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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
पाठ/श्लोक/Isha Upanishad (Ishavasya Upanishad)
मंत्र १शास्त्रसम्मत प्रामाणिकअनुष्टुप् वैदिक छंद (३२ अक्षर)वैदिक ऋषि

ईशा वास्यमिदं सर्वम् (ईशावास्योपनिषद् १)

ईश्वरीय सर्वव्यापकता एवं अनासक्त उपभोग का मूलभूत उपनिषद् मंत्र — ईशा वास्यमिदं सर्वम्

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥

पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)

ईशाīśā
ईश्वर द्वारा, परमात्मा से
वास्यम्vāsyam
आच्छादित, व्याप्त, ढकने योग्य
इदम्idam
यह
सर्वम्sarvam
संपूर्ण, समस्त
यत् किञ्चyat kiñca
जो कुछ भी
जगत्याम्jagatyām
इस परिवर्तनशील संसार में, पृथ्वी पर
जगत्jagat
चराचर, गतिशील जगत
तेनtena
उस कारण से, उस भाव से
त्यक्तेनtyaktena
त्यागभाव से, अनासक्ति से
भुञ्जीथाःbhuñjīthāḥ
उपभोग करो, जीवन निर्वाह करो
मा
मत
गृधःgṛdhaḥ
लोभ करो, लालच करो
कस्य स्वित्kasya svit
किसी के भी
धनम्dhanam
धन-संपत्ति का

सरल हिंदी भावार्थ:

इस गतिशील ब्रह्मांड में जो कुछ भी चराचर जगत है, वह सब ईश्वर से व्याप्त और आच्छादित है। अतः त्यागभाव से (आसक्तिरहित होकर) उसका उपभोग करो; किसी के भी धन का लोभ मत करो।

English Translation:

All this—whatever moves or exists in this shifting universe—is enveloped and pervaded by the Lord. Sustain and enjoy yourself through renunciation; do not covet anyone's wealth.

प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य

पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग

ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद संहिता का अभिन्न अंग है। यह मंत्र कर्म और संन्यास के बीच अद्भुत समन्वय स्थापित करता है: संसार की प्रत्येक वस्तु ईश्वर से परिपूर्ण है, अतः किसी भी वस्तु पर मनुष्य का व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं है। व्यक्ति को त्यागभाव से जीवन का आनंद लेना चाहिए और दूसरों के धन या संपदा का लोभ कभी नहीं करना चाहिए।

जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र

इस मंत्र के दो मुख्य सूत्र हैं: (१) 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्' — यह सारा चराचर जगत ईश्वर से आच्छादित है, और (२) 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' — अनासक्त भाव से कर्तव्य करते हुए जीवन निर्वाह करो; किसी के भी धन का लालच मत करो, क्योंकि वास्तविक स्वामी केवल परमात्मा हैं।

शास्त्र प्रमाण
मूल ग्रंथ:ईशावास्योपनिषद्
अध्याय / पर्व:शुक्ल यजुर्वेद संहिता, अध्याय ४० (प्रथम मंत्र)
श्लोक संदर्भ:मंत्र १
वक्ता:वैदिक ऋषि
छंद:अनुष्टुप् वैदिक छंद (३२ अक्षर)