एक सेठ के परिवार की कथा — भगवान शिव की कृपा से सब कुछ सुधर गया — सोमवार व्रत की सम्पूर्ण कथा
पूजन सामग्री
पूजन विधि(पूर्ण दिवस / Full day fast)
सोमवार को सूर्योदय से पहले उठें। स्नान कर श्वेत या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। संकल्प लें — 'मैं भगवान शिव की कृपा प्राप्ति हेतु सोमवार व्रत करता/करती हूँ।'
चौकी पर शिवलिंग या शिव जी का चित्र स्थापित करें। चारों ओर बिल्व पत्र और ताजे सफेद फूल सजाएं।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करें, फिर शुद्ध गंगाजल से। स्वच्छ वस्त्र से पोंछें।
भस्म, बिल्व पत्र, सफेद फूल, सफेद तिल अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं।
रुद्राक्ष माला से 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें। महामृत्युंजय मंत्र का 11 बार जाप करें।
पूर्ण ध्यान से सोमवार व्रत कथा सुनें या पढ़ें। कथा के मध्य उठकर न जाएं।
कथा के बाद शिव आरती करें। सभी को सफेद प्रसाद (खीर या नारियल बर्फी) वितरित करें।
दिनभर उपवास रखें — सूर्यास्त पर एक समय बिना नमक का भोजन करें। फल-दूध कभी भी ले सकते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
सम्पूर्ण कथा
ॐ नमः शिवाय॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
भगवान शिव को नमस्कार। हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पोषक भगवान शिव की पूजा करते हैं। जैसे ककड़ी अपनी लता से मुक्त होती है वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें — अमरत्व की ओर ले जाएं।
किसी नगर में एक धनी सेठ रहता था। उसकी भगवान शिव में अटूट आस्था थी और वह प्रति सोमवार व्रत रखता था। उसकी पत्नी भी इस व्रत में सहभागी होती थी। सेठ के यहाँ धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी, पर एक दुख था — उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी चिंता से दुखी होकर सेठ ने शिव मंदिर में जाकर विशेष उपवास और पूजन किया।
एक धनी सेठ नियमित सोमवार व्रत करता था। उसके पास सब कुछ था — धन, सम्मान — पर संतान नहीं थी। इस दुख से पीड़ित होकर उसने भगवान शिव की विशेष आराधना की।
माता पार्वती ने सेठ की भक्ति देख प्रसन्न होकर भगवान शिव से निवेदन किया — 'हे प्राणनाथ! यह सेठ बड़ा भक्त है। इसे पुत्र का वरदान दीजिए।' शिव जी बोले — 'हे देवी! इसके भाग्य में संतान नहीं है। परंतु तुम्हारी विनती पर मैं इसे एक पुत्र दूंगा — किंतु वह पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा।' पार्वती जी ने यह बात मान ली और देव-कृपा से सेठ के घर एक पुत्र का जन्म हुआ।
माता पार्वती ने भगवान शिव से सेठ को पुत्र देने की विनती की। शिव जी ने पुत्र का वरदान तो दिया, परंतु साथ ही कहा कि वह बारह वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।
पुत्र के ग्यारह वर्ष पूर्ण होने पर सेठ ने उसे काशी में पढ़ाई के लिए भेजा। रास्ते में वे बालक के मामा के घर रुके। वहाँ यज्ञ हो रहा था। बालक ने यज्ञ में भाग लिया और काशी की ओर चल पड़ा। मार्ग में बालक बीमार पड़ गया और उसी रात उसकी मृत्यु हो गई। उसके साथी और मामा शोक में डूब गए।
बारह वर्ष पूरे होने पर बालक काशी जाते समय मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। सभी परिजन शोक में डूब गए।
उसी समय उधर से महर्षि शुकदेव जी निकले। उन्होंने रोते हुए परिजनों को देखकर पूछा — 'यहाँ क्या हुआ?' मामा ने सारी बात बताई। शुकदेव जी ने कहा — 'इस बालक की मृत्यु पर मत रोओ। इसके पिता का सोमवार व्रत और भगवान शिव की कृपा अत्यंत महान है। इनके परिणाम से यह बालक अवश्य जीवित होगा।' शुकदेव जी ने बालक के कान में शिव मंत्र पढ़ा — बालक उठ बैठा। सभी आश्चर्यचकित हो गए और शिव जी की जय बोली।
महर्षि शुकदेव जी ने बालक के कान में शिव मंत्र फूंका और वह जीवित हो उठा। सबने भगवान शिव की जय-जयकार की।
जीवित बालक काशी में अध्ययन पूरा करके नगर लौटा। सेठ-सेठानी ने पुत्र को जीवित देखकर परम प्रसन्नता प्राप्त की। सेठ ने भगवान शिव के मंदिर में जाकर पूजा की और बोला — 'हे शिव! आपकी कृपा से मेरा पुत्र जीवित रहा।' सेठ ने आजीवन सोमवार व्रत रखा। भगवान की कृपा से उसका परिवार सुख-समृद्धि से भरपूर रहा और अंत में सभी शिवलोक को गए। ॥ बोलो भगवान शिव की जय॥ ॐ नमः शिवाय॥
पुत्र घर लौटा। सेठ ने आजीवन व्रत रखा और शिव कृपा से परिवार सुखी रहा। अंत में सभी शिवलोक गए।
॥ व्रत फल ॥ जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक सोमवार का व्रत करता है और कथा सुनता है — भगवान शिव उसके सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं। निःसंतान को संतान, निर्धन को धन और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ॥ इति सोमवार व्रत कथा सम्पूर्ण ॥ श्री भगवान शिव की जय॥
इस व्रत का फल: श्रद्धापूर्वक सोमवार व्रत करने वाले की सभी मनोकामनाएं भगवान शिव पूर्ण करते हैं। संतान, धन और मोक्ष — सब मिलता है।
आरती
अन्य आरतियाँ
