कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥
पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)
सरल हिंदी भावार्थ:
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम स्वयं को कर्मों के फल का कारण मत मानो और न ही तुम्हारी कर्म न करने (अकर्म) में आसक्ति हो।
English Translation:
You have a right to perform your prescribed duty, but never an entitlement to its fruits. Never consider yourself to be the cause of the results of your actions, nor let your attachment be to inaction.
प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य
पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग
कुरुक्षेत्र के धर्मक्षेत्र में जब अर्जुन युद्ध के भीषण परिणामों और परिजनों के वध की आशंका से विषादग्रस्त होकर कर्म त्यागने का विचार करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण निष्काम कर्मयोग का यह मूल मंत्र देते हैं — कर्म करना ही मनुष्य का स्वाभाविक धर्म व अधिकार है, फल पर अधिकार का भ्रम ही बंधन और दुख का कारण है।
जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र
इस श्लोक में निष्काम कर्म के चार आधार स्तंभ हैं: (१) कर्तव्य कर्म करने में ही मनुष्य का अधिकार है, (२) कर्मों के फल में कभी भी अधिकार नहीं है, (३) कर्मफल का हेतु मत बनो अर्थात् कर्तापन के अहंकार से मुक्त रहो, और (४) कर्म न करने (अकर्म अथवा पलायनवाद) में भी कभी आसक्ति न हो।