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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग

गणेश चतुर्थी

भगवान श्री गणेश के आगमन का दस दिवसीय पावन जन्मोत्सव

गणेश चतुर्थी क्या है?

गणेश चतुर्थी (विनायक चतुर्थी, तमिलनाडु में पिल्लयार चतुर्थी, गोवा में चोवथ तथा केरल में लंबोदर पिरनालू) विघ्नहर्ता और बुद्धिदाता भगवान श्री गणेश का प्राकट्य उत्सव है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह सार्वजनिक महोत्सव दस दिनों तक चलता है और अनंत चतुर्दशी को प्रतिमा विसर्जन के साथ संपन्न होता है।

यह क्यों मनाया जाता है?

किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में विघ्ननाशक भगवान गणेश की प्रथम पूजा की जाती है। निर्णय सिंधु के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल में हुआ था, इसलिए मध्याह्न काल ही उनकी प्राण-प्रतिष्ठा और पूजा का शास्त्रसम्मत मुख्य समय माना जाता है।

इसे कैसे मनाया जाता है?

श्रद्धालु मध्याह्न काल में मिट्टी की हस्तनिर्मित गणेश मूर्तियों की स्थापना करते हैं। पूजा में २१ दुर्वा दल, मोदक और शमी पत्र अर्पित किए जाते हैं। पर्यावरण सुरक्षा हेतु तमिलनाडु जैसे राज्यों में प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) की मूर्तियों पर वैधानिक प्रतिबंध है, जो पारंपरिक मिट्टी की मूर्तियों की परंपरा को बल देता है। दसवें दिन (अनंत चतुर्दशी) मूर्तियों का जलाशयों में विसर्जन किया जाता है।

यह कब मनाया जाता है?

गणेश चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि को मध्याह्न काल व्यापिनी होने पर मनाई जाती है। चंद्र कैलेंडर के आधार पर इसकी अंग्रेजी तिथि प्रतिवर्ष बदलती है, जो सामान्यतः अगस्त या सितंबर महीने में पड़ती है।

मुख्य बातें

मध्याह्न व्यापिनी पूजा काल

निर्णय सिंधु आदि धर्मग्रंथों के अनुसार गणेश पूजा मध्याह्न काल (सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य का काल) में करने का विधान है, जो भगवान गणेश का प्राकट्य समय माना जाता है।

ऐतिहासिक विकास: पेशवा से तिलक (१८९३)

१८वीं शताब्दी में पुणे में पेशवाओं के संरक्षण में सार्वजनिक गणेशोत्सव आयोजित होता था। ब्रिटिश काल में राज्य संरक्षण समाप्त होने पर, १८९२ में कृष्णाजीपंत खासगीवाले ने ग्वालियर की सार्वजनिक परंपरा को पुणे में प्रस्तावित किया, भाऊसाहेब रंगारी ने पहला सार्वजनिक मंडल बनाया, और १८९३ में लोकमान्य तिलक ने 'केसरी' के माध्यम से ब्रिटिश कालीन धार्मिक सभा छूट (१८९२ कानून) का लाभ उठाकर इसे राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया (कैशमैन १९७५)।

गोवा का चोवथ और इनक्विजिशन इतिहास

गोवा में गणेश चतुर्थी ('चोवथ') कदंब राजवंश से भी प्राचीन है। १६वीं शताब्दी के पुर्तगाली इनक्विजिशन (धर्मसभा) में हिंदू अनुष्ठानों पर प्रतिबंध के दौरान, गोअन परिवारों ने पत्री (पवित्र पत्तियों) और गुप्त मूर्तियों की पूजा करके इस परंपरा को सुरक्षित रखा।

चंद्र दर्शन निषेध एवं स्यमंतक मणि कथा

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्र दर्शन वर्जित माना जाता है ताकि मिथ्या कलंक न लगे। यह मान्यता श्रीमद्भागवत पुराण (१०.५६–५७) में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण पर लगे स्यमंतक मणि चोरी के झूठे आरोप से जुड़ी है।

गणेश व मुद्गल पुराण तथा मोदक भोग

गाणपत्य संप्रदाय में गणेश पुराण और मुद्गल पुराण मुख्य उपपुराण हैं जो भगवान गणेश के अवतारों और रूपों का वर्णन करते हैं। पूजा में २१ मोदक का भोग लगाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश चतुर्थी की पूजा दोपहर (मध्याह्न) में ही क्यों की जाती है?

निर्णय सिंधु के अनुसार भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल (सूर्योदय से सूर्यास्त का मध्य भाग) में हुआ था। इसलिए मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी तिथि ही पूजा के लिए शास्त्रसम्मत मुख्य समय मानी जाती है।

सार्वजनिक गणेशोत्सव का ऐतिहासिक विकास कैसे हुआ?

१८वीं सदी में पुणे में पेशवाओं द्वारा सार्वजनिक उत्सव मनाया जाता था। १८९२ में ग्वालियर की तर्ज पर पुणे में कृष्णाजीपंत खासगीवाले और भाऊसाहेब रंगारी ने पहला सार्वजनिक मंडल स्थापित किया, तथा १८९३ में लोकमान्य तिलक ने 'केसरी' पत्र के माध्यम से इसे स्वतंत्रता संग्राम का जन-आंदोलन बनाया।

पुर्तगाली इनक्विजिशन के दौरान गोवा में गणेश उत्सव कैसे सुरक्षित रहा?

१६वीं सदी में पुर्तगाली इनक्विजिशन के दौरान हिंदू धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध के समय, गोअन परिवारों ने गुप्त स्थानों में मूर्तियों और पवित्र पत्तियों (पत्री) की पूजा करके 'चोवथ' की परंपरा को सुरक्षित रखा।

गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा को देखना क्यों मना है?

मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखने से मिथ्या कलंक (झूठा आरोप) लगता है। इसका संबंध श्रीमद्भागवत पुराण (१०.५६–५७) की स्यमंतक मणि कथा से है, जिसमें श्रीकृष्ण पर भी अनपेक्षित आरोप लगा था।

भगवान गणेश को समर्पित प्राथमिक पुराण कौन से हैं?

गणेश पुराण और मुद्गल पुराण गाणपत्य परंपरा के दो मुख्य उपपुराण हैं जो विशेष रूप से भगवान गणेश की उपासना और दर्शन को समर्पित हैं।

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