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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
पाठ/कथा/Goddess Parvati (Mangala Gauri)
Goddess Parvati (Mangala Gauri) · व्रत कथा

मंगला गौरी व्रत कथा

शिव-पार्वती की कथा — मंगला गौरी व्रत जो सुहाग की रक्षा करता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है

पूजन सामग्री पूजन विधि सम्पूर्ण कथा आरती

पूजन सामग्री

माता पार्वती (गौरी) की मूर्ति या चित्र
चौकी पर लाल वस्त्र
षोडश पूजन सामग्री (16 श्रृंगार): रोली, हल्दी, चन्दन, सिन्दूर, काजल, मेहंदी, बिन्दी, कंघी, दर्पण, काँच की चूड़ियाँ, महावर, बिछिया, माँग टीका, कमरबंद, हार, बाली
लाल और गुलाबी फूल — गुलाब, गेंदा, कमल
सुपारी — 16 नग (विधि अनुसार)
पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
लाल मिठाई — लाल लड्डू, गुलाबी बर्फी
ऋतुफल — केला, नारियल
घी का दीपक और धूप / अगरबत्ती
कपूर — आरती के लिए
कुमकुम (सिन्दूर) और अक्षत
गंगाजल
मौली (लाल धागा)
नया सिन्दूर — सुहागन स्त्रियाँ अर्पित करें
नारियल — साबुत, बिना धुला

पूजन विधि(प्रातः से सूर्यास्त तक / Morning to sunset)

1

मंगलवार को सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और लाल या शुभ वस्त्र पहनें। सुहागन स्त्रियाँ विशेष रूप से सिन्दूर और चूड़ियाँ पहनें। संकल्प लें — 'मैं पति की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि हेतु मंगला गौरी व्रत करती हूँ।'

2

चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। माता पार्वती (गौरी) का चित्र स्थापित करें। लाल और गुलाबी फूलों से सजाएं।

3

माता को एक-एक करके सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें: रोली, सिन्दूर, चूड़ियाँ, बिन्दी, काजल, मेहंदी, कंघी, दर्पण, महावर, बिछिया, टीका, कमरबंद, हार, बाली और फूल।

4

पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें, फिर गंगाजल से।

5

कुमकुम, सिन्दूर, लाल फूल और सुपारी चढ़ाएं। घी का दीपक और धूप जलाएं।

6

'ॐ श्री मात्रे नमः' का 108 बार जाप करें। पहले विघ्न निवारण के लिए 'ॐ गं गणपतये नमः' का 11 बार जाप करें।

7

पूर्ण ध्यान से मंगला गौरी व्रत कथा सुनें या पढ़ें।

8

कथा के बाद गौरी आरती करें। सभी को लाल मिठाई (सिन्दूरी लड्डू) और फल वितरित करें। सुहागन स्त्रियाँ प्रसाद के सिन्दूर को अपनी माँग में लगाएं।

सम्पूर्ण कथा

ॐ शिवायै नमः। ॐ पार्वत्यै नमः। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

शिवा और पार्वती माता को नमस्कार। जो देवी सभी प्राणियों में माँ के रूप में विराजमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार।

॥ मंगला गौरी व्रत कथा ॥

प्राचीन काल में कुण्डिनपुर नगरी में धर्मपाल नाम का एक सेठ रहता था। उसके कोई पुत्र नहीं था। पुत्री थी जिसका नाम चंद्रावती था। चंद्रावती अत्यंत सुंदर, विदुषी और भगवती पार्वती की परम भक्त थी। जब चंद्रावती किशोरी हुई, तब से वह प्रत्येक मंगलवार माता गौरी का व्रत करने लगी। उसकी भक्ति देखकर माता गौरी बहुत प्रसन्न हुईं।

कुण्डिनपुर की चंद्रावती परम भक्त थी। वह प्रत्येक मंगलवार माता गौरी का व्रत करती थी। माता गौरी उसकी भक्ति से प्रसन्न थीं।

जब चंद्रावती के विवाह का समय आया तो उसके पिता ने सुशील, वैभवशाली एवं चरित्रवान युवक शिवदत्त से उसका विवाह कर दिया। विवाह के बाद चंद्रावती अपने पति के घर आई। जल्द ही एक ज्योतिषी ने पति की जन्मपत्री देखकर बताया — 'इस युवक की अकाल मृत्यु योग है। यह अधिक दिन नहीं जीएगा।' यह सुनकर चंद्रावती के मन में गहरी चिंता छा गई।

चंद्रावती का विवाह शिवदत्त से हुआ। ज्योतिषी ने बताया कि पति की अकाल मृत्यु का योग है। चंद्रावती चिंतित हो गई।

चंद्रावती ने माता गौरी की शरण ली और और भी अधिक श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत करने लगी। वह सोलह श्रृंगार सामग्री और सोलह सुपारी से माता की पूजा करती और प्रार्थना करती — 'हे माता! मेरे पति की आयु लंबी करो।' माता गौरी ने उसकी पुकार सुनी।

चंद्रावती ने माता गौरी की शरण में जाकर अधिक श्रद्धा से व्रत करना शुरू किया और पति की दीर्घायु की प्रार्थना की। माता ने उसकी पुकार सुनी।

एक रात शिवदत्त की आयु समाप्त होने पर यम के दूत उसे लेने आए। परंतु उसके कमरे में माता गौरी का प्रकाश था। यम दूत वापस लौट गए। यमराज ने स्वयं जाकर देखा — वे चंद्रावती के कमरे में नहीं जा सके। माता गौरी ने प्रकट होकर यमराज से कहा — 'यह स्त्री मेरी परम भक्त है। इसके पति की आयु मेरे व्रत के प्रभाव से बढ़ाई जाए।'

शिवदत्त की आयु पूर्ण होने पर यमदूत आए पर माता गौरी की कृपा से लौट गए। माता ने यमराज को पति की आयु बढ़ाने का आदेश दिया।

यमराज माता गौरी की शक्ति के सामने नत-मस्तक हो गए और बोले — 'देवी! आपकी भक्त की आस्था अजेय है। मैं इनके पति को दीर्घायु का वरदान देता हूँ।' शिवदत्त की आयु सौ वर्ष हो गई। चंद्रावती ने माता गौरी के चरणों में शत-शत नमस्कार किया। दोनों पति-पत्नी दीर्घकाल तक सुखपूर्वक जीवन जीते रहे और अंत में गौरी धाम को प्राप्त हुए। ॥ इति मंगला गौरी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥ माता गौरी की जय॥ माता पार्वती की जय॥

यमराज ने माता गौरी की आज्ञा स्वीकार की और शिवदत्त को सौ वर्ष की आयु मिली। दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक जिए और अंत में गौरी धाम गए।

॥ व्रत फल ॥ जो सुहागन स्त्री मंगला गौरी व्रत श्रद्धापूर्वक करती है — माता गौरी की कृपा से उसके पति की आयु, आरोग्य और सम्पत्ति में वृद्धि होती है। कुमारी कन्याओं को श्रेष्ठ वर मिलता है। निःसंतान को संतान मिलती है। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ती है। ॥ माता गौरी की जय॥

व्रत फल: इस व्रत से सुहागन को अखंड सुहाग, कन्या को श्रेष्ठ वर, संतानहीन को संतान और परिवार को सुख-समृद्धि मिलती है।

आरती

मुख्य आरती

जय अम्बे गौरी

पूरी आरती →

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

हे माँ अम्बे गौरी! हे माँ श्यामा गौरी! आपकी जय हो। भगवान विष्णु, ब्रह्माजी और शिवजी भी दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। मैया टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपकी मांग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का तिलक सुशोभित है। आपके दोनों नेत्र अत्यंत उज्ज्वल हैं और आपका मुखमंडल चंद्रमा के समान सुंदर है।

कनक समान कलेवर, रक्तांबर साजे। मैया रक्तांबर साजे। रक्तपुष्प गल माला, रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपका स्वरूप स्वर्ण के समान कांतिमान है और आप लाल वस्त्र धारण किए हुए हैं। आपके गले में लाल पुष्पों की सुंदर माला सुशोभित है।

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। मैया खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनि-जन सेवत, सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुख हारी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आप सिंह पर विराजमान हैं और हाथों में खड्ग तथा खप्पर धारण किए हुए हैं। देवता, मनुष्य और मुनिगण आपकी सेवा करते हैं और आप उनके दुखों का निवारण करती हैं।

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती। मैया नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योति॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपके कानों में सुंदर कुंडल सुशोभित हैं और नासिका पर मोती चमक रहा है। आपके स्वरूप का तेज करोड़ों सूर्य और चंद्रमाओं की ज्योति के समान दिव्य है।

शुंभ निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती। मैया महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपने शुंभ और निशुंभ राक्षसों का संहार किया तथा महिषासुर का वध किया। धूम्रलोचन जैसे दुष्टों का नाश करके आप धर्म की रक्षा करती हैं।

चंड मुंड संहारे, शोणित बीज हरे। मैया शोणित बीज हरे। मधु कैटभ दोउ मारे, मधु कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपने चंड-मुंड और रक्तबीज का अंत किया तथा मधु और कैटभ दैत्यों का संहार कर देवताओं को निर्भय बनाया।

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी। मैया तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और महालक्ष्मी (कमला) हैं। वेद और शास्त्र आपकी महिमा का वर्णन करते हैं और आप भगवान शिव की पटरानी हैं।

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरूं। मैया नृत्य करत भैरूं। बाजत ताल मृदंगा, बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरूं॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

चौंसठ योगिनियाँ आपका गुणगान करती हैं और भैरव जी नृत्य करते हैं। ताल, मृदंग और डमरू की ध्वनियों से आपका प्रांगण गुंजायमान रहता है।

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी। मैया वरमुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

आपकी भुजाएं अत्यंत सुशोभित हैं और आप अभय व वरद मुद्रा धारण किए हुए हैं। जो भी नर-नारी आपकी भक्ति करते हैं, वे मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। मैया अगर कपूर बाती। श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

स्वर्ण के थाल में अगर और कपूर की बाती जल रही है। आपकी आरती की ज्योति करोड़ों रत्नों के प्रकाश के समान देदीप्यमान हो रही है।

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे। मैया जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, भनत शिवानंद स्वामी, सुख-संपत्ति पावे॥ ॐ जय अम्बे गौरी॥

जो भी मनुष्य श्री अम्बे जी की इस आरती का श्रद्धापूर्वक गायन करता है, स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वह सुख और समृद्धि प्राप्त करता है।

अन्य आरतियाँ

अम्बे तू है जगदम्बे काली

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अम्बे तू है जगदम्बे काली। जय दुर्गे खप्पर वाली तेरे भक्त जनों पर, मैया माँ तेरे भक्त जनों पर, भार नहीं कोई भारी॥

ॐ जय लक्ष्मी माता

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ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता॥