काल के स्वामी और पंचांग का मूलाधार
सनातन खगोल विज्ञान में सूर्य केवल एक तारा नहीं, बल्कि समय (कालचक्र) के नियामक हैं। हिंदू पंचांग में नया दिन मध्यरात्रि से नहीं, बल्कि सूर्योदय के क्षण से आरंभ होता है। तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण की समस्त गणनाएं सूर्य की गति पर ही निर्भर हैं।