अक्षय तृतीया क्या है?
अक्षय तृतीया (अखा तीज) वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाया जाने वाला हिंदू कैलेंडर का सर्वाधिक शुभ पर्वों में से एक है। 'अक्षय' का अर्थ है — जो कभी क्षीण न हो। इस दिन जो भी शुभ कार्य किया जाए, जो भी दान दिया जाए — उसमें कभी कमी नहीं आती, बल्कि वह बढ़ता रहता है।
यह क्यों मनाया जाता है?
परंपरा में अक्षय तृतीया 'स्वयंसिद्ध' शुभ मुहूर्त है — इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए अलग से मुहूर्त निकालने की आवश्यकता नहीं। इस दिन से जुड़ी कई पावन घटनाएं हैं: गंगा का धरती पर अवतरण, त्रेता युग का आरंभ, भगवान परशुराम का जन्मदिन और महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत श्रुतलेखन का आरंभ। यही वह दिन है जब भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को अक्षयपात्र दिया था।
इसे कैसे मनाया जाता है?
देवताओं को गेहूँ, जल, फल, दही और नए वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। इस दिन सोना और सम्पत्ति की खरीद अत्यंत शुभ मानी जाती है — माना जाता है कि यह बढ़ती रहती है। गरीबों को भोजन, मंदिरों को दान और जलदान का विशेष पुण्य है। नए व्यवसाय और शुभ कार्यों का आरंभ इसी दिन किया जाता है। लक्ष्मी-विष्णु की पूजा मुख्य रूप से की जाती है।
यह कब मनाया जाता है?
अक्षय तृतीया वैशाख शुक्ल तृतीया को होती है — सामान्यतः अप्रैल या मई में। यह 'अबूझ मुहूर्त' है — हिंदू पंचांग के उन विरले दिनों में से एक जब बिना मुहूर्त निकाले कोई भी शुभ कार्य आरंभ किया जा सकता है।
मुख्य बातें
अबूझ मुहूर्त
अक्षय तृतीया हिंदू पंचांग के उन बिरले दिनों में से है जो 'अबूझ' हैं — स्वयंसिद्ध शुभ, जिनमें किसी भी नए कार्य के लिए मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं।
अक्षयपात्र की कथा
भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को अक्षयपात्र दिया — एक ऐसा पात्र जो कभी खाली नहीं होता। यही इस दिन की अफुरलटता और प्रचुरता की पौराणिक पृष्ठभूमि है।
सोना खरीदने की परंपरा
अक्षय तृतीया पर सोना खरीदना सर्वभारतीय परंपरा है — इस दिन आभूषण विक्रेताओं की सर्वाधिक बिक्री होती है। मान्यता है कि इस दिन खरीदा सोना समृद्धि लाता है और बढ़ता रहता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अक्षय तृतीया पर दान का क्या महत्त्व है?
परंपरा के अनुसार अक्षय तृतीया पर दिया गया दान अनंत गुना फल देता है — उसका पुण्य कभी क्षीण नहीं होता। जल, अन्न, स्वर्ण या वस्त्र का दान इस दिन सर्वश्रेष्ठ भक्तिकर्म माना जाता है।
क्या अक्षय तृतीया जैन धर्म में भी मनाई जाती है?
हाँ — जैन धर्म में अक्षय तृतीया (अखा तीज) वह दिन है जब प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने एक राजा द्वारा दिए गए गन्ने के रस से अपना एक वर्ष का तप तोड़ा था। इस घटना को 'वर्षीतप पारणा' कहते हैं।