रक्षाबंधन क्या है?
रक्षाबंधन (राखी, श्रावणी या सलूनो) भाई-बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा के अटूट बंधन को समर्पित सनातन संस्कृति का प्रमुख पर्व है। यह श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा-सूत्र (राखी) बांधती हैं तथा उनकी दीर्घायु, मंगल और सफलता की कामना करती हैं, और भाई अपनी बहनों की रक्षा एवं स्नेह का संकल्प लेते हैं।
यह क्यों मनाया जाता है?
पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार रक्षा-सूत्र बांधने से सभी प्रकार के भयों और विघ्नों का नाश होता है। निर्णय सिंधु एवं धर्मसिंधु के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा के अपराह्न काल में भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में रक्षा-विधान करने से वर्षभर रक्षा और कल्याण की प्राप्ति होती है। इसी दिन वैदिक परंपरा में उपाकर्म (श्रावणी) और वेद-आरंभ का विधान भी है।
इसे कैसे मनाया जाता है?
प्रातः काल स्नान के पश्चात पूजा की थाली में राखी, रोली, अक्षत, दीपक और मिष्ठान सजाया जाता है। भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं, दाहिनी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधती हैं, आरती उतारती हैं और मिठाई खिलाती हैं। भाई अपनी सामर्थ्य अनुसार उपहार भेंट करते हैं।
यह कब मनाया जाता है?
रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को अपराह्न काल में मनाया जाता है, परंतु यदि पूर्णिमा के दौरान भद्रा (विष्टि करण) व्याप्त हो तो भद्रा काल का पूर्ण परित्याग किया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह पर्व सामान्यतः अगस्त महीने में पड़ता है।
मुख्य बातें
अपराह्न काल एवं भद्रा निषेध
निर्णय सिंधु के अनुसार रक्षाबंधन का मुख्य मुहूर्त श्रावण पूर्णिमा का अपराह्न काल है। शास्त्रों में भद्रा काल में राखी बांधना पूर्णतः वर्जित माना गया है ('भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा'), अतः भद्रा समाप्त होने के बाद ही रक्षा-विधान किया जाता है।
पौराणिक कथाएं: इन्द्राणी, राजा बलि एवं द्रौपदी
भविष्य पुराण में इन्द्राणी द्वारा इंद्र को रक्षा-सूत्र बांधने, भागवत पुराण में राजा बलि व माता लक्ष्मी के प्रसंग, तथा महाभारत में द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण की अंगुली पर वस्त्र-पट्टी बांधने की कथाएं इस पर्व के प्राचीन आधार हैं।
श्रावणी उपाकर्म व अवनी अवित्तम
श्रावण पूर्णिमा का दिन केवल भाइयों के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण वैदिक समाज के लिए पवित्र है। दक्षिण भारत में इसे अवनी अवित्तम तथा उत्तर भारत में श्रावणी उपाकर्म के रूप में जनेऊ बदलने और वेदाध्ययन आरंभ का पर्व माना जाता है।
रक्षा-सूत्र एवं भ्रातृ-स्नेह
राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि स्नेह, विश्वास और कर्तव्य का संकल्प है। आज यह पर्व केवल सगे भाई-बहनों तक सीमित न रहकर समाज में सद्भाव, सुरक्षा और सौहार्द का प्रतीक बन चुका है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
रक्षाबंधन पर भद्रा काल क्यों वर्जित माना जाता है?
निर्णय सिंधु के अनुसार भद्रा (विष्टि करण) में किया गया रक्षा-विधान अति कष्टकारी माना गया है ('भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा')। इसलिए भद्रा काल बीतने के बाद ही राखी बांधी जाती है।
राखी बांधने का सबसे शुभ समय (मुहूर्त) कौन सा होता है?
रक्षाबंधन के लिए अपराह्न काल (दोपहर के बाद का समय) सबसे उत्तम माना जाता है, बशर्ते उस समय भद्रा न हो। यदि अपराह्न में भद्रा हो तो प्रदोष काल में भद्रा समाप्त होने पर राखी बांधी जाती है।
श्रावणी उपाकर्म क्या है?
श्रावणी पूर्णिमा के दिन द्विज समाज द्वारा नदियों में स्नान करके ऋषि तर्पण किया जाता है और पुराना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलकर नया धारण किया जाता है। दक्षिण भारत में इसे 'अवनी अवित्तम' कहते हैं।
रक्षाबंधन के इतिहास का वर्णन किन ग्रंथों में मिलता है?
निर्णय सिंधु, धर्मसिंधु, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत में रक्षा-सूत्र बांधने की परंपरा के अनेक प्रसंग मिलते हैं।
