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पाठ/कथा/Karwa Mata & Shiva-Parvati
Karwa Mata & Shiva-Parvati · व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा

पतिव्रता वीरावती एवं करवा माता की अखंड सौभाग्य प्रदायिनी पावन व्रत कथा

सम्पूर्ण कथा आरती

सम्पूर्ण कथा

इन्द्रप्रस्थे पुरा क्षत्रे वीरवती सुकन्यका। सप्तभ्रातृप्रिया सा वै करवाचौथव्रतं व्यधात्॥ क्षुधातुरा मुमूर्छा सा भ्रातृभिश्छलदर्शितैः। अर्घ्यं दत्त्वा कृते भङ्गे भर्ता तस्या मृतोऽभवत्॥

प्राचीन समय में इंद्रप्रस्थ नगर में वीरवती नाम की एक सुकन्या थी, जो अपने सात भाइयों की अकेली प्रिय बहन थी। उसने कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। अत्यधिक भूख से व्याकुल बहन की दशा देखकर भाइयों ने छल से वटवृक्ष के पीछे दीपक जलाकर नकली चंद्रमा दिखा दिया। वीरवती ने अर्घ्य देकर व्रत तोड़ दिया, जिससे उसके पति की तत्काल मृत्यु हो गई।

रोदयन्तीं तां समलोक्य देवी गौरी दयाकुला। तपसा पुनः प्राणांश्च ददौ तस्यै सुपुण्यदा॥ ततश्च करवाचौथव्रतं सर्वैश्च स्त्रीभिराचरेत्। अखण्डसौभाग्यलाभाय सत्यमेतन्मयोदितम्॥

वीरवती के पश्चाताप और रोदन से द्रवित होकर माता पार्वती (गौरी) प्रकट हुईं। वीरवती ने वर्षभर प्रत्येक चतुर्थी को श्रद्धापूर्वक व्रत रखा और माता गौरी के आशीर्वाद से अपने पति को पुनर्जीवित प्राप्त किया। तभी से संपूर्ण स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं।

आरती

मुख्य आरती

अम्बे तू है जगदम्बे काली

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अम्बे तू है जगदम्बे काली। जय दुर्गे खप्पर वाली तेरे भक्त जनों पर, मैया माँ तेरे भक्त जनों पर, भार नहीं कोई भारी॥

हे अम्बे! तू जगत की माता और काली है। हे खप्पर धारिणी दुर्गे! तेरे भक्तों पर कोई बोझ भारी नहीं है — तू सब सँभालती है।

सुर नर मुनि जन सेवत, शरण में तेरी आते। जो भी भक्त शरण में आवे, माँ कर दे उसका काम॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली॥

देव, मनुष्य और मुनि — सभी आपकी सेवा करते और आपकी शरण में आते हैं। जो भी भक्त शरण में आता है, माता उसका काम सिद्ध कर देती है।

सिंह पर आसन, खड्ग त्रिशूल ले। महिषासुर संहारी, तुम हो जगत की माँ॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली॥

आप सिंह पर विराजित हैं और खड्ग तथा त्रिशूल धारण करती हैं। महिषासुर का संहार करने वाली, आप इस जगत् की माता हैं।

तेरे भजन की माया, तेरे नाम की माया। जो करे तेरा ध्यान, उसकी खाली नहीं झोली॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली॥

आपके भजन और नाम में अपार शक्ति है। जो आपका ध्यान करता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती।

नव दुर्गा को ध्यावत, नवरात्र मनावत। भक्त जन आनंद पावत, मैया जय जय करत॥ अम्बे तू है जगदम्बे काली॥

नव दुर्गा का ध्यान करते हुए, नवरात्र का उत्सव मनाते हुए भक्त आनन्द पाते हैं और माँ की जय-जयकार करते हैं।

अन्य आरतियाँ

जय अम्बे गौरी

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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

ॐ जय लक्ष्मी माता

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ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥