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पाठ/कथा/Santoshi Mata
Santoshi Mata · व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

शुक्रवार को रखे जाने वाले भगवती संतोषी माता व्रत की पावन कथा

सम्पूर्ण कथा आरती

सम्पूर्ण कथा

पुरा कश्चिद् बुधा बुधे गृहे सप्तात्मजाः स्थिताः। कनिष्ठस्य वधूः दीना श्वश्र्वा बहु प्रपीडिता॥ शुक्रवारे व्रतं कृत्वा चणकगुड़भोजनैः। संतोषीमातुः कृपया सर्वान् कामानवाप्तवती॥

प्राचीन समय में एक वृद्धा के सात पुत्र थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी अत्यंत सरल स्वभाव की थी, किंतु उसकी सास और जेठानियां उससे दुर्व्यवहार करती थीं। एक दिन उसने १६ शुक्रवार के संतोषी माता व्रत का नियम लिया, जिसमें गुड़ और भुने हुए चने का प्रसाद चढ़ाया जाता है तथा खट्टे पदार्थों का पूर्ण परित्याग किया जाता है। माता की अनुकंपा से उसके पति का व्यापार समृद्ध हुआ और उसके सारे कष्ट दूर हो गए।

अम्लं तु वर्जयेत् सर्वं शुक्रवारे हि सर्वदा। संतोषीमातरं ध्यात्वा लभते सन्ततिं सुखम्॥ उद्यापनं ततः कृत्वा सर्वबाधाद्विमुच्यते। मङ्गलं कुरुते देवी सर्वदा स्वभक्तकेषु॥

संतोषी माता के व्रत में शुक्रवार के दिन स्वयं तथा परिवार के किसी सदस्य द्वारा खट्टा भोजन करना वर्जित है। १६ शुक्रवार व्रत रखकर उद्यापन करने से समस्त विघ्न-बाधाएं नष्ट होती हैं, संतान सुख प्राप्त होता है और भगवती अपने भक्तों के घर में नित्य मंगल प्रदान करती हैं।

आरती

मुख्य आरती

जय संतोषी माता

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जय संतोषी माता, जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की, सुख-सम्पत्ति दाता॥ जय संतोषी माता॥

हे संतोषी माता! आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं।

सोने का सिंहासन, सिर पर छत्र विराजे। देख तुम्हारी ज्योति, त्रिभुवन मन राजे॥ जय संतोषी माता॥

आप सुनहरे सिंहासन पर विराजित हैं और सिर पर छत्र शोभायमान है। आपकी ज्योति देखकर तीनों लोकों का मन प्रसन्न हो जाता है।

शुक्रवार प्रिय मानत, चना गुड़ चढ़ावत। धूप दीप नैवेद्य से, भक्त मन भावत॥ जय संतोषी माता॥

आपको शुक्रवार प्रिय है। चना और गुड़ चढ़ाया जाता है। धूप, दीप और नैवेद्य से भक्तों का मन प्रसन्न होता है।

ब्रह्मा विष्णु महेश की, तुम उत्पत्ति दाता। जो भी शरण में आए, मनोरथ पाता॥ जय संतोषी माता॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति की दात्री माता आप हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

दुखियों के दुख हरती, सुख का वरदान। संतोषी माता की, जय जय गुणगान॥ जय संतोषी माता॥

आप दुखियों के दुख हरने वाली और सुख का वरदान देने वाली हैं। संतोषी माता की जय-जयकार और गुणगान हो।

अन्य आरतियाँ

अम्बे तू है जगदम्बे काली

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अम्बे तू है जगदम्बे काली। जय दुर्गे खप्पर वाली तेरे भक्त जनों पर, मैया माँ तेरे भक्त जनों पर, भार नहीं कोई भारी॥