वीरवती और पतिव्रता करवा की पारंपरिक कथा — कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
इस कथा के बारे में
कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की शाम, चंद्रोदय से पहले, सुहागिन महिलाएं एकत्र होकर यह कथा सुनती हैं। सामान्यतः दो कथाएं कही जाती हैं: वीरवती की, जिसका व्रत नकली चंद्रमा से टूट गया था, और करवा की, जिसने अपने पति को मगरमच्छ से बचाया।
पूजन सामग्री
पूजन विधि(सूर्योदय से चंद्रोदय तक / From sunrise until moonrise)
संकल्प: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की सुबह स्नान करके चंद्रोदय तक व्रत रखने का संकल्प लें। पंजाब और उत्तर-पश्चिम में सास की दी हुई सरगी भोर से पहले खाई जाती है; अन्य क्षेत्रों में यह रीति नहीं है।
पूजा स्थान की तैयारी: सूर्यास्त से पहले पूजा का स्थान साफ करें। चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर शिव-पार्वती, गणेश जी और कार्तिकेय का चित्र या प्रतिमा रखें।
करवा: करवे में जल भरें और ढक्कन पर गेहूं या मिठाई रखें। करवे पर रोली-अक्षत का टीका लगाएं और कलावा बांधें।
कथा श्रवण: शाम को परिवार या पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर, हाथ में गेहूं के कुछ दाने लेकर, कथा सुनें। कई जगह पारंपरिक गीत गाते हुए थालियां फेरी जाती हैं।
गौरी पूजन: माता पार्वती को सुहाग सामग्री और प्रसाद अर्पित करें, बड़ों का आशीर्वाद लें और चंद्रोदय की प्रतीक्षा करें।
चंद्र दर्शन और अर्घ्य: चंद्रमा निकलने पर दीपक जलाकर छलनी से चंद्रमा के दर्शन करें और जल का अर्घ्य दें।
व्रत खोलना: रीति के अनुसार इसके बाद पत्नी छलनी से पति को देखती है, और व्रत जल तथा मिठाई से खोला जाता है, कई घरों में पति के हाथ से। यह रीति परिवार-परिवार में अलग है।
सम्पूर्ण कथा
बहुत समय पहले एक धर्मात्मा के सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरवती था। सात भाइयों की अकेली बहन होने के कारण वह सबकी लाड़ली थी। विवाह के बाद कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को वीरवती अपने मायके आई हुई थी। उसने घर की सुहागिन स्त्रियों के साथ करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा।
वीरवती सात भाइयों की इकलौती बहन थी। विवाह के बाद उसने मायके में करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा।
दिन ढलते-ढलते भूख और प्यास से वीरवती बेहाल होकर मूर्छित होने लगी। भाइयों से बहन का यह कष्ट देखा नहीं गया। उन्होंने दूर एक ऊंचे वटवृक्ष पर चढ़कर छलनी की ओट में जलता दीपक रख दिया और बहन से कहा कि चंद्रमा निकल आया है, अर्घ्य देकर भोजन कर लो। वीरवती ने भाइयों पर विश्वास करके उसी प्रकाश को चंद्रमा समझा, अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई। जैसे ही उसने पहला ग्रास मुंह में रखा, समाचार मिला कि उसके पति का देहांत हो गया है।
बहन का कष्ट न देख पाने पर भाइयों ने छलनी के पीछे दीपक रखकर नकली चंद्रमा दिखा दिया। वीरवती ने व्रत खोल लिया और तभी उसके पति की मृत्यु का समाचार आया।
वीरवती शोक में विलाप करने लगी। उसकी पुकार सुनकर माता पार्वती प्रकट हुईं और बताया कि तुम्हारा व्रत छल के कारण चंद्रोदय से पहले टूट गया था। देवी ने उसे धैर्य बंधाया और कहा कि वर्षभर हर महीने की कृष्ण चतुर्थी का व्रत विधिपूर्वक करो, और अगले कार्तिक की चतुर्थी को फिर पूरी निष्ठा से करवा चौथ का व्रत रखो; तब तुम्हारे पति जीवित हो उठेंगे।
माता पार्वती ने वीरवती को बताया कि व्रत छल से टूटा था, और वर्षभर की चतुर्थियों तथा अगले करवा चौथ का व्रत रखने को कहा।
वीरवती ने माता पार्वती की बात मानकर पूरे वर्ष हर चतुर्थी का व्रत रखा। अगले वर्ष कार्तिक कृष्ण चतुर्थी आई तो उसने दिनभर निर्जला रहकर शाम को पूजा की और रात को सचमुच चंद्रमा निकलने पर ही अर्घ्य दिया। उसकी निष्ठा और धैर्य से प्रसन्न होकर माता पार्वती ने उसके पति को फिर जीवन दिया। कथा के अनुसार तभी से सुहागिन महिलाएं यह व्रत रखती हैं।
वीरवती ने वर्षभर व्रत रखा और अगले करवा चौथ पर सच्चे चंद्रमा को अर्घ्य दिया; माता पार्वती ने उसके पति को फिर जीवन दिया।
एक और प्रचलित लोककथा करवा नाम की पतिव्रता स्त्री की है, जो अपने पति के साथ नदी के किनारे रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान कर रहा था कि एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। पति की पुकार सुनकर करवा दौड़ी आई और उसने कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को बांध दिया।
करवा नाम की पतिव्रता स्त्री ने अपने पति को पकड़ने वाले मगरमच्छ को कच्चे सूत के धागे से बांध दिया।
फिर करवा ने यमराज को पुकारा और उनसे कहा कि इस मगरमच्छ को दंड दें और मेरे पति की रक्षा करें। यमराज ने कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी शेष है। करवा अपनी बात पर अडिग रही। उसकी निष्ठा और दृढ़ता देखकर यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। इसी करवा के नाम से यह व्रत करवा चौथ कहलाता है, ऐसी लोकमान्यता है।
करवा की निष्ठा देखकर यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेजा और उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया।
आरती
अन्य आरतियाँ
