माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए किए गए कठोर तप की पावन कथा
सम्पूर्ण कथा
श्रीभगवानुवाच— शृणु देवि प्रवक्ष्यामि व्रतमेतदनुत्तमम्। भाद्रपदे तृतीयायां हरितालिकाभिधम्॥ पुरा त्वया कृता देवी बाल्ये तपो महान् हि मे। हिमाचलस्य दुर्गे तु गङ्गातीरे मनोहरे॥
भगवान शिव बोले— हे देवी! भाद्रपद शुक्ल तृतीया को किया जाने वाला यह अत्यंत उत्तम 'हरितालिका' व्रत सुनो। प्राचीन काल में बाल्यावस्था में तुमने मुझे पति रूप में पाने के लिए हिमालय पर्वत के गंडकी नदी के तट पर अत्यंत कठोर तपस्या की थी।
सखीभिर्हरिता यस्माद् अरण्यं गहनं प्रति। तस्माद्धरितालिकेति ख्यातिं लोकेषु संस्थिता॥ वालुकालिङ्गमाश्रित्य रात्रौ जागरण मया। तुष्टोऽहं तेन रूपेण वरं दत्तवान् पतिः॥
चूंकि तुम्हारी सखियों ने तुम्हें पिता के गृह से हरण (अदृश्य) करके सघन वन में पहुंचा दिया था, इसलिए इस व्रत का नाम 'हरितालिका' प्रसिद्ध हुआ। वन में तुमने बालू (रेत) का शिवलिंग बनाकर निराहार-निर्जला व्रत रखा और रात्रि-जागरण किया, जिससे प्रसन्न होकर मैंने तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
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