साहूकार की पत्नी, उसके सात पुत्रों और अहोई माता की पारंपरिक कथा — कार्तिक कृष्ण अष्टमी
इस कथा के बारे में
माताएं कार्तिक कृष्ण अष्टमी को, करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद और दीपावली से लगभग आठ दिन पहले, अपनी संतान की मंगल कामना से यह व्रत रखती हैं। शाम को महिलाएं एकत्र होकर कथा सुनती हैं, अहोई माता के चित्र की पूजा करती हैं और तारों के दर्शन के बाद व्रत खोलती हैं।
पूजन सामग्री
पूजन विधि(सूर्योदय से तारों के दर्शन तक / From sunrise until the stars are seen)
संकल्प: कार्तिक कृष्ण अष्टमी की सुबह स्नान करके संतान के लिए व्रत का संकल्प लें। कुछ परिवारों में निर्जला व्रत रखा जाता है; कुछ में जल, दूध या फल लिया जाता है। अपने घर की रीति के अनुसार चलें।
पूजा स्थान की तैयारी: दोपहर बाद पूजा का स्थान साफ करें। परंपरा से दीवार पर गेरू और चावल के घोल से अहोई माता, साही और उसके बच्चों की आकृति बनाई जाती है; अब कई घरों में साफ कपड़ा बिछी चौकी पर छपा हुआ चित्र रखा जाता है।
करवा: चित्र के सामने जल से भरा करवा या लोटा रखें, उसके गले में कलावा बांधें और ढक्कन पर गेहूं के कुछ दाने रखें। जिन परिवारों में चांदी की स्याऊ माला की रीति है, वे उसे चित्र के सामने रखते हैं।
कथा श्रवण: शाम को परिवार या पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर, हाथ में गेहूं के कुछ दाने लेकर, कथा सुनें।
पूजन: अहोई माता को रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें, दीपक और धूप जलाएं, और सिंघाड़े, मूली, फल तथा हलवा-पूरी या पुए चढ़ाएं।
तारों को अर्घ्य: तारे निकलने पर करवे के जल से उन्हें अर्घ्य दें और संतान के लिए प्रार्थना करें। कुछ परिवारों में अर्घ्य चंद्रोदय पर चंद्रमा को दिया जाता है।
बायना और व्रत खोलना: रीति के अनुसार बायना सास या घर की बड़ी महिला को दिया जाता है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद जल और प्रसाद से व्रत खोला जाता है।
सम्पूर्ण कथा
बहुत समय पहले एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और घर सुखी था। कार्तिक का महीना था और दीपावली आने वाली थी। घर की लिपाई-पुताई के लिए साहूकार की पत्नी खुरपी लेकर मिट्टी लाने खदान में गई।
एक साहूकार के सात बेटे थे। दीपावली से पहले घर लीपने के लिए उसकी पत्नी मिट्टी खोदने गई।
जहाँ वह मिट्टी खोद रही थी, वहीं पास में एक स्याहु (साही) की मांद थी, जिसमें उसके बच्चे थे। खोदते समय अनजाने में खुरपी साही के एक बच्चे को लग गई और वह मर गया। यह देखकर साहूकार की पत्नी को बहुत दुख हुआ, पर अब कुछ हो नहीं सकता था। वह पछताती हुई घर लौट आई।
मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी खुरपी से साही का एक बच्चा मर गया। वह दुखी होकर घर लौट आई।
कुछ समय बाद उसके बड़े बेटे की मृत्यु हो गई। फिर एक-एक करके, एक वर्ष के भीतर, उसके सातों बेटे चल बसे। घर सूना हो गया और वह दिन-रात रोती रहती।
एक वर्ष के भीतर उसके सातों बेटों की मृत्यु हो गई।
एक दिन उसने रोते हुए पड़ोस की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों से कहा, 'मैंने जान-बूझकर कभी कोई पाप नहीं किया। हाँ, एक बार मिट्टी खोदते समय अनजाने में मेरे हाथ से साही का एक बच्चा मर गया था।' स्त्रियों ने उसे धीरज बंधाया और कहा, 'तुम कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखो, साही और उसके बच्चों का चित्र बनाकर उनकी पूजा करो और क्षमा मांगो।'
उसने बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों के सामने अपनी भूल मानी। उन्होंने उसे कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखने और क्षमा मांगने को कहा।
कार्तिक कृष्ण अष्टमी आई तो साहूकार की पत्नी ने दिनभर उपवास रखा। शाम को उसने दीवार पर अहोई माता और साही तथा उसके बच्चों का चित्र बनाया, जल से भरा करवा रखा, पूजा की और अपनी भूल के लिए क्षमा मांगी। तारे निकलने पर उसने उन्हें अर्घ्य दिया। वह हर वर्ष इसी तरह यह व्रत रखने लगी।
उसने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को उपवास रखा, अहोई माता और साही का चित्र बनाकर पूजा की, क्षमा मांगी और तारों को अर्घ्य दिया।
उसके सच्चे पछतावे और श्रद्धा से अहोई माता प्रसन्न हुईं। कथा कहती है कि माता की कृपा से उसे अपने सातों बेटे फिर मिल गए और घर में फिर खुशियां लौट आईं। मान्यता है कि तभी से माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से हर वर्ष कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखती हैं।
कथा के अनुसार अहोई माता की कृपा से उसे सातों बेटे फिर मिल गए। तभी से माताएं संतान के लिए यह व्रत रखती हैं।
आरती
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