स्कंद पुराण से प्रदोष काल शिव पूजन एवं दरिद्रता-निवारण पावन कथा
सम्पूर्ण कथा
सूत उवाच— प्रदोषकाले महद्देवं ये पूजयन्ति मानवाः। न तेषां दुर्लभं किञ्चिद् इह लोके परत्र च॥ पूजिते शङ्करे देवे प्रदोषे नृपसत्तम। दारिद्र्यं शमनं याति पापानि सुमहन्त्यपि॥
सूत जी ने कहा— जो मनुष्य प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में देवाधिदेव भगवान शिव का पूजन करते हैं, उनके लिए इस लोक और परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। हे राजन्! प्रदोष काल में भगवान शंकर की पूजा करने से घोर दरिद्रता का नाश होता है और बड़े से बड़े पापों का शमन हो जाता है। (आज के प्रदोष मुहूर्त हेतु हमारी प्रदोष व्रत गाइड [Pradosh Observance](/festival/pradosh) देखें)।
पुरा विदर्भनगरे विधवा ब्राह्मणी गृहे। पुत्रेण सहिता दीना भिक्षां कृत्वा व्यजीवत्॥ शाण्डिल्यमुनिना दृष्टा प्रदोषव्रतमादिशत्। व्रतप्रभावात्पुत्रोऽयं राजकुमार्यमवाप्तवान्॥
प्राचीन काल में विदर्भ नगर में एक निर्धन विधवा ब्राह्मणी अपने छोटे बालक के साथ भिक्षा मांगकर जीवन व्यतीत करती थी। महर्षि शांडिल्य ने उसकी दयनीय दशा देखकर उसे प्रदोष व्रत का उपदेश दिया। ब्राह्मणी और उसके पुत्र ने पूर्ण श्रद्धा से प्रदोष व्रत किया, जिसके प्रभाव से बालक को राजपद और राजकुमारी से विवाह का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
कैलासशैले नवविप्रगेहे प्रदोषकाले हरिसिद्धसेविते। नृत्यत्यथो शम्भुमुदा महेशः सर्वे च देवाः प्रणमन्ति भक्त्या॥
प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर आनंद तांडव नृत्य करते हैं। उस समय ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र आदि समस्त देवी-देवता भगवान शिव की स्तुति और वंदना करते हैं। इसलिए प्रदोष काल की शिव पूजा अनंत फलदायी मानी गई है।
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