स्कन्द पुराण रेवाखण्ड — सम्पूर्ण पाँचों अध्याय, पूजन सामग्री, विधि और आरती सहित
पूजन सामग्री
पूजन विधि(2–3 घंटे / 2–3 hours)
प्रातःकाल उठकर स्नान करें और पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। भगवान सत्यनारायण का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
सायंकाल चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं। आम के पत्ते सजाएं और कलश स्थापित करें — जल भरे कलश में आम के पत्ते रखें, ऊपर नारियल रखें, मौली बाँधें।
चौकी पर भगवान सत्यनारायण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दोनों ओर केले के पत्ते लगाएं।
पंजीरी प्रसाद तैयार करें: देशी घी में गेहूँ का आटा सुनहरा होने तक भूनें। ठंडा होने पर पिसी चीनी, मसले केले, दूध, काजू, किशमिश और तुलसी पत्ते मिलाएं।
सर्वप्रथम गणेश जी का पूजन करें — रोली, अक्षत, फूल चढ़ाएं और विघ्नों से रक्षा की प्रार्थना करें।
भगवान सत्यनारायण का आवाहन करें — 'ॐ सत्यनारायणाय नमः — आवाहयामि।' षोडशोपचार पूजन करें — आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृत अभिषेक, शुद्ध जल स्नान, पीत वस्त्र, जनेऊ, चन्दन, तुलसी माला, धूप, दीप, पंजीरी नैवेद्य, पान-सुपारी और दक्षिणा अर्पित करें।
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का 108 बार और 'ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः' का 108 बार जप करें।
परिवारजन व अतिथि पूर्वाभिमुख बैठें, हाथ में फूल और अक्षत लें। पूर्ण भक्तिभाव से पाँचों अध्यायों की कथा सुनें।
प्रत्येक अध्याय के बाद 'श्री सत्यनारायण भगवान की जय!' बोलें। कथा के मध्य में उठकर न जाएं — यह सबसे महत्वपूर्ण नियम है।
कथा के पश्चात् आरती करें — श्री सत्यनारायण आरती और ओम जय जगदीश हरे। सभी को पंजीरी प्रसाद वितरित करें। किसी को भी प्रसाद लिए बिना न जाने दें।
सम्पूर्ण कथा
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः॥ श्री गणेशाय नमः। श्री लक्ष्मी सहित सत्यनारायणाय नमः॥
हे भगवान वासुदेव! आपको नमस्कार। श्री सत्यनारायण देव को प्रणाम। श्री गणेश जी को नमस्कार। लक्ष्मी सहित श्री सत्यनारायण भगवान को नमस्कार।
एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा — 'हे प्रभु! इस कलियुग में थोड़े समय में ही पुण्य मिले और मनोवांछित फल प्राप्त हो जाए — ऐसा कोई उत्तम व्रत बताइए।' सूत जी बोले — 'जो व्रत नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था वही उत्तम व्रत मैं आपको बताऊँगा। ध्यान से सुनिए।'
एक बार नैमिषारण्य के पवित्र वन में शौनक आदि ऋषिगण सूत जी के पास एकत्रित हुए। उन्होंने कलियुग में आसानी से पुण्य प्राप्ति का मार्ग पूछा। सूत जी ने कहा कि जो व्रत नारद मुनि ने स्वयं भगवान नारायण से जाना वही मैं बताता हूँ।
योगीराज नारद जी एक समय अनेकों लोकों में घूमते हुए मृत्युलोक में पधारे। यहाँ उन्होंने असंख्य प्राणियों को अपने कर्मों से उत्पन्न दुखों में पीड़ित देखा। उनके दुःख देखकर नारद जी ने सोचा — 'ऐसा कौन सा उपाय है जिससे इन प्राणियों के समस्त दुख दूर हो जाएं?' इसी चिंतन के साथ वे भगवान नारायण के विष्णुलोक में पहुँचे।
नारद मुनि सम्पूर्ण लोकों में भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोक में आए और यहाँ के प्राणियों को कर्मजनित कष्टों में पीड़ित देखा। प्राणियों के दुख से द्रवित होकर वे भगवान विष्णु के धाम में गए।
विष्णुलोक में नारद जी ने चतुर्भुज भगवान नारायण — जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे — उनकी स्तुति की। भगवान ने प्रसन्न होकर पूछा — 'हे मुनिश्रेष्ठ! आप किस प्रयोजन से पधारे हैं?' नारद जी बोले — 'प्रभु! पृथ्वीलोक के प्राणी अनेक दुखों से पीड़ित हैं। कृपया कोई सुगम उपाय बताइए।' भगवान श्रीहरि बोले — 'हे नारद! श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत सबसे श्रेष्ठ है। यह व्रत करने से मनुष्य इसी जन्म में सुख पाता है और मृत्यु के बाद मोक्ष को प्राप्त होता है।'
नारद जी ने विष्णु भगवान की स्तुति की। भगवान ने उनके प्रश्न पर श्री सत्यनारायण व्रत का वर्णन किया और बताया कि यह व्रत इस जन्म में सुख और मृत्यु के बाद मोक्ष देता है।
भगवान ने व्रत की विधि बताई — 'हे नारद! शाम के समय परिजनों के साथ भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण का पूजन करो। गेहूँ का आटा, केले, घी, दूध और शक्कर सवाया लेकर प्रसाद (पंजीरी) बनाओ। तुलसी दल अवश्य चढ़ाओ — बिना तुलसी के यह पूजन अधूरा है। कथा श्रवण करो और सभी को प्रसाद वितरित करो।' ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
भगवान ने व्रत की पूरी विधि समझाई — शाम को परिवार सहित सवाया सामग्री से पंजीरी बनाकर, तुलसी अर्पित कर, कथा सुनकर और सभी को प्रसाद देकर यह व्रत करें।
सूत जी बोले — 'हे ऋषियों! सुनो — किसने सबसे पहले इस व्रत को किया था।' सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख-प्यास से परेशान वह भिक्षा के लिए धरती पर भटकता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम रखने वाले भगवान ने एक दिन वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर उससे पूछा — 'हे विप्र! तुम नित्य दुखी होकर क्यों भटकते हो?'
काशी के एक निर्धन ब्राह्मण की बात सुनाते हुए सूत जी ने बताया — वह ब्राह्मण अत्यंत गरीब था। एक दिन स्वयं भगवान ने वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उससे उसके दुख का कारण पूछा।
दीन ब्राह्मण बोला — 'मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ, भिक्षा के लिए घूमता हूँ। यदि आप कोई उपाय जानते हों तो बताइए।' वृद्ध ब्राह्मण बने भगवान ने कहा — 'श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं। उनका व्रत करो — इससे तुम सभी दुखों से मुक्त होकर धनवान बन जाओगे।' यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। उस रात ब्राह्मण को नींद नहीं आई। प्रातः उठकर भिक्षा के लिए गया — उस दिन इतना धन मिला जितना पहले कभी नहीं मिला था।
ब्राह्मण ने अपनी दरिद्रता बताई। वृद्ध ब्राह्मण के रूप में भगवान ने सत्यनारायण व्रत का उपदेश दिया और अंतर्धान हो गए। अगले दिन उसे पर्याप्त भिक्षा मिली।
ब्राह्मण ने उस धन से परिजनों के साथ श्री सत्यनारायण व्रत पूर्ण विधि से संपन्न किया। व्रत के प्रभाव से वह समस्त दुखों से मुक्त हो गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से संपन्न हो गया। तब से वह हर माह यह व्रत करने लगा। लकड़हारे की कथा: एक बार उसी ब्राह्मण के घर व्रत हो रहा था। एक वृद्ध लकड़हारा लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर आया। प्यास से व्याकुल उसने पूछा — 'यह क्या हो रहा है?' ब्राह्मण ने व्रत की महिमा बताई। लकड़हारे ने प्रसाद ग्रहण किया और चला गया।
व्रत के प्रभाव से ब्राह्मण धनवान हो गया और प्रति माह व्रत करने लगा। एक लकड़हारे ने व्रत के बारे में सुना और प्रसाद ग्रहण किया।
लकड़हारे ने संकल्प किया — 'आज जो धन मिलेगा उससे सत्यनारायण भगवान का व्रत करूँगा।' वह नगर गया और उस दिन लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना मिला। प्रसन्न होकर उसने घी, शक्कर, गेहूँ का आटा, केले लेकर परिजनों के साथ विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान का पूजन किया। भगवान की कृपा से वह धन-पुत्र से युक्त होकर संसार के सुख भोगता हुआ अंतकाल में बैकुंठ धाम को गया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
लकड़हारे ने व्रत का संकल्प लिया। उसी दिन चार गुना धन मिला। उसने विधिपूर्वक व्रत किया और अंत में बैकुंठ को गया।
भद्रशीला नदी के तट पर राजा उल्कामुख अपनी पत्नी के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत कर रहे थे। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य — जो व्यापार के लिए वहाँ से गुजर रहा था — ने राजा को पूछा — 'राजन! यह व्रत क्या है?' राजा ने पुत्रप्राप्ति के लिए किए जाने वाले इस व्रत का वर्णन किया। निःसंतान साधु ने सुनकर कहा — 'राजन! मेरी भी संतान नहीं है। जब संतान होगी तब मैं यह व्रत करूँगा।'
राजा उल्कामुख नदी तट पर व्रत कर रहे थे। वहाँ से गुजरते साधु वैश्य ने व्रत का महत्व जाना। उसने संकल्प लिया कि संतान होने पर वह भी यह व्रत करेगा।
भगवान की कृपा से साधु वैश्य की पत्नी लीलावती गर्भवती हुई। दसवें महीने उनके घर एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ जिसे माता-पिता ने 'कलावती' नाम दिया। वह दिनोंदिन शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की तरह बढ़ने लगी। लीलावती ने पति को याद दिलाया — 'आपने व्रत का संकल्प लिया था।' साधु बोला — 'इसके विवाह पर करूँगा।' और नगर चला गया। कलावती के विवाह पर भी साधु ने व्रत नहीं किया। इस पर भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गए।
साधु के यहाँ कलावती का जन्म हुआ। पत्नी ने बार-बार व्रत की याद दिलाई पर साधु ने पहले पुत्री के जन्म पर, फिर विवाह पर करने का टाल-मटोल किया। भगवान रुष्ट हो गए।
साधु जमाई को लेकर व्यापार के लिए रत्नासारपुर गया। भगवान की माया से एक चोर ने राजा का धन चुराया और उसे साधु के पड़ाव के पास छोड़ भागा। सिपाहियों ने धन साधु के पास देखकर ससुर-जमाई दोनों को बंदी बना लिया। राजा ने उन्हें कठिन कारावास में डाल दिया। घर में जो धन था वह चोर चुरा ले गए। साधु की पत्नी लीलावती अत्यंत दुखी हो गई।
भगवान की माया से साधु और उसके दामाद पर चोरी का झूठा आरोप लगा और दोनों जेल में डाल दिए गए। घर का धन भी चोरी हो गया।
दुखी कलावती एक ब्राह्मण के घर गई जहाँ सत्यनारायण व्रत हो रहा था। उसने कथा सुनी और प्रसाद ग्रहण किया। घर लौटकर माता को बताया। लीलावती ने तुरंत व्रत किया और वर माँगा — 'मेरे पति और जमाई शीघ्र घर लौटें।' उसी रात राजा को स्वप्न आया — 'साधु निर्दोष है। उसे कल सवेरे छोड़ दो नहीं तो तेरा राज्य नष्ट होगा।' राजा ने प्रातः दोनों को मुक्त किया और उनका धन वापस किया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तृतीय अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
कलावती ने सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी। लीलावती ने व्रत किया। उसी रात राजा को स्वप्न में आदेश मिला और साधु तथा दामाद को रिहा कर दिया गया।
मुक्त होने के बाद साधु वैश्य नाव लेकर अपने नगर की ओर चले। कुछ दूर जाने पर दण्डी वेश में भगवान सत्यनारायण मिले और पूछा — 'नाव में क्या है?' अभिमान में आकर साधु ने हँसते हुए कहा — 'देखते नहीं? बेल और पत्ते हैं।' भगवान बोले — 'तुम्हारा वचन सत्य हो!' — और चले गए। दण्डी के जाने पर साधु ने नाव में देखा तो सच में बेल-पत्ते भरे थे। वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।
घर जाते समय भगवान दण्डी वेश में मिले। साधु ने अहंकार में असत्य वचन कहे कि नाव में बेल-पत्ते हैं। भगवान ने वैसा ही कर दिया।
दामाद ने कहा — 'यह दण्डी (भगवान) का शाप है। हमें उनकी शरण में जाना चाहिए।' साधु भगवान के पास गया और विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगी — 'हे प्रभु! मेरे असत्य वचन के लिए क्षमा करें। मैं अज्ञानी हूँ।' भगवान प्रसन्न हुए और वरदान दिया — नाव में धन वापस भर गया। अब साधु नगर के पास पहुँचा और दूत को घर भेजा।
दामाद की सलाह पर साधु ने भगवान से क्षमा माँगी। भगवान ने नाव में धन वापस कर दिया। साधु नगर के पास पहुँचा।
लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण पूजन किया। फिर कलावती से कहा — 'तू कार्य पूरा करके शीघ्र आ।' कलावती जल्दी में प्रसाद लिए बिना ही पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा से भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित कलावती के पति को जल में डुबो दिया। कलावती पति को वहाँ न पाकर रोती हुई जमीन पर गिर पड़ी। तब आकाशवाणी हुई — 'हे साधु! कलावती प्रसाद छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हुआ। वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करे तो उसे पति मिलेगा।' कलावती घर जाकर प्रसाद ग्रहण किया — पति प्रकट हो गया। ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण ॥ श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़कर गई। भगवान ने उसके पति को अदृश्य कर दिया। आकाशवाणी से ज्ञात हुआ — प्रसाद ग्रहण करो तो पति मिलेगा। कलावती ने प्रसाद लिया और पति मिल गया। सीख: प्रसाद की कभी अवज्ञा न करें।
सूत जी बोले — 'हे ऋषियों! एक और कथा सुनो।' तुंगध्वज नाम का एक राजा था जो वन में शिकार कर लौट रहा था। राह में उसने एक वृक्ष के नीचे ग्वालों को भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। राजा ने अहंकारवश उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में न गया, न भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने प्रेमपूर्वक प्रसाद दिया — पर राजा ने अभिमान से प्रसाद वहीं छोड़ दिया और अपने नगर को चल दिया।
राजा तुंगध्वज शिकार से लौटते हुए ग्वालों को सत्यनारायण पूजन करते देखा। अभिमान में उसने न नमस्कार किया और न प्रसाद ग्रहण किया।
नगर में पहुँचते ही राजा को पता चला — उसके सौ पुत्र मर गए, खजाना लुट गया, राज्य में विपदाएं आ गईं। राजा समझ गया — यह भगवान सत्यनारायण की अवज्ञा का परिणाम है। वह दौड़कर उन ग्वालों के पास पहुँचा जहाँ अभी भी पूजा चल रही थी। उसने विधिपूर्वक व्रत किया और श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से राजा के पुत्र जीवित हो गए, धन वापस मिला और राज्य पुनः समृद्ध हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगकर अंत में राजा स्वर्गलोक को गया।
राजा के सौ पुत्र मर गए और राज्य उजड़ गया। राजा लौटकर व्रत किया और प्रसाद ग्रहण किया। सब कुछ पूर्ववत हो गया और अंत में स्वर्ग मिला।
सूत जी बोले — 'जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को श्रद्धा से करेगा उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी, निर्धन धनी होगा, संतानहीन को संतान मिलेगी और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होगी। पाँचों व्रत के पात्रों ने अगले जन्मों में भी भगवान की कृपा पाई — वृद्ध ब्राह्मण ने सुदामा के रूप में, लकड़हारे ने निषाद के रूप में, राजा उल्कामुख ने दशरथ के रूप में, साधु वैश्य ने मोरध्वज के रूप में और राजा तुंगध्वज ने स्वयंभू रूप में मोक्ष प्राप्त किया।' ॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण ॥ ॥ इति सम्पूर्ण श्री सत्यनारायण व्रत कथा संपूर्ण ॥ श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ॥
कथा का सार: इस व्रत के सभी पात्रों को इस जन्म और अगले जन्मों में भी भगवान की कृपा मिली। व्रत से धन, संतान, सुख और मोक्ष — सब मिलता है।
आरती
अन्य आरतियाँ
