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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
पाठ/श्लोक
वेदांत एवं उपनिषद् ज्ञान पीठ

कालजयी श्लोक एवं उपनिषद् महावाक्य

श्रीमद्भगवद्गीता एवं प्रमुख उपनिषदों के प्रामाणिक श्लोक — शुद्ध संस्कृत मूल, पदच्छेद, अन्वय, शब्दार्थ, भावार्थ एवं स्वर पाठ।

श्रीमद्भगवद्गीताअध्याय २, श्लोक ४७

कर्मण्येवाधिकारस्ते (श्रीमद्भगवद्गीता २.४७)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥

भावार्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम स्वयं को कर्मों के फल का कारण मत मानो और न ही तुम्हारी कर्म न करने (अकर्म) में आसक्ति हो।

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श्रीमद्भगवद्गीताअध्याय ४, श्लोक ७ एवं ८
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यदा यदा हि धर्मस्य (श्रीमद्भगवद्गीता ४.७-४.८)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ७॥

भावार्थ: हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप की रचना करता हूँ अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूँ।

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बृहदारण्यकोपनिषद्मंत्र २८ (पवमान अभ्यारोह)
🎵 स्वर पाठ

असतो मा सद्गमय (बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८)

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

भावार्थ: हे परमात्मा! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता (मोक्ष) की ओर ले चलो। ॐ, तीनों प्रकार के तापों (आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक) की शांति हो।

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ईशावास्योपनिषद्मंत्र १

ईशा वास्यमिदं सर्वम् (ईशावास्योपनिषद् १)

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥

भावार्थ: इस गतिशील ब्रह्मांड में जो कुछ भी चराचर जगत है, वह सब ईश्वर से व्याप्त और आच्छादित है। अतः त्यागभाव से (आसक्तिरहित होकर) उसका उपभोग करो; किसी के भी धन का लोभ मत करो।

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श्रीमद्भगवद्गीताअध्याय २, श्लोक २२

वासांसि जीर्णानि (श्रीमद्भगवद्गीता २.२२)

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२॥

भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।

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