संतान की दीर्घायु, रक्षा और समृद्धि के लिए अहोई माता (अहोई अष्टमी) व्रत कथा
सम्पूर्ण कथा
कार्तिके कृष्णपक्षे तु अष्टमी तिथिरुत्तमा। अहोईव्रतमुद्दिष्टं मातृभिः पुत्रहेतवे॥ पुरा कश्चिद् गृहे गृहिणी मृत्तिकां खनन्ती सती। अज्ञानात् स्याहीशावकं खुरपेण निहतवती॥
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि अत्यंत उत्तम है, जिस दिन माताएं अपनी संतानों के कल्याण के लिए अहोई व्रत रखती हैं। प्राचीन काल में एक साहुकार की बहु खुरपी से खदान में मिट्टी खोद रही थी। अज्ञानता में उसके हाथ से स्याही (साही) का बच्चा मारा गया।
तस्याः शापेन तद्गृहे सर्वपुत्रा विनशिताः। अहोईमातरं दृष्ट्वा व्रतं कृत्वा विधानतः॥ पुनः लब्ध्वा सुतान् सर्वान् अहोईकृपया सुखी। तस्मात्सर्वैश्च मातृभिः कर्तव्यं व्रतमुत्तमम्॥
उस पाप के प्रायश्चित हेतु साहुकार की बहु ने कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता की चित्र बनाकर विधिपूर्वक पूजा व निर्जला व्रत किया तथा दीपदान किया। अहोई माता की अनुकंपा से उसके मृत पुत्र पुनर्जीवित हो गए। तभी से समस्त माताएं संतान रक्षा हेतु अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।
आरती
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