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पाठ/कथा/Ekadashi Devi & Vishnu
Ekadashi Devi & Vishnu · व्रत कथा

एकादशी व्रत कथा

एकादशी की उत्पत्ति और मुर दानव के वध की कथा — पद्म पुराण से

पारंपरिक माहात्म्यपद्म पुराण · उत्तर खण्ड
व्रत:एकादशी

इस कथा के बारे में

इस अध्याय में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि एकादशी कैसे उत्पन्न हुई, और श्रीकृष्ण मुर दानव की कथा सुनाते हैं। इसी अध्याय में व्रत के तीन रूप बताए गए हैं: उपवास, नक्त और एकभक्त।

↓ पूजन सामग्री↓ पूजन विधि↓ सम्पूर्ण कथा↓ आरती
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पूजन सामग्री

॰भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र या प्रतिमा
॰तुलसी दल
॰फूल और माला
॰घी का दीपक और धूप
॰फल, और अन्न रहित नैवेद्य
॰जल, और कई घरों में पंचामृत
॰रोली या चंदन
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पूजन विधि(एकादशी से द्वादशी के पारण तक / From Ekadashi until the parana on Dwadashi)

1

अध्याय के अनुसार: दशमी को, यानी एक दिन पहले, एक ही बार भोजन करें।

2

अध्याय के अनुसार: एकादशी को स्नान करके केशव की पूजा करें और दीपदान करें।

3

अध्याय के अनुसार: उस दिन सोना और मैथुन वर्जित है। दिन धर्म-चर्चा में बिताएं और रात्रि जागरण करें।

4

अध्याय के अनुसार: दक्षिणा दें, और शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की एकादशी में भेद न करें।

5

रीति: व्रत का प्रकार परिवार और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है; इस अध्याय में उपवास, नक्त और एकभक्त का उल्लेख है।

6

रीति: एकादशी को चावल और अन्न न खाना प्रचलित रीति है; इस अध्याय में यह नहीं कहा गया। तुलसी अर्पित की जाती है, और शाम को कथा सुनी या पढ़ी जाती है।

7

पारण: व्रत का पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि के रहते किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।

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सम्पूर्ण कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि एकादशी तिथि कैसे उत्पन्न हुई, वह पवित्र कैसे मानी गई और देवताओं को प्रिय क्यों है। उत्तर में श्रीकृष्ण ने उन्हें यह कथा सुनाई।

युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण एकादशी की उत्पत्ति की कथा सुनाते हैं।

कृतयुग में मुर नाम का एक दानव था, जो बहुत भयंकर था और सब देवता उससे डरते थे। वह तालजंघ नाम के दानव का पुत्र था और चंद्रावती नाम की पुरी में रहता था। उसने इंद्र सहित सब देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया। इंद्र, वायु, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य और वरुण के स्थान पर उसने दूसरों को बैठा दिया। देवता पृथ्वी पर भटकने लगे।

तालजंघ के पुत्र मुर दानव ने देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया।

डरे हुए देवता भगवान महादेव के पास गए और इंद्र ने उन्हें सारी बात बताकर उपाय पूछा। महादेव ने कहा कि जगत के रक्षक, गरुड़ध्वज भगवान विष्णु की शरण में जाओ। इंद्र देवताओं के साथ वहाँ पहुँचे और उन्होंने भगवान विष्णु को जल के बीच सोते हुए देखा।

महादेव के कहने पर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए।

इंद्र ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति की और कहा कि दानव से डरे हुए देवता आपकी शरण में आए हैं, हमारी रक्षा कीजिए। भगवान ने पूछा कि वह दानव कैसा है, उसका बल कितना है और वह कहाँ रहता है। इंद्र ने मुर के बारे में सब बताया। यह सुनकर भगवान विष्णु क्रोधित हुए और उन्होंने उस दानव को मारने का निश्चय किया।

इंद्र की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने मुर को मारने का निश्चय किया।

भगवान विष्णु देवताओं के साथ चंद्रावती पुरी गए। मुर ने उन्हें देखकर ललकारा। पहले दानवों की सेना सामने आई; भगवान ने दिव्य बाणों और चक्र से उसे नष्ट कर दिया। पर मुर अकेला लड़ता रहा। देवता तितर-बितर हो गए। फिर मुर और भगवान विष्णु के बीच एक हजार दिव्य वर्षों तक बाहुयुद्ध हुआ।

चंद्रावती में भगवान ने दानव सेना को नष्ट किया, फिर मुर से एक हजार दिव्य वर्षों तक बाहुयुद्ध हुआ।

कथा कहती है कि उस लंबे युद्ध से थके हुए भगवान विष्णु मुर से पराजित होकर बदरिकाश्रम चले गए। वहाँ सिंहावती नाम की एक गुफा थी, बारह योजन की और एक ही द्वार वाली। भगवान उसमें जाकर सो गए। मुर उनका पीछा करता हुआ गुफा में घुस आया। उन्हें सोता देखकर वह प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें मारने का निश्चय किया।

युद्ध से थके भगवान बदरिकाश्रम की सिंहावती गुफा में जाकर सो गए; मुर उन्हें मारने वहाँ पहुँचा।

तभी भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई। वह रूपवती थी, दिव्य अस्त्र-शस्त्र लिए हुए थी और भगवान के तेज के अंश से उत्पन्न हुई थी। मुर ने उसे देखा और उससे युद्ध करने लगा। वह कन्या हर प्रकार के युद्ध में निपुण थी। उसकी हुंकार से मुर जलकर भस्म हो गया। दानव के मारे जाने पर भगवान विष्णु जाग गए।

भगवान के शरीर से एक कन्या प्रकट हुई, जिसकी हुंकार से मुर भस्म हो गया।

भगवान ने दानव को मरा हुआ देखा तो उन्हें आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा कि मेरे इस भयंकर शत्रु को किसने मारा। कन्या ने बताया कि इस दानव ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था और आपको सोता देखकर मारने आया था। भगवान ने पूछा कि जिससे मैं भी हार गया, उसे तुमने कैसे जीत लिया। उसने उत्तर दिया कि हे स्वामी, आपकी ही कृपा से मैंने इस महादैत्य को मारा है। इस स्थान से कथा उसे एकादशी नाम से पुकारती है।

जागकर भगवान ने पूछा कि मुर को किसने मारा; कन्या ने कहा कि आपकी कृपा से मैंने। यहाँ से कथा उसे एकादशी कहती है।

भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उससे वर माँगने को कहा। एकादशी ने उनसे तीन वचन माँगे, और भगवान ने वचन दिया। तब उसने कहा कि आपकी कृपा से मैं सब तीर्थों में प्रधान, सब विघ्नों का नाश करने वाली और सब सिद्धि देने वाली बनूँ; जो लोग भक्ति से मेरा उपवास करें उन्हें सिद्धि मिले; और जो उपवास, नक्त या एकभक्त करे, उसे आप धन, धर्म और मोक्ष दें। भगवान विष्णु ने कहा कि जो तुम कहती हो, वह सब होगा।

एकादशी ने तीन वचन माँगे और भगवान विष्णु ने कहा कि जो वह कहती है, वह सब होगा।

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आरती

मुख्य आरती

ॐ जय जगदीश हरे

पूरी आरती →

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे संपूर्ण जगत् के स्वामी ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के कष्टों तथा संकटों को एक क्षण में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

जो आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और उसके मन का दुख दूर हो जाता है। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप ही मेरे माता और पिता हैं, मैं आपके सिवा किसकी शरण में जाऊं? आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई आशा रखूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप परिपूर्ण परमात्मा और सभी के हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दया और करुणा के सागर हैं तथा संपूर्ण जगत् के पालनहार हैं। मैं अज्ञानता और कामनाओं से घिरा हुआ हूँ, हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं और सभी जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु प्रभु! मुझ जैसा सीमित बुद्धि वाला जीव आपको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

दीन-बंधु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दीनों के बंधु और दुखों का हरण करने वाले मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अपना कृपाहस्त उठाकर मुझे संभालिए।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे देव! मेरे मन के विषय-विकारों और पापों को नष्ट कर दीजिए। मेरे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सत्पुरुषों की सेवा की भावना को बढ़ाइए।

तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मेरा शरीर, मन और धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। जो आपका है, वही आपको समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना क्या है?