मध्यरात्रि का दिव्य प्राकट्य
जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण के प्राकट्य का महापर्व है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में मथुरा के कारागार में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। वासुदेव उन्हें उफनती यमुना को पार करके गोकुल ले गए — नदी ने उनके चरण-स्पर्श से मार्ग दिया। भारत के मंदिरों में निशीथ काल में लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर जन्मोत्सव मनाया जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध का पाठ इस अवसर की विशेष परंपरा है।
जन्माष्टमी कैसे मनाएं
श्री कृष्ण जन्माष्टमी क्या है?
श्री कृष्ण जन्माष्टमी (गोकुलाष्टमी या कृष्णाष्टमी) भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण के पावन प्राकट्य का महापर्व है। यह भाद्रपद (अमान्त अनुसार श्रावण) मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि (निशीथ काल) में रोहिणी नक्षत्र के संयोग में हुआ था, इसीलिए यह पर्व रात्रि-जागरण और मध्यरात्रि जन्मोत्सव के लिए प्रसिद्ध है।
यह क्यों मनाया जाता है?
अधर्म और कंस के अत्याचारों का विनाश कर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ। श्रीमद्भागवत पुराण के पाठ, भजन-कीर्तन और उपवास के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाओं तथा श्रीमद्भगवद्गीता के अमर संदेश को स्मरण करने का पावन अवसर है।
इसे कैसे मनाया जाता है?
श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं। निशीथ काल (मध्यरात्रि) में लड्डू गोपाल की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेकादि कर जन्मोत्सव मनाया जाता है, आरती के पश्चात प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण होता है। अगले दिन महाराष्ट्र और गुजरात में दही-हांडी (माखन-चोरी लीला) का भव्य उत्सव मनाया जाता है।
यह कब मनाया जाता है?
जन्माष्टमी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को निशीथ काल (मध्यरात्रि) में व्याप्त होने पर मनाई जाती है। चंद्र कैलेंडर के अनुसार इसकी तिथि अंग्रेजी कैलेंडर में जुलाई या अगस्त में बदलती है। स्मार्त और वैष्णव संप्रदायों की तिथियों में रोहिणी नक्षत्र और तिथि व्याप्ति के आधार पर कभी-कभी एक दिन का अंतर होता है।
मुख्य बातें
निशीथ काल मध्यरात्रि अभिषेक
श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध १०, अध्याय ३) के अनुसार भगवान का प्राकट्य ठीक मध्यरात्रि में हुआ था। निशीथ काल में लड्डू गोपाल का पंचामृत और शंख से अभिषेक कर जन्मोत्सव मनाया जाता है।
स्मार्त एवं वैष्णव परंपरा
स्मार्त संप्रदाय निशीथ व्यापिनी अष्टमी के दिन व्रत रखता है, जबकि वैष्णव संप्रदाय रोहिणी नक्षत्र और उदयातिथि को प्राथमिकता देते हुए अगले दिन उत्सव मनाता है।
दही-हांडी (गोपालकाला)
जन्माष्टमी के अगले दिन गोविंदों की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर टंगी माखन-दही की मटकी फोड़ती हैं, जो श्रीकृष्ण की बाल-लीला का सजीव चित्रण है।
भागवत कथा एवं छप्पन भोग
मंदिरों में श्रीमद्भागवत कथा का वाचन होता है तथा भगवान को माखन-मिश्री एवं छप्पन भोग का दिव्य प्रसाद अर्पित किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जन्माष्टमी का पर्व मध्यरात्रि (निशीथ काल) में ही क्यों मनाया जाता है?
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य मथुरा के कारागार में ठीक मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए निशीथ काल ही मुख्य पूजा और जन्मोत्सव का समय है।
स्मार्त और वैष्णव जन्माष्टमी की तिथियों में अंतर क्यों होता है?
स्मार्त संप्रदाय निशीथ काल में अष्टमी व्यापिनी होने पर व्रत रखता है, जबकि वैष्णव संप्रदाय उदयातिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को प्रधानता देता है। दोनों नियम शास्त्रसम्मत हैं।
दही-हांडी क्या है और यह कब मनाई जाती है?
दही-हांडी (गोपालकाला) जन्माष्टमी के अगले दिन मनाई जाती है। इसमें युवाओं की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर माखन की मटकी फोड़ती हैं, जो भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं का प्रतीक है।
जन्माष्टमी व्रत का पारण कब किया जाता है?
जन्माष्टमी व्रत का पारण मध्यरात्रि में पूजा और आरती के बाद किया जाता है, या फिर अगले दिन सूर्योदय के बाद अष्टमी तिथि समाप्त होने पर होता है।
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