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Bhai Dooj

भाई दूज

भाई-बहन के पवित्र स्नेह का उत्सव — कार्तिक शुक्ल द्वितीया

भाई दूज क्या है?

भाई दूज (जिसे यम द्वितीया, भाई टीका या भाऊ बीज भी कहा जाता है) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। यह पाँच दिवसीय दीपोत्सव का अंतिम पर्व है। यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्रेम और सम्मान का प्रतीक है। बहनें रोली, अक्षत, दीपक, मिठाई और सूखे नारियल (गोले) की थाली सजाकर भाई के माथे पर मंगल तिलक लगाती हैं, आरती उतारती हैं और उनकी दीर्घायु व सुख की प्रार्थना करती हैं। भाई प्रेमपूर्वक उपहार देकर बहन का सम्मान करते हैं।

यह क्यों मनाया जाता है?

पौराणिक कथा के अनुसार, कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने उनके घर पहुंचे। यमुना ने अत्यंत प्रसन्न होकर अपने भाई का स्वागत किया, माथे पर तिलक लगाया, प्रेम से भोजन कराया और उनकी कुशल-क्षेम की कामना की। यमराज ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। यमुना ने वर मांगा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे घर आएं, और जो भी भाई इस दिन अपनी बहन के घर जाकर तिलक लगवाए व भोजन करे, उसे अकाल मृत्यु का भय न रहे। एक अन्य लोकप्रिय परंपरा के अनुसार, नरकासुर पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा से मिलने पहुंचे थे, जहाँ सुभद्रा ने दीप जलाकर तिलक लगाकर उनका स्वागत किया था।

इसे कैसे मनाया जाता है?

यह अनुष्ठान परंपरा से दोपहर बाद (अपराह्न काल) में किया जाता है। बहन थाली में रोली, अक्षत, फूल, जलता दीपक और, उत्तर भारत के कई घरों में, सूखा नारियल (गोला) रखती है। वह भाई के माथे पर तिलक लगाती है, उस पर अक्षत लगाती है, आरती उतारती है और मिठाई तथा नारियल देती है। भाई बदले में उपहार देता है। रीति घर-घर में अलग है: कहीं भाई को उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके बैठाया जाता है, और कई क्षेत्रों में इस दिन यमुना स्नान या शाम को दूज के चंद्रमा के दर्शन की भी परंपरा है।

यह कब मनाया जाता है?

भाई दूज कार्तिक शुक्ल द्वितीया को उस दिन मनाया जाता है जब द्वितीया तिथि दोपहर बाद (अपराह्न काल) में हो। सामान्यतः यह दिवाली के दो दिन बाद पड़ता है, पर तिथियों के क्रम के अनुसार कुछ वर्षों में तीन दिन बाद भी हो सकता है। इस पृष्ठ पर दी गई तिथि इस वर्ष के लिए जाँची हुई है।

मुख्य बातें

यम द्वितीया की पावन कथा

यमराज और यमुना के मिलन की स्मृति, जिसमें बहन के घर तिलक कराने वाले भाई को दीर्घायु और यम भय से मुक्ति का वरदान मिला।

अपराह्न कालीन तिलक विधान

दोपहर बाद भाई के माथे पर तिलक, अक्षत और आरती की परंपरा।

सूखा नारियल (गोला) भेंट

उत्तर भारत के कई घरों में बहन भाई को सूखा गोला देती है, जो शुभता और मंगल कामना का पारंपरिक प्रतीक है।

दीपोत्सव का सुखद समापन

धनतेरस से आरंभ हुई पाँच दिवसीय दीपोत्सव पर्व श्रृंखला का पूर्णता और उल्लास के साथ समापन।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भाई दूज और रक्षाबंधन में क्या अंतर है?

दोनों त्योहार भाई-बहन के प्रेम के हैं, लेकिन इनके विधान अलग हैं। रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) में कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बाँधने का मुख्य नियम है। भाई दूज (कार्तिक द्वितीया) में माथे पर तिलक लगाने, आरती उतारने, सूखा नारियल देने और भोजन कराने की यम-यमुना परंपरा मुख्य है।

भाई दूज को यम द्वितीया क्यों कहा जाता है?

इसे यम द्वितीया इसलिए कहते हैं क्योंकि इसी तिथि पर यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए थे। मान्यता है कि जो भाई इस दिन बहन के हाथ से तिलक लगवाता है और उसके घर भोजन करता है, उसे यमराज की कृपा से दीर्घायु प्राप्त होती है।

भाई दूज का तिलक किस समय करना चाहिए?

परंपरा के अनुसार भाई दूज का तिलक कार्तिक शुक्ल द्वितीया को दोपहर बाद (अपराह्न काल) में किया जाता है, और धर्मग्रंथ दिन का निर्णय इसी से करते हैं कि द्वितीया अपराह्न में कहाँ पड़ती है। हर शहर के लिए दोपहर का समय पंचांग में दिया रहता है; परिवार अपने पंचांग के अनुसार चलते हैं।

भाई दूज पर बहनें भाई को सूखा नारियल (गोला) क्यों देती हैं?

उत्तर और पश्चिम भारत के कई घरों में सूखा नारियल (गोला) भाई दूज की थाली का हिस्सा होता है। यह शास्त्र का नियम नहीं, घर-घर की रीति है: पूरा नारियल शुभता का प्रतीक माना जाता है, और उसे देना भाई के लिए बहन की मंगल कामना का संकेत है।

यदि भाई दूर हो या उपलब्ध न हो, तो क्या भाई दूज मनाया जा सकता है?

हाँ। यह परंपरा चचेरे भाई-बहनों और पारिवारिक मित्रों तक भी निभाई जाती है। भाई पास न हो तो कुछ रीतियों में बहन शाम को दूज के चंद्रमा को, या यमराज को, तिलक अर्पित कर भाई की मंगल कामना करती है।

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