शिव-पार्वती की कथा — मंगला गौरी व्रत जो सुहाग की रक्षा करता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है
पूजन सामग्री
पूजन विधि(प्रातः से सूर्यास्त तक / Morning to sunset)
मंगलवार को सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और लाल या शुभ वस्त्र पहनें। सुहागन स्त्रियाँ विशेष रूप से सिन्दूर और चूड़ियाँ पहनें। संकल्प लें — 'मैं पति की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि हेतु मंगला गौरी व्रत करती हूँ।'
चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। माता पार्वती (गौरी) का चित्र स्थापित करें। लाल और गुलाबी फूलों से सजाएं।
माता को एक-एक करके सोलह श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें: रोली, सिन्दूर, चूड़ियाँ, बिन्दी, काजल, मेहंदी, कंघी, दर्पण, महावर, बिछिया, टीका, कमरबंद, हार, बाली और फूल।
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें, फिर गंगाजल से।
कुमकुम, सिन्दूर, लाल फूल और सुपारी चढ़ाएं। घी का दीपक और धूप जलाएं।
'ॐ श्री मात्रे नमः' का 108 बार जाप करें। पहले विघ्न निवारण के लिए 'ॐ गं गणपतये नमः' का 11 बार जाप करें।
पूर्ण ध्यान से मंगला गौरी व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
कथा के बाद गौरी आरती करें। सभी को लाल मिठाई (सिन्दूरी लड्डू) और फल वितरित करें। सुहागन स्त्रियाँ प्रसाद के सिन्दूर को अपनी माँग में लगाएं।
सम्पूर्ण कथा
ॐ शिवायै नमः। ॐ पार्वत्यै नमः। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
शिवा और पार्वती माता को नमस्कार। जो देवी सभी प्राणियों में माँ के रूप में विराजमान हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार।
प्राचीन काल में कुण्डिनपुर नगरी में धर्मपाल नाम का एक सेठ रहता था। उसके कोई पुत्र नहीं था। पुत्री थी जिसका नाम चंद्रावती था। चंद्रावती अत्यंत सुंदर, विदुषी और भगवती पार्वती की परम भक्त थी। जब चंद्रावती किशोरी हुई, तब से वह प्रत्येक मंगलवार माता गौरी का व्रत करने लगी। उसकी भक्ति देखकर माता गौरी बहुत प्रसन्न हुईं।
कुण्डिनपुर की चंद्रावती परम भक्त थी। वह प्रत्येक मंगलवार माता गौरी का व्रत करती थी। माता गौरी उसकी भक्ति से प्रसन्न थीं।
जब चंद्रावती के विवाह का समय आया तो उसके पिता ने सुशील, वैभवशाली एवं चरित्रवान युवक शिवदत्त से उसका विवाह कर दिया। विवाह के बाद चंद्रावती अपने पति के घर आई। जल्द ही एक ज्योतिषी ने पति की जन्मपत्री देखकर बताया — 'इस युवक की अकाल मृत्यु योग है। यह अधिक दिन नहीं जीएगा।' यह सुनकर चंद्रावती के मन में गहरी चिंता छा गई।
चंद्रावती का विवाह शिवदत्त से हुआ। ज्योतिषी ने बताया कि पति की अकाल मृत्यु का योग है। चंद्रावती चिंतित हो गई।
चंद्रावती ने माता गौरी की शरण ली और और भी अधिक श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत करने लगी। वह सोलह श्रृंगार सामग्री और सोलह सुपारी से माता की पूजा करती और प्रार्थना करती — 'हे माता! मेरे पति की आयु लंबी करो।' माता गौरी ने उसकी पुकार सुनी।
चंद्रावती ने माता गौरी की शरण में जाकर अधिक श्रद्धा से व्रत करना शुरू किया और पति की दीर्घायु की प्रार्थना की। माता ने उसकी पुकार सुनी।
एक रात शिवदत्त की आयु समाप्त होने पर यम के दूत उसे लेने आए। परंतु उसके कमरे में माता गौरी का प्रकाश था। यम दूत वापस लौट गए। यमराज ने स्वयं जाकर देखा — वे चंद्रावती के कमरे में नहीं जा सके। माता गौरी ने प्रकट होकर यमराज से कहा — 'यह स्त्री मेरी परम भक्त है। इसके पति की आयु मेरे व्रत के प्रभाव से बढ़ाई जाए।'
शिवदत्त की आयु पूर्ण होने पर यमदूत आए पर माता गौरी की कृपा से लौट गए। माता ने यमराज को पति की आयु बढ़ाने का आदेश दिया।
यमराज माता गौरी की शक्ति के सामने नत-मस्तक हो गए और बोले — 'देवी! आपकी भक्त की आस्था अजेय है। मैं इनके पति को दीर्घायु का वरदान देता हूँ।' शिवदत्त की आयु सौ वर्ष हो गई। चंद्रावती ने माता गौरी के चरणों में शत-शत नमस्कार किया। दोनों पति-पत्नी दीर्घकाल तक सुखपूर्वक जीवन जीते रहे और अंत में गौरी धाम को प्राप्त हुए। ॥ इति मंगला गौरी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥ माता गौरी की जय॥ माता पार्वती की जय॥
यमराज ने माता गौरी की आज्ञा स्वीकार की और शिवदत्त को सौ वर्ष की आयु मिली। दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक जिए और अंत में गौरी धाम गए।
॥ व्रत फल ॥ जो सुहागन स्त्री मंगला गौरी व्रत श्रद्धापूर्वक करती है — माता गौरी की कृपा से उसके पति की आयु, आरोग्य और सम्पत्ति में वृद्धि होती है। कुमारी कन्याओं को श्रेष्ठ वर मिलता है। निःसंतान को संतान मिलती है। परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ती है। ॥ माता गौरी की जय॥
व्रत फल: इस व्रत से सुहागन को अखंड सुहाग, कन्या को श्रेष्ठ वर, संतानहीन को संतान और परिवार को सुख-समृद्धि मिलती है।
आरती
अन्य आरतियाँ
