✦ आज: कृष्ण पक्ष एकादशी· एकादशी · 1 दिन में· प्रदोष · 3 दिन में· अमावस्या · 5 दिन में· गणेश चतुर्थी · 8 दिन में
अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
DASHAVATARA

कृष्ण

गीता के उपदेशक और प्रेम-अवतार योगेश्वर श्री कृष्ण

कृष्ण
पावन नामावली:गोविंदगोपालमाधववासुदेवयोगेश्वरश्यामसुंदर

भगवान विष्णु के पूर्णावतार श्री कृष्ण प्रेम, ज्ञान और कर्मयोग के साक्षात् स्वरूप हैं। कुरुक्षेत्र में दिया गया उनका गीता-उपदेश मानव चेतना का सर्वोच्च प्रकाशस्तंभ है।

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पवित्र ध्यान श्लोक

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्। सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥

kastūrītilakaṁ lalāṭapaṭale vakṣaḥsthale kaustubhaṁ nāsāgre varamauktikaṁ karatale veṇuṁ kare kaṅkaṇam | sarvāṅge haricandanaṁ sulalitaṁ kaṇṭhe ca muktāvaliṁ gopastrīpariveṣṭito vijayate gopālacūḍāmaṇiḥ ||

भावार्थ: जिनके ललाट पर कस्तूरी का तिलक है, वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि है, हाथों में बांसुरी और कंगन हैं, अंगों पर चंदन का लेप और गले में मोतियों की माला है, उन गोपी-वल्लभ बाल गोपाल की जय हो।

स्रोत: Sri Krishna Karnamritam (Bilvamangala Thakura)
दिव्य वाहनगरुड़ (एवं सुरभि गौमाता)प्रकृति-प्रेम, जीव-कल्याण और वैदिक संस्कृति का प्रतीक।
दिव्य आयुध (अस्त्र-शस्त्र)
वेणु (बांसुरी)सुदर्शन चक्रकौमोदकी गदापांचजन्य शंख
हस्त मुद्राएं
अभय मुद्रात्रिभंग मुद्रा (असीम सौंदर्य व माधुर्य)
सहचरी / शक्तिराधारानी / रुक्मिणी
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पावन मंत्र एवं साधना विधान

मूल महामंत्रGaudiya and Pushtimarg Vaishnavism
ॐ क्लीं कृष्णाय नमःसमस्त चेतना को आकर्षित करने वाले आनंदघन श्री कृष्ण को प्रणाम।प्रयोग: भक्ति साधना, चित्त की शांति और कृष्ण-स्मरण हेतु
गायत्री मंत्रNarayana Upanishad / Vaishnava Samhita
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥हम देवकीनंदन को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे श्री कृष्ण हमारी बुद्धि को सन्मार्ग दिखाएं।
एकाक्षरी बीज मंत्र (परंपरा-सापेक्ष)Pancharatra / Bhagavata Upasana
क्लीं (Kleem)भगवत्-प्रेम और परमानंद को जाग्रत करने वाला कामबीज।ℹ️ वैष्णव संप्रदायों में दीक्षा के साथ प्रयुक्त।
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जुड़ा हुआ ज्ञान तंत्र (संबंधित तीर्थ एवं साधना)

अनन्तमार्ग के मंदिरों, तीर्थों, पर्वों, व्रतों और स्तोत्रों से सीधा संबंध
🛕 प्रमुख मंदिर (2)
🏔️ तीर्थ परिपथ (यात्रा)
🎉 प्रमुख पर्व एवं उत्सव
🌿 उपवास एवं व्रत
📖 आरती, चालीसा एवं स्तोत्र
पंचांग काल-मुहूर्त संबंध (प्रमाणित परंपरा)
संबंधित तिथियां: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
पूजन वार (दिन): बुधवार को बाल गोपाल और श्री कृष्ण की सेवा-अर्चना का विशेष महत्व माना गया है।
पावन दैनिक काल-खंड (मुहूर्त):
निशीथ काल (मध्यरात्रि प्राकट्य काल)श्री कृष्ण का अवतार रोहिणी नक्षत्र युक्त मध्यरात्रि के निशीथ काल में हुआ था, जो जन्माष्टमी का सर्वोच्च आराधना क्षण है।[Bhagavata Vaishnavism]
ℹ️ मध्यरात्रि का निशीथ काल श्री कृष्ण जन्मोत्सव का मुख्य पूजन समय है।

श्रीमद्भगवद्गीता: जीवन का शाश्वत मार्गदर्शन

कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन विषादग्रस्त हुए, तब श्री कृष्ण ने उन्हें गीता का अमर उपदेश दिया। कर्मण्येवाधिकारस्ते का सिद्धांत सिखाते हुए उन्होंने बताया कि कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं। गीता आज भी कर्तव्य-पालन और मानसिक शांति का सर्वोच्च मार्गदर्शक ग्रंथ है।

द्वारका और पुरी: पावन लीला भूमि

गुजरात के तट पर बसी द्वारका पुरी भगवान श्री कृष्ण की कर्मभूमि और मोक्षदायिनी नगरी है। वहीं पूर्व में ओडिशा के पुरी में वे भगवान जगन्नाथ के रूप में विराजमान हैं, जहाँ की वार्षिक रथयात्रा संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है।

जन्माष्टमी: मध्यरात्रि का पावन उत्सव

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की रात रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में श्री कृष्ण का जन्म हुआ। श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं और रात १२ बजे कान्हा के जन्म के समय पंचामृत से अभिषेक कर माखन-मिश्री का भोग लगाते हैं।