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पाठ/कथा/Lord Shiva
Lord Shiva · व्रत कथा

सोमवार व्रत कथा

एक सेठ के परिवार की कथा — भगवान शिव की कृपा से सब कुछ सुधर गया — सोमवार व्रत की सम्पूर्ण कथा

पूजन सामग्री पूजन विधि सम्पूर्ण कथा आरती

पूजन सामग्री

शिवलिंग या भगवान शिव की मूर्ति / चित्र
जल भरा कलश, आम के पत्ते सहित
बिल्व पत्र — शिव पूजन के लिए अनिवार्य
सफेद फूल — धतूरा, कनेर, आकड़े के फूल, चमेली
पंचामृत — दूध, दही, शहद, घी, शक्कर
भस्म (विभूति)
रोली और अक्षत
धूप / अगरबत्ती और घी का दीपक
कपूर — आरती के लिए
सफेद मिठाई — खीर, नारियल बर्फी
सफेद तिल
गंगाजल — अभिषेक के लिए
मौली (कलावा)
मदार की माला (सफेद आकड़े के फूल)
पान-सुपारी

पूजन विधि(पूर्ण दिवस / Full day fast)

1

सोमवार को सूर्योदय से पहले उठें। स्नान कर श्वेत या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। संकल्प लें — 'मैं भगवान शिव की कृपा प्राप्ति हेतु सोमवार व्रत करता/करती हूँ।'

2

चौकी पर शिवलिंग या शिव जी का चित्र स्थापित करें। चारों ओर बिल्व पत्र और ताजे सफेद फूल सजाएं।

3

पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करें, फिर शुद्ध गंगाजल से। स्वच्छ वस्त्र से पोंछें।

4

भस्म, बिल्व पत्र, सफेद फूल, सफेद तिल अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं।

5

रुद्राक्ष माला से 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें। महामृत्युंजय मंत्र का 11 बार जाप करें।

6

पूर्ण ध्यान से सोमवार व्रत कथा सुनें या पढ़ें। कथा के मध्य उठकर न जाएं।

7

कथा के बाद शिव आरती करें। सभी को सफेद प्रसाद (खीर या नारियल बर्फी) वितरित करें।

8

दिनभर उपवास रखें — सूर्यास्त पर एक समय बिना नमक का भोजन करें। फल-दूध कभी भी ले सकते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करें।

सम्पूर्ण कथा

ॐ नमः शिवाय॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

भगवान शिव को नमस्कार। हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पोषक भगवान शिव की पूजा करते हैं। जैसे ककड़ी अपनी लता से मुक्त होती है वैसे ही हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें — अमरत्व की ओर ले जाएं।

॥ सोमवार व्रत कथा ॥

किसी नगर में एक धनी सेठ रहता था। उसकी भगवान शिव में अटूट आस्था थी और वह प्रति सोमवार व्रत रखता था। उसकी पत्नी भी इस व्रत में सहभागी होती थी। सेठ के यहाँ धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी, पर एक दुख था — उनकी कोई संतान नहीं थी। इसी चिंता से दुखी होकर सेठ ने शिव मंदिर में जाकर विशेष उपवास और पूजन किया।

एक धनी सेठ नियमित सोमवार व्रत करता था। उसके पास सब कुछ था — धन, सम्मान — पर संतान नहीं थी। इस दुख से पीड़ित होकर उसने भगवान शिव की विशेष आराधना की।

माता पार्वती ने सेठ की भक्ति देख प्रसन्न होकर भगवान शिव से निवेदन किया — 'हे प्राणनाथ! यह सेठ बड़ा भक्त है। इसे पुत्र का वरदान दीजिए।' शिव जी बोले — 'हे देवी! इसके भाग्य में संतान नहीं है। परंतु तुम्हारी विनती पर मैं इसे एक पुत्र दूंगा — किंतु वह पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा।' पार्वती जी ने यह बात मान ली और देव-कृपा से सेठ के घर एक पुत्र का जन्म हुआ।

माता पार्वती ने भगवान शिव से सेठ को पुत्र देने की विनती की। शिव जी ने पुत्र का वरदान तो दिया, परंतु साथ ही कहा कि वह बारह वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।

पुत्र के ग्यारह वर्ष पूर्ण होने पर सेठ ने उसे काशी में पढ़ाई के लिए भेजा। रास्ते में वे बालक के मामा के घर रुके। वहाँ यज्ञ हो रहा था। बालक ने यज्ञ में भाग लिया और काशी की ओर चल पड़ा। मार्ग में बालक बीमार पड़ गया और उसी रात उसकी मृत्यु हो गई। उसके साथी और मामा शोक में डूब गए।

बारह वर्ष पूरे होने पर बालक काशी जाते समय मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। सभी परिजन शोक में डूब गए।

उसी समय उधर से महर्षि शुकदेव जी निकले। उन्होंने रोते हुए परिजनों को देखकर पूछा — 'यहाँ क्या हुआ?' मामा ने सारी बात बताई। शुकदेव जी ने कहा — 'इस बालक की मृत्यु पर मत रोओ। इसके पिता का सोमवार व्रत और भगवान शिव की कृपा अत्यंत महान है। इनके परिणाम से यह बालक अवश्य जीवित होगा।' शुकदेव जी ने बालक के कान में शिव मंत्र पढ़ा — बालक उठ बैठा। सभी आश्चर्यचकित हो गए और शिव जी की जय बोली।

महर्षि शुकदेव जी ने बालक के कान में शिव मंत्र फूंका और वह जीवित हो उठा। सबने भगवान शिव की जय-जयकार की।

जीवित बालक काशी में अध्ययन पूरा करके नगर लौटा। सेठ-सेठानी ने पुत्र को जीवित देखकर परम प्रसन्नता प्राप्त की। सेठ ने भगवान शिव के मंदिर में जाकर पूजा की और बोला — 'हे शिव! आपकी कृपा से मेरा पुत्र जीवित रहा।' सेठ ने आजीवन सोमवार व्रत रखा। भगवान की कृपा से उसका परिवार सुख-समृद्धि से भरपूर रहा और अंत में सभी शिवलोक को गए। ॥ बोलो भगवान शिव की जय॥ ॐ नमः शिवाय॥

पुत्र घर लौटा। सेठ ने आजीवन व्रत रखा और शिव कृपा से परिवार सुखी रहा। अंत में सभी शिवलोक गए।

॥ व्रत फल ॥ जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक सोमवार का व्रत करता है और कथा सुनता है — भगवान शिव उसके सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं। निःसंतान को संतान, निर्धन को धन और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। ॥ इति सोमवार व्रत कथा सम्पूर्ण ॥ श्री भगवान शिव की जय॥

इस व्रत का फल: श्रद्धापूर्वक सोमवार व्रत करने वाले की सभी मनोकामनाएं भगवान शिव पूर्ण करते हैं। संतान, धन और मोक्ष — सब मिलता है।

आरती

मुख्य आरती

ॐ जय शिव ओंकारा

पूरी आरती →

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

हे ओमकार स्वरूप भगवान शिव! आपकी जय हो। आप ही ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव के रूप हैं, और माता पार्वती को अपने आधे अंग में धारण करते हैं।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे। स्वामी पंचानन राजे। हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप एक मुख वाले (विष्णु), चार मुख वाले (ब्रह्मा) और पांच मुख वाले (शिव) रूप में सुशोभित हैं। हंस, गरुड़ और नंदी वृषभ आपके स्वरूपों के वाहन हैं।

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे। स्वामी दसभुज अति सोहे। त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आपकी दो, चार और दस भुजाओं वाले स्वरूप अत्यंत सुशोभित होते हैं। आपके तीनों गुणों से युक्त स्वरूप को देखकर तीनों लोकों के प्राणी मोहित हो जाते हैं।

अक्षमाला वनमाला मुंडमाला धारी। स्वामी मुंडमाला धारी। त्रिपुरारि कंसारि मदहारी मारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप रुद्राक्ष की माला, वनमाला और मुंडों की माला धारण करते हैं। आप त्रिपुरासुर का नाश करने वाले, दैत्यों का अंत करने वाले और अहंकार का मर्दन करने वाले हैं।

श्वेतांबर पीतांबर बाघंबर अंगे। स्वामी बाघंबर अंगे। सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप श्वेतांबर, पीतांबर और बाघ की छाल (बाघंबर) धारण करते हैं। सनकादि ऋषि, गरुड़ और भूत-गण सदैव आपके संग रहते हैं।

कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धरता। स्वामी चक्र त्रिशूल धरता। जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

आप अपने हाथों में कमंडलु, चक्र और त्रिशूल धारण करते हैं। आप ही इस जगत् की रचना करने वाले, पालन करने वाले और संहार करने वाले हैं।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। स्वामी जानत अविवेका। प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

अज्ञानी मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और शिव को पृथक् मानते हैं। वास्तव में, ओंकार (प्रणव) के भीतर ये तीनों त्रिदेव एक ही परम तत्त्व हैं।

काशी में विश्वनाथ विराजे नंदी ब्रह्मचारी। स्वामी नंदी ब्रह्मचारी। नित्य उठ दर्शन पावे महिमा अति भारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में भगवान विश्वनाथ के रूप में आप विराजमान हैं और नंदी ब्रह्मचारी आपके द्वार पर विराजते हैं। जिनका नित्य दर्शन करने से अत्यंत भारी महिमा और पुण्य मिलता है।

त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे। स्वामी जो कोई नर गावे। कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥

जो भी मनुष्य तीनों गुणों के स्वामी भगवान शिव की इस आरती का गायन करता है, स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वह अपनी मनोवांछित इच्छाओं की पूर्ति पाता है।

अन्य आरतियाँ

सुख करता दुख हरता

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सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची। सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥