पद्म पुराण से भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्ना एकादशी देवी की प्राकट्य कथा
सम्पूर्ण कथा
युधिष्ठिर उवाच— एकादश्यास्तु माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि केशव। कथं जाता त्वेकादशी का वा पूज्या च देवता॥ श्रीकृष्ण उवाच— सत्ययुगे मुरासुरो नाम दैत्यश्चासीन्महाबलः। तेन देवाः पराजिताः स्वर्गान्निःसारिता भृशम्॥
युधिष्ठिर ने कहा— हे केशव! मैं एकादशी तिथि का माहात्म्य सुनना चाहता हूँ। एकादशी देवी का प्राकट्य कैसे हुआ और इसकी अधिष्ठात्री देवता कौन हैं? श्री भगवान कृष्ण बोले— सत्ययुग में 'मुर' नाम का अत्यंत बलवान दैत्य था। उसने समस्त देवगणों को पराजित कर स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था। (मुख्य तिथि की खगोलीय गणना हेतु हमारी एकादशी व्रत गाइड [Ekadashi Observance](/festival/ekadashi) देखें)।
विष्णुना सह दैत्यस्य युद्धमभवदद्भूतम्। हेमवत्यां गुहायां तु सुप्ते नारायणप्रभौ॥ विष्णोर्देहात्समुत्पन्ना दिव्या कन्या महाबला। सा कन्या निहता दैत्यं मुरं शस्त्रैः समन्ततः॥
भगवान विष्णु के साथ मुर दैत्य का हजार वर्षों तक अद्भुत युद्ध हुआ। तदनंतर जब भगवान नारायण बदरिकाश्रम की हेमवती गुफा में विश्राम कर रहे थे, तब भगवान के दिव्य शरीर से एक अत्यंत तेजस्विनी और महाबली कन्या का प्राकट्य हुआ। उस कन्या ने अपने अस्त्र-शस्त्रों से पापी मुर दैत्य का वध कर दिया।
प्रबुद्धो भगवान् विष्णुराहाहो सुव्रता प्रिये। एकादश्यां समुत्पन्ना तस्मादेकादशी भवेत्॥ मम प्रिया तिथिरेषा सर्वपापहरा शुभा। त्वद्व्रतं ये करिष्यन्ति ते यास्यन्ति परमं पदम्॥
जागने पर भगवान विष्णु ने उस कन्या को देखकर प्रसन्न होकर कहा— हे प्रिये! तुम मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को मेरे शरीर से प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम 'एकादशी' होगा। यह तिथि मुझे अत्यंत प्रिय होगी और समस्त पापों का नाश करने वाली होगी। जो मनुष्य एकादशी व्रत का पालन करेंगे, वे मेरे परम धाम को प्राप्त करेंगे।
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