भगवान श्री शिव और माता पार्वती की कृपा प्रदान करने वाली सोलह सोमवार व्रत कथा
सम्पूर्ण कथा
एकदा श्रीकैलासगिरौ पार्वतीपरमेश्वरौ। मर्त्यलोकविहाराय अमरावतीं पुरं गतौ॥ तत्र देवकुले रम्ये शिवयोः क्रीडनं जातम्। चौपड़ं क्रीडतोस्तत्र विवादः समजायत॥
एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत से मृत्युलोक के भ्रमण हेतु अमरावती नगरी में आए। वहाँ एक सुंदर शिवालय में भगवान शिव और पार्वती जी विश्राम करने लगे और चौपड़ (पासे का खेल) खेलने लगे। खेल के दौरान दोनों में जय-पराजय को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।
पुजारी ब्राह्मणस्तत्र साक्षित्वे स्थापितो रमे। तेन छलपूर्वाद् वाक्ये शिवस्य विजयो गदितः॥ पार्वत्याः शापतो विप्रो महारोगसमन्वितः। सोमवारव्रतं कृत्वा शापान्मुक्तः सुखी भवेत्॥
मंदिर के पुजारी ब्राह्मण को साक्ष्य (साक्षी) बनाया गया। पुजारी ने पक्षपात करते हुए बिना सोचे-समझे भगवान शिव की विजय घोषित कर दी। इस असत्य भाषण से रुष्ट होकर माता पार्वती ने पुजारी को कोढ़ (महारोग) का शाप दे दिया। पश्चात् अप्सराओं के उपदेश से पुजारी ने १६ सोमवार का व्रत किया और शाप से मुक्त होकर नीरोग हो गया।
सोमवारे शुचौ स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। आराध्य व्यम्बकं देवं लभते वाञ्छितं फलम्॥ षोडशैव तु सोमवाराः सर्वकामप्रदायकाः। शिवलोकमवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
जो मनुष्य पवित्र होकर सोमवार के दिन स्नान करके त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। १६ सोमवार का यह व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और अंत में मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है।
आरती
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