शुक्रवार को रखे जाने वाले भगवती संतोषी माता व्रत की पावन कथा
सम्पूर्ण कथा
पुरा कश्चिद् बुधा बुधे गृहे सप्तात्मजाः स्थिताः। कनिष्ठस्य वधूः दीना श्वश्र्वा बहु प्रपीडिता॥ शुक्रवारे व्रतं कृत्वा चणकगुड़भोजनैः। संतोषीमातुः कृपया सर्वान् कामानवाप्तवती॥
प्राचीन समय में एक वृद्धा के सात पुत्र थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी अत्यंत सरल स्वभाव की थी, किंतु उसकी सास और जेठानियां उससे दुर्व्यवहार करती थीं। एक दिन उसने १६ शुक्रवार के संतोषी माता व्रत का नियम लिया, जिसमें गुड़ और भुने हुए चने का प्रसाद चढ़ाया जाता है तथा खट्टे पदार्थों का पूर्ण परित्याग किया जाता है। माता की अनुकंपा से उसके पति का व्यापार समृद्ध हुआ और उसके सारे कष्ट दूर हो गए।
अम्लं तु वर्जयेत् सर्वं शुक्रवारे हि सर्वदा। संतोषीमातरं ध्यात्वा लभते सन्ततिं सुखम्॥ उद्यापनं ततः कृत्वा सर्वबाधाद्विमुच्यते। मङ्गलं कुरुते देवी सर्वदा स्वभक्तकेषु॥
संतोषी माता के व्रत में शुक्रवार के दिन स्वयं तथा परिवार के किसी सदस्य द्वारा खट्टा भोजन करना वर्जित है। १६ शुक्रवार व्रत रखकर उद्यापन करने से समस्त विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं, संतान सुख प्राप्त होता है और भगवती अपने भक्तों के घर में नित्य मंगल प्रदान करती हैं।
आरती
अन्य आरतियाँ
