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कार्तिकेय

देवसेनापति भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) — ज्ञान और विजय के अधिष्ठाता

कार्तिकेय
पावन नामावली:मुरुगनस्कंदसुब्रह्मण्यषण्मुखगुहवेलन

भगवान शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय देवसेना के सेनापति हैं। वे अज्ञान के अंधकार को अपनी दिव्य शक्ति 'वेल' से भेदने वाले और योगियों को ब्रह्मज्ञान देने वाले स्वामी हैं।

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पवित्र ध्यान श्लोक

ध्यायेत् षडाननं देवं मयूरवरवाहनम्। शक्तिहस्तं महोत्साहं सर्वशत्रुनिबर्हणम्॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं कुमारं ब्रह्मचारिणम्। सुब्रह्मण्यमहं वन्दे कार्तिकेयं महाद्युतिम्॥

dhyāyet ṣaḍānanaṁ devaṁ mayūravaravāhanam | śaktihastaṁ mahotsāhaṁ sarvaśatrunibarhaṇam || koṭisūryapratīkāśaṁ kumāraṁ brahmacāriṇam | subrahmaṇyamahaṁ vande kārtikeyaṁ mahādyutim ||

भावार्थ: छह मुख वाले, मयूर पर विराजमान, हाथ में शक्ति (वेल) धारण करने वाले, समस्त शत्रुओं और अज्ञान का नाश करने वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी ब्रह्मचारी भगवान सुब्रह्मण्य (कार्तिकेय) का मैं ध्यान करता हूँ।

स्रोत: Skanda Purana / Subrahmanya Bhujangam Dhyanam
दिव्य वाहनमयूर (मोर - परवाणी)अहंकार, ईर्ष्या और वासना के विष पर विजय का प्रतीक।
दिव्य आयुध (अस्त्र-शस्त्र)
वेल (तीक्ष्ण प्रज्ञा का दिव्य भाला)धनुष एवं बाणखड्ग
हस्त मुद्राएं
अभय मुद्रावरद मुद्रा
सहचरी / शक्तिवल्ली (इच्छा शक्ति) एवं देवसेना (क्रिया शक्ति)
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पावन मंत्र एवं साधना विधान

मूल महामंत्रTamil Saiva & Kaumaram Tradition (Shadakshari Mantra)
ॐ शरवणभवाय नमःशरवण वन में प्रकट हुए कल्याणकारी भगवान मुरुगन को प्रणाम।प्रयोग: साहस, एकाग्रता और समस्त संकटों के निवारण हेतु षडाक्षर मंत्र
गायत्री मंत्रMahanarayana Upanishad
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि तन्नो षण्मुखः प्रचोदयात्॥हम उस परम पुरुष को जानते हैं, महासेनापति का ध्यान करते हैं; वे छह मुख वाले कार्तिकेय हमारी बुद्धि को प्रकाशित करें।
एकाक्षरी बीज मंत्र (परंपरा-सापेक्ष)Kaumara Agama
सौम् (Saum / Saravana)विजय और ऊर्जा का दिव्य बीज।ℹ️ कौमार संप्रदाय में विधिवत प्रयुक्त।
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जुड़ा हुआ ज्ञान तंत्र (संबंधित तीर्थ एवं साधना)

अनन्तमार्ग के मंदिरों, तीर्थों, पर्वों, व्रतों और स्तोत्रों से सीधा संबंध
🏔️ तीर्थ परिपथ (यात्रा)
🎉 प्रमुख पर्व एवं उत्सव
🌿 उपवास एवं व्रत
📖 आरती, चालीसा एवं स्तोत्र
पंचांग काल-मुहूर्त संबंध (प्रमाणित परंपरा)
संबंधित तिथियां: प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि और कार्तिक मास की 'स्कंद षष्ठी' भगवान कार्तिकेय की आराधना का मुख्य पर्व है।
पूजन वार (दिन): मंगलवार का दिन भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) को समर्पित है, क्योंकि वे मंगल ग्रह के अधिष्ठाता देव माने गए हैं।
पावन दैनिक काल-खंड (मुहूर्त):
मध्याह्न काल (षष्ठी पूजन काल)स्कंद षष्ठी पर मध्याह्न काल में किया गया पूजन शत्रुओं और आंतरिक विकारों पर विजय दिलाने वाला माना गया है।[Kaumara Agama]
ℹ️ षष्ठी तिथि के दिन प्रातःकाल और दोपहर का समय भगवान मुरुगन की पूजा हेतु श्रेष्ठ है।

षडानन का दिव्य प्राकट्य और तारकासुर वध

तारकासुर के अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव के तेज से छह दिव्य बालक प्रकट हुए, जिनका पालन कृत्तिका नक्षत्र की माताओं ने किया। माता पार्वती ने जब उन्हें स्नेह से गले लगाया, तो वे छह बालक एक होकर 'षडानन' कहलाए। भगवान कार्तिकेय ने देवसेना का नेतृत्व करते हुए तारकासुर का वध किया।

दिव्य वेल: प्रज्ञा और एकाग्रता का प्रतीक

माता पार्वती द्वारा प्रदत्त अस्त्र 'वेल' केवल युद्ध का भाला नहीं, बल्कि प्रज्ञा (ज्ञान) का प्रतीक है। इसका निचला भाग गहरा (विनम्रता), मध्य भाग सीधा (एकाग्रता) और ऊपरी भाग चौड़ा व नुकीला (तीक्ष्ण बुद्धि) है, जो अज्ञान और भ्रम के पर्दे को चीर देता है।

दक्षिण की पावन मुरुगन तीर्थ परंपरा

दक्षिण भारत में भगवान मुरुगन तमिल संस्कृति और पहाड़ों के संरक्षक देव के रूप में पूजनीय हैं। उनके 'छह पावन निवास' (अरुपदई वीडू) तीर्थ यात्रा के प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ श्रद्धालु कावड़ लेकर नंगे पैर पदयात्रा करते हैं।