पतिव्रता वीरावती एवं करवा माता की अखंड सौभाग्य प्रदायिनी पावन व्रत कथा
सम्पूर्ण कथा
इन्द्रप्रस्थे पुरा क्षत्रे वीरवती सुकन्यका। सप्तभ्रातृप्रिया सा वै करवाचौथव्रतं व्यधात्॥ क्षुधातुरा मुमूर्छा सा भ्रातृभिश्छलदर्शितैः। अर्घ्यं दत्त्वा कृते भङ्गे भर्ता तस्या मृतोऽभवत्॥
प्राचीन समय में इंद्रप्रस्थ नगर में वीरवती नाम की एक सुकन्या थी, जो अपने सात भाइयों की अकेली प्रिय बहन थी। उसने कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। अत्यधिक भूख से व्याकुल बहन की दशा देखकर भाइयों ने छल से वटवृक्ष के पीछे दीपक जलाकर नकली चंद्रमा दिखा दिया। वीरवती ने अर्घ्य देकर व्रत तोड़ दिया, जिससे उसके पति की तत्काल मृत्यु हो गई।
रोदयन्तीं तां समलोक्य देवी गौरी दयाकुला। तपसा पुनः प्राणांश्च ददौ तस्यै सुपुण्यदा॥ ततश्च करवाचौथव्रतं सर्वैश्च स्त्रीभिराचरेत्। अखण्डसौभाग्यलाभाय सत्यमेतन्मयोदितम्॥
वीरवती के पश्चाताप और रोदन से द्रवित होकर माता पार्वती (गौरी) प्रकट हुईं। वीरवती ने वर्षभर प्रत्येक चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखा और माता गौरी के आशीर्वाद से अपने पति को पुनर्जीवित प्राप्त किया। तभी से संपूर्ण स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं।
आरती
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