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पाठ/कथा/Shiva & Parvati
Shiva & Parvati · व्रत कथा

सोलह सोमवार व्रत कथा

भगवान श्री शिव और माता पार्वती की कृपा प्रदान करने वाली सोलह सोमवार व्रत कथा

सम्पूर्ण कथा आरती

सम्पूर्ण कथा

एकदा श्रीकैलासगिरौ पार्वतीपरमेश्वरौ। मर्त्यलोकविहाराय अमरावतीं पुरं गतौ॥ तत्र देवकुले रम्ये शिवयोः क्रीडनं जातम्। चौपड़ं क्रीडतोस्तत्र विवादः समजायत॥

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत से मृत्युलोक के भ्रमण हेतु अमरावती नगरी में आए। वहाँ एक सुंदर शिवालय में भगवान शिव और पार्वती जी विश्राम करने लगे और चौपड़ (पासे का खेल) खेलने लगे। खेल के दौरान दोनों में जय-पराजय को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया।

पुजारी ब्राह्मणस्तत्र साक्षित्वे स्थापितो रमे। तेन छलपूर्वाद् वाक्ये शिवस्य विजयो गदितः॥ पार्वत्याः शापतो विप्रो महारोगसमन्वितः। सोमवारव्रतं कृत्वा शापान्मुक्तः सुखी भवेत्॥

मंदिर के पुजारी ब्राह्मण को साक्ष्य (साक्षी) बनाया गया। पुजारी ने पक्षपात करते हुए बिना सोचे-समझे भगवान शिव की विजय घोषित कर दी। इस असत्य भाषण से रुष्ट होकर माता पार्वती ने पुजारी को कोढ़ (महारोग) का शाप दे दिया। पश्चात् अप्सराओं के उपदेश से पुजारी ने १६ सोमवार का व्रत किया और शाप से मुक्त होकर नीरोग हो गया।

सोमवारे शुचौ स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते। आराध्य व्यम्बकं देवं लभते वाञ्छितं फलम्॥ षोडशैव तु सोमवाराः सर्वकामप्रदायकाः। शिवलोकमवाप्नोति सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥

जो मनुष्य पवित्र होकर सोमवार के दिन स्नान करके त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मनोवांछित फल प्राप्त करता है। १६ सोमवार का यह व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और अंत में मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है।

आरती

मुख्य आरती

ॐ जय शिव ओंकारा

पूरी आरती →

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

हे ओमकार स्वरूप भगवान शिव! आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के रूप हैं, और माता पार्वती को अपने आधे अंग में धारण करते हैं।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। स्वामी पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पांच मुख वाले (शिव) रूप में सुशोभित हैं। हंस, गरुड़ और नंदी वृषभ आपके स्वरूपों के वाहन हैं।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। स्वामी दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आपकी दो, चार और दस भुजाओं वाले स्वरूप अत्यंत सुशोभित होते हैं। आपके तीनों गुणों से युक्त स्वरूप को देखकर तीनों लोकों के प्राणी मोहित हो जाते हैं।

अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी। स्वामी मुंडमाला धारी। त्रिपुरारि कंसारि मदहारी मारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुंडों की माला धारण करते हैं। आप त्रिपुरासुर का नाश करने वाले, दैत्यों का अंत करने वाले और अहंकार का मर्दन करने वाले हैं।

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे। स्वामी बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप श्वेतांबर, पीतांबर और बाघ की छाल (बाघंबर) धारण करते हैं। सनकादि ऋषि, गरुड़ और भूत-गण सदैव आपके संग रहते हैं।

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धरता। स्वामी चक्र त्रिशूल धरता। जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप अपने हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल धारण करते हैं। आप ही इस जगत् की रचना करने वाले, पालन करने वाले और संहार करने वाले हैं।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अज्ञानी मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और शिव को पृथक् मानते हैं। वास्तव में, ओंकार (प्रणव) के भीतर ये तीनों त्रिदेव एक ही परम तत्त्व हैं।

काशी में विश्वनाथ विराजे नंदी ब्रह्मचारी। स्वामी नंदी ब्रह्मचारी। नित्य उठ दर्शन पावे महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में भगवान विश्वनाथ के रूप में आप विराजमान हैं और नंदी ब्रह्मचारी आपके द्वार पर विराजते हैं। जिनका नित्य दर्शन करने से अत्यंत भारी महिमा और पुण्य मिलता है।

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

जो भी मनुष्य तीनों गुणों के स्वामी भगवान शिव की इस आरती का गायन करता है, स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वह अपनी मनोवांछित इच्छाओं की पूर्ति पाता है।

अन्य आरतियाँ

सुख करता दुख हरता

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सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची। सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥

जय अम्बे गौरी

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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥