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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग

छठ पूजा

सूर्य देव एवं छठी मइया की उपासना का चार दिवसीय महान लोकपर्व

छठ पूजा क्या है?

छठ पूजा (सूर्य षष्ठी, छठी परब या डाला छठ) भगवान सूर्यदेव और उनकी जननी-स्वरूपा शक्ति छठी मइया (उषा) को समर्पित चार दिवसीय महान लोकपर्व है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मुख्य रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व ढलते (अस्तगामी) और उगते (उदीयमान) सूर्य दोनों की पूजा के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

यह क्यों मनाया जाता है?

भगवान सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं जो समस्त सृष्टि को ऊर्जा, आरोग्य और जीवन प्रदान करते हैं। निर्णय सिंधु एवं पुराणों के अनुसार, छठी मइया (षष्ठी देवी) और सूर्यदेव की संयुक्त आराधना से संतानों को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और कुल-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

इसे कैसे मनाया जाता है?

यह पर्व चार दिनों में संपन्न होता है: नहाय-खाय (पवित्र स्नान एवं कद्दू-भात का सात्विक भोजन), खरना (दिनभर का व्रत एवं सायं गुड़ की खीर-रोटी का प्रसाद), संध्या अर्घ्य (पवित्र नदी/तालाब में कमर तक जल में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य), तथा उषा अर्घ्य (उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर निर्जला व्रत का पारण)।

यह कब मनाया जाता है?

मुख्य छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को संध्या काल व्यापिनी होने पर मनाई जाती है। यह अंग्रेजी कैलेंडर में अक्टूबर या नवंबर महीने में पड़ती है। चैत्र मास में भी चैती छठ का आयोजन होता है।

मुख्य बातें

३६ घंटे का अनवरत निर्जला व्रत

पंचमी की शाम को खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती निर्जला व्रत प्रारंभ करते हैं, जो षष्ठी की पूरी रात और अगले दिन सप्तमी की सुबह उषा अर्घ्य के बाद पारण के साथ समाप्त होता है। यह निर्जला अवधि स्थानीय सूर्योदय एवं सूर्यास्त के आधार पर लगभग ३६ घंटे की होती है।

महाभारत वन पर्व संदर्भ (धौम्य, युधिष्ठिर एवं कर्ण)

महाभारत वन पर्व (अध्याय ३) में महर्षि धौम्य के उपदेश पर युधिष्ठिर ने जल में खड़े होकर सूर्य के १०८ नामों का जप किया, जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने अक्षय पात्र प्रदान किया (जिससे द्रौपदी सभी ऋषियों को भोजन कराती थीं)। वन पर्व (अध्याय ३००) में सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा जल में खड़े होकर नित्य सूर्य अर्घ्य देने का स्पष्ट वर्णन है।

षष्ठी व्याप्ति निर्णय सिंधु नियम

निर्णय सिंधु के अनुसार संध्या अर्घ्य हेतु षष्ठी तिथि का सायं काल (सूर्यास्त) में होना अनिवार्य है। यदि षष्ठी दो दिन सूर्यास्त को स्पर्श करे या किसी दिन न करे, तो निर्णय सिंधु के शास्त्रसम्मत नियमानुसार तिथि का चयन किया जाता है।

कमर तक जल में अर्घ्य एवं दऊरा-सूप

व्रती प्राकृतिक नदियों या तालाबों के जल में खड़े होकर बांस के बने सूप और दऊरा में ठेकुआ, गन्ना, नारियल तथा मौसमी फल रखकर भगवान सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य अर्पित करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

छठ के निर्जला व्रत की अवधि की गणना कैसे होती है?

निर्जला व्रत की अवधि का निर्धारण सीधे पर्व की तिथियों से होता है। यह पंचमी की शाम को खरना प्रसाद के बाद शुरू होता है, षष्ठी के पूरे दिन-रात चलता है, और सप्तमी की सुबह उषा अर्घ्य के बाद पूरा होता है — जो स्थानीय सूर्योदय व सूर्यास्त के अनुसार लगभग ३६ घंटे का होता है।

छठ पूजा और सूर्य अर्घ्य का महाभारत में क्या संदर्भ मिलता है?

महाभारत वन पर्व (अध्याय ३) में महर्षि धौम्य के उपदेश पर युधिष्ठिर ने जल में सूर्य-उपासना कर अक्षय पात्र प्राप्त किया था। अध्याय ३०० में कर्ण द्वारा कमर तक जल में खड़े होकर नित्य सूर्य को अर्घ्य देने का वर्णन है।

यदि षष्ठी तिथि दो दिनों में बंटी हो तो संध्या अर्घ्य की तिथि कैसे तय होती है?

निर्णय सिंधु के अनुसार जिस दिन षष्ठी तिथि सायं काल (सूर्यास्त) को व्याप्त करती है, उसी दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है। यदि तिथि दो दिन सूर्यास्त को स्पर्श करे, तो शास्त्रों के नियमानुसार पहली तिथि (पूर्वाविद्धा) मान्य होती है।

छठ पूजा के चार दिन क्रम से कौन-कौन से हैं?

१. पहला दिन: नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी) २. दूसरा दिन: खरना (कार्तिक शुक्ल पंचमी) ३. तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) ४. चौथा दिन: उषा अर्घ्य एवं पारण (कार्तिक शुक्ल सप्तमी)

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