावती और कलावती की कथा

भद्रशीला नदी के तट पर राजा उल्कामुख अपनी पत्नी के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य — जो व्यापार के लिए वहाँ से गुजर रहा था — ने राजा को पूछा — 'राजन! यह व्रत क्या है?' राजा ने पुत्रप्राप्ति के लिए किए जाने वाले इस व्रत का वर्णन किया। निःसंतान साधु ने सुनकर कहा — 'राजन! मेरी भी संतान नहीं है। जब संतान होगी तब मैं यह व्रत करूँगा।'

King Ulkamukha was performing the Satyanarayan Vrat on the riverbank. The merchant Sadhu, passing by, learned of the vow and promised to perform it himself when he was blessed with a child.

राजा उल्कामुख नदी तट पर व्रत कर रहे थे। वहाँ से गुजरते साधु वैश्य ने व्रत का महत्व जाना। उसने संकल्प लिया कि संतान होने पर वह भी यह व्रत करेगा।

भगवान की कृपा से साधु वैश्य की पत्नी लीलावती गर्भवती हुई। दसवें महीने उनके घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ जिसे माता-पिता ने 'कलावती' नाम दिया। वह दिनोंदिन शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह बढ़ने लगी। लीलावती ने पति को याद दिलाया — 'आपने व्रत का संकल्प लिया था।' साधु बोला — 'इसके विवाह पर करूँगा।' और नगर चला गया। कलावती के विवाह पर भी साधु ने व्रत नहीं किया। इस पर भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गए।

Through the Lord's grace, the merchant Sadhu was blessed with a daughter named Kalavati. Despite his wife Lilavati's repeated reminders, he kept postponing the vrat. First he said 'at her birth,' then 'at her wedding.' Lord Satyanarayan became displeased.

साधु के यहाँ कलावती का जन्म हुआ। पत्नी ने बार-बार व्रत की याद दिलाई पर साधु ने पहले पुत्री के जन्म पर, फिर विवाह पर करने का टाल-मटोल किया। भगवान रुष्ट हो गए।

साधु जमाई को लेकर व्यापार के लिए रत्नासारपुर गया। भगवान की माया से एक चोर ने राजा का धन चुराया और उसे साधु के पड़ाव के पास छोड़ भागा। सिपाहियों ने धन साधु के पास देखकर ससुर-जमाई दोनों को बंदी बना लिया। राजा ने उन्हें कठिन कारावास में डाल दिया। घर में जो धन था वह चोर चुरा ले गए। साधु की पत्नी लीलावती अत्यंत दुखी हो गई।

By divine play, Sadhu and his son-in-law were falsely implicated in a theft and imprisoned. Their wealth was also stolen. The entire family fell into distress — the consequence of breaking the vow.

भगवान की माया से साधु और उसके दामाद पर चोरी का झूठा आरोप लगा और दोनों जेल में डाल दिए गए। घर का धन भी चोरी हो गया।

दुखी कलावती एक ब्राह्मण के घर गई जहाँ सत्यनारायण व्रत हो रहा था। उसने कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण किया। घर लौटकर माता को बताया। लीलावती ने तुरंत व्रत किया और वर माँगा — 'मेरे पति और जमाई शीघ्र घर लौटें।' उसी रात राजा को स्वप्न आया — 'साधु निर्दोष है। उसे कल सवेरे छोड़ दो नहीं तो तेरा राज्य नष्ट होगा।' राजा ने प्रातः दोनों को मुक्त किया और उनका धन वापस किया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तृतीय अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥

Kalavati heard the katha at a neighbour's home. Lilavati performed the vrat that very night. That same night the king received a divine dream commanding him to release Sadhu. Both were freed and their wealth restored.

कलावती ने सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी। लीलावती ने व्रत किया। उसी रात राजा को स्वप्न में आदेश मिला और साधु तथा दामाद को रिहा कर दिया गया।

॥ चतुर्थ अध्याय ॥प्रसाद की अवज्ञा और कलावती का दण्ड

मुक्त होने के बाद साधु वैश्य नाव लेकर अपने नगर की ओर चले। कुछ दूर जाने पर दण्डी वेश में भगवान सत्यनारायण मिले और पूछा — 'नाव में क्या है?' अभिमान में आकर साधु ने हँसते हुए कहा — 'देखते नहीं? बेल और पत्ते हैं।' भगवान बोले — 'तुम्हारा वचन सत्य हो!' — और चले गए। दण्डी के जाने पर साधु ने नाव में देखा तो सच में बेल-पत्ते भरे थे। वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

On the way home, Lord Satyanarayan appeared as an ascetic. In arrogance, Sadhu lied that his boat contained only leaves. The Lord made it so — the boat filled with leaves instead of goods.

घर जाते समय भगवान दण्डी वेश में मिले। साधु ने अहंकार में असत्य वचन कहे कि नाव में बेल-पत्ते हैं। भगवान ने वैसा ही कर दिया।

दामाद ने कहा — 'यह दण्डी (भगवान) का शाप है। हमें उनकी शरण में जाना चाहिए।' साधु भगवान के पास गया और विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगी — 'हे प्रभु! मेरे असत्य वचन के लिए क्षमा करें। मैं अज्ञानी हूँ।' भगवान प्रसन्न हुए और वरदान दिया — नाव में धन वापस भर गया। अब साधु नगर के पास पहुँचा और दूत को घर भेजा।

On his son-in-law's advice, Sadhu humbly sought forgiveness. The Lord was pleased and restored the wealth to the boat. Sadhu approached his city and sent a messenger home.

दामाद की सलाह पर साधु ने भगवान से क्षमा माँगी। भगवान ने नाव में धन वापस कर दिया। साधु नगर के पास पहुँचा।

लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण पूजन किया। फिर कलावती से कहा — 'तू कार्य पूरा करके शीघ्र आ।' कलावती जल्दी में प्रसाद लिए बिना ही पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा से भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित कलावती के पति को जल में डुबो दिया। कलावती पति को वहाँ न पाकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। तब आकाशवाणी हुई — 'हे साधु! कलावती प्रसाद छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हुआ। वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करे तो उसे पति मिलेगा।' कलावती घर जाकर प्रसाद ग्रहण किया — पति प्रकट हो गया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥

Kalavati rushed to her husband without taking prasad. The Lord made her husband vanish. A divine voice announced: 'She left the prasad; let her return and accept it.' Kalavati received the prasad and her husband reappeared. Lesson: Never disrespect the Lord's prasad.

कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़कर गई। भगवान ने उसके पति को अदृश्य कर दिया। आकाशवाणी से ज्ञात हुआ — प्रसाद ग्रहण करो तो पति मिलेगा। कलावती ने प्रसाद लिया और पति मिल गया। सीख: प्रसाद की कभी अवज्ञा न करें।

॥ पंचम अध्याय ॥राजा तुंगध्वज की कथा — अभिमान का दण्ड और भक्ति की जय

सूत जी बोले — 'हे ऋषियों! एक और कथा सुनो।' तुंगध्वज नाम का एक राजा था जो वन में शिकार कर लौट रहा था। राह में उसने एक वृक्ष के नीचे ग्वालों को भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। राजा ने अहंकारवश उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में न गया, न भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने प्रेमपूर्वक प्रसाद दिया — पर राजा ने अभिमान से प्रसाद वहीं छोड़ दिया और अपने नगर को चल दिया।

King Tungadhwaja, returning from hunting, saw cowherds performing the Satyanarayan Vrat. In his arrogance he neither bowed nor accepted their offered prasad, and left it behind.

राजा तुंगध्वज शिकार से लौटते हुए ग्वालों को सत्यनारायण पूजन करते देखा। अभिमान में उसने न नमस्कार किया और न प्रसाद ग्रहण किया।

नगर में पहुँचते ही राजा को पता चला — उसके सौ पुत्र मर गए, खजाना लुट गया, राज्य में विपदाएं आ गईं। राजा समझ गया — यह भगवान सत्यनारायण की अवज्ञा का परिणाम है। वह दौड़कर उन ग्वालों के पास पहुँचा जहाँ अभी भी पूजा चल रही थी। उसने विधिपूर्वक व्रत किया और श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से राजा के पुत्र जीवित हो गए, धन वापस मिला और राज्य पुनः समृद्ध हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगकर अंत में राजा स्वर्गलोक को गया।

Returning home, Tungadhwaja found all 100 of his sons dead and his kingdom in ruin. He quickly returned to the cowherds, performed the vrat with full devotion and accepted the prasad. The Lord restored his sons, wealth and kingdom. He lived happily and attained heaven.

राजा के सौ पुत्र मर गए और राज्य उजड़ गया। राजा लौटकर व्रत किया और प्रसाद ग्रहण किया। सब कुछ पूर्ववत हो गया और अंत में स्वर्ग मिला।

सूत जी बोले — 'जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को श्रद्धा से करेगा उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी, निर्धन धनी होगा, संतानहीन को संतान मिलेगी और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। पाँचों व्रत के पात्रों ने अगले जन्मों में भी भगवान की कृपा पाई — वृद्ध ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में, लकड़हारे ने निषाद के रूप में, राजा उल्कामुख ने दशरथ के रूप में, साधु वैश्य ने मोरध्वज के रूप में और राजा तुंगध्वज ने स्वयंभू रूप में मोक्ष प्राप्त किया।' ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण ॥ ॥ इति सम्पूर्ण श्री सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्ण ॥ श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥

The summary: all the characters who performed this vrat received divine grace — not only in this life but across future births too. The vrat bestows wealth, children, happiness and ultimate liberation. The complete Satyanarayan Katha ends here.

कथा का सार: इस व्रत के सभी पात्रों को इस जन्म और अगले जन्मों में भी भगवान की कृपा मिली। व्रत से धन, संतान, सुख और मोक्ष — सब मिलता है।

Aarti

MAIN AARTI

ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे

Full Aarti →

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

O Sovereign Lord of the entire universe, victory to You! You dispel the distress and hardships of Your devotees and servants in a single moment.

हे संपूर्ण जगत् के स्वामी ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के कष्टों तथा संकटों को एक क्षण में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

Whoever meditates upon You receives the fruits of their devotion, and the sorrow of their mind vanishes. Peace and prosperity enter their home, and physical afflictions are erased.

जो आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और उसके मन का दुख दूर हो जाता है। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

You alone are my mother and my father; whose refuge else should I seek? There is no other besides You in whom I can place my hope.

आप ही मेरे माता और पिता हैं, मैं आपके सिवा किसकी शरण में जाऊं? आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई आशा रखूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

You are the perfect Supreme Consciousness, the inner knower of all hearts. You are the Supreme Cosmic Reality, the Sovereign Master of all.

आप परिपूर्ण परमात्मा और सभी के हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

You are an ocean of compassion and the sustainer of all creation. I am ignorant and filled with worldly desires; O Provider, bestow Your grace upon me.

आप दया और करुणा के सागर हैं तथा संपूर्ण जगत् के पालनहार हैं। मैं अज्ञानता और कामनाओं से घिरा हुआ हूँ, हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

You are beyond sensory perception and the Lord of every living soul. O Merciful One, how can a seeker of limited intellect like me attain You?

आप इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं और सभी जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु प्रभु! मुझ जैसा सीमित बुद्धि वाला जीव आपको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

दीन-बंधु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

You are the friend of the helpless and the remover of grief; You are my Lord. I lie at Your doorstep—reach out Your hands and lift me up.

आप दीनों के बंधु और दुखों का हरण करने वाले मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अपना कृपाहस्त उठाकर मुझे संभालिए।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

O Lord, eradicate worldly attachments from my mind and remove my sins. Nurture within me deep faith, devotion, and the spirit of service toward the virtuous.

हे देव! मेरे मन के विषय-विकारों और पापों को नष्ट कर दीजिए। मेरे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सत्पुरुषों की सेवा की भावना को बढ़ाइए।

तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

My body, mind, and worldly wealth all belong to You. I surrender back to You what is already Yours; what is truly mine to claim?

मेरा शरीर, मन और धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। जो आपका है, वही आपको समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना क्या है?

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