दास्य भक्ति का सर्वोच्च शिखर
हनुमान जी दास्य भक्ति के साक्षात् स्वरूप हैं। उनका सारा जीवन केवल प्रभु श्री राम की सेवा में समर्पित रहा। जब माता सीता ने उन्हें बहुमूल्य मोतियों की माला भेंट की, तो उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि जिसमें मेरे प्रभु राम का नाम न हो, वह वस्तु मेरे किसी काम की नहीं। उन्होंने अपना सीना चीरकर दिखाया कि उनके हृदय में केवल सीताराम ही बसे हैं।