एक राजा की कथा — बृहस्पतिवार व्रत से खोया हुआ सब वापस मिला और विष्णु कृपा प्रकट हुई
पूजन सामग्री
पूजन विधि(सूर्यास्त तक / Until sunset)
बृहस्पतिवार को प्रातः उठकर स्नान करें। पीले या सफेद वस्त्र पहनें। संकल्प लें — 'मैं ज्ञान, समृद्धि और विष्णु कृपा हेतु बृहस्पतिवार व्रत करता/करती हूँ।'
चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। भगवान विष्णु या बृहस्पति देव का चित्र स्थापित करें। पीले फूलों और केले के पौधे से सजाएं।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें, फिर गंगाजल से।
हल्दी, पीले फूल, चना दाल और पीले फल अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएं।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का 108 बार जाप करें। 'ॐ बृं बृहस्पतये नमः' का 108 बार जाप करें।
पूर्ण ध्यान से बृहस्पतिवार व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
कथा के बाद विष्णु आरती या बृहस्पति आरती करें। सभी को पीला प्रसाद (चने के लड्डू, केला) वितरित करें।
दिनभर उपवास रखें। सूर्यास्त के बाद बिना नमक का एक भोजन करें — प्राथमिकतः पीली चना दाल और चावल। सूर्यास्त पूजन के बाद ही व्रत खोलें।
सम्पूर्ण कथा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ बृं बृहस्पतये नमः॥ गुरु बृहस्पति देवाय नमः॥
भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार। बृहस्पति देव को नमस्कार। गुरु बृहस्पति देव को प्रणाम।
प्राचीन काल में एक राजा था जिसका राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण था। वह प्रजा का पालन माता-पिता की तरह करता था। प्रत्येक बृहस्पतिवार को राजा व्रत रखता, भगवान विष्णु की पूजा करता और ब्राह्मणों को भोजन करवाता था। किंतु उसकी रानी को यह व्रत पसंद नहीं था। वह भोग-विलास में विश्वास रखती थी और व्रत को समय की बर्बादी मानती थी।
एक धार्मिक राजा हर बृहस्पतिवार व्रत करता और ब्राह्मणों को भोजन कराता था। परंतु उसकी रानी इस व्रत को व्यर्थ मानती थी।
एक बृहस्पतिवार को बृहस्पति देव साधु वेश में राजमहल में पधारे। राजा उनकी पूजा करने लगा। रानी ने कहा — 'यह साधु बेकार है। इन्हें भिक्षा देना व्यर्थ है।' साधु वेश में बृहस्पति देव ने रानी से कहा — 'देवी! जो बृहस्पतिवार व्रत का तिरस्कार करती है, उसे इसका फल भोगना पड़ता है।' इतना कहकर वे चले गए। रानी ने कोई ध्यान नहीं दिया।
बृहस्पति देव साधु वेश में आए। राजा ने पूजा की पर रानी ने उनका अपमान किया। बृहस्पति देव ने चेताया और चले गए।
कुछ समय बाद बृहस्पति देव की माया से राज्य में अकाल पड़ गया। धन-संपत्ति नष्ट हो गई। राजा के सात पुत्र थे — सभी परदेश चले गए। राजा अकेला पड़ गया और भिक्षा माँगने को विवश हुआ। रानी पछताई। उसने राजा से क्षमा माँगी और बोली — 'यह सब मेरे व्रत-अपमान का फल है।'
बृहस्पति देव की माया से राज्य में अकाल आ गया। राजा के पुत्र परदेश चले गए और राजा भिखारी हो गया। रानी को अपनी गलती का अहसास हुआ।
उसी नगर में एक बुढ़िया बृहस्पतिवार व्रत करती थी। राजा भिक्षा माँगते हुए उसके घर पहुँचा। बुढ़िया ने उसे व्रत की विधि और कथा बताई — कहा कि 'तुम भी यह व्रत करो।' राजा ने तुरंत व्रत का संकल्प किया। उस दिन उपवास रखा और कथा सुनी।
नगर की एक बुढ़िया ने राजा को बृहस्पतिवार व्रत की विधि बताई। राजा ने तुरंत व्रत का संकल्प लिया।
बृहस्पति देव ने राजा की भक्ति देखकर उसी रात साधु वेश में उसके सपने में आकर कहा — 'हे राजन! उठो। तुम्हारी भक्ति स्वीकार हुई। कल प्रातः तुम्हारे राज्य में स्वर्ण का भंडार प्रकट होगा, तुम्हारे पुत्र वापस आएंगे और तुम्हारा राज्य पुनः समृद्ध होगा।' सवेरे राजा ने देखा — महल में धन भर गया, सातों पुत्र लौट आए, प्रजा प्रसन्न थी। राजा-रानी ने बृहस्पति देव की जय-जयकार की। तब से राज परिवार ने आजीवन बृहस्पतिवार व्रत किया। दीर्घकाल तक सुखपूर्वक राज्य भोगकर दोनों विष्णुलोक को गए। ॥ इति बृहस्पतिवार व्रत कथा सम्पूर्ण ॥ श्री विष्णु भगवान की जय॥ श्री बृहस्पति देव की जय॥
बृहस्पति देव ने स्वप्न में राजा को आशीर्वाद दिया। सुबह धन, पुत्र और राज्य सब वापस मिले। राजा ने आजीवन व्रत किया और अंत में विष्णुलोक गए।
॥ व्रत फल ॥ जो मनुष्य बृहस्पतिवार का व्रत श्रद्धापूर्वक करता है और कथा सुनता है — बृहस्पति देव की कृपा से उसे ज्ञान, धन, यश और परिवार में सुख-शांति मिलती है। संतानहीन को संतान, निर्धन को धन और मोक्षार्थी को मोक्ष मिलता है। ॥ श्री विष्णु भगवान की जय॥
व्रत फल: बृहस्पतिवार व्रत से ज्ञान, धन, संतान, यश और अंत में मोक्ष मिलता है।
आरती
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