ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥
पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)
सरल हिंदी भावार्थ:
इस गतिशील ब्रह्मांड में जो कुछ भी चराचर जगत है, वह सब ईश्वर से व्याप्त और आच्छादित है। अतः त्यागभाव से (आसक्तिरहित होकर) उसका उपभोग करो; किसी के भी धन का लोभ मत करो।
English Translation:
All this—whatever moves or exists in this shifting universe—is enveloped and pervaded by the Lord. Sustain and enjoy yourself through renunciation; do not covet anyone's wealth.
प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य
पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग
ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद संहिता का अभिन्न अंग है। यह मंत्र कर्म और संन्यास के बीच अद्भुत समन्वय स्थापित करता है: संसार की प्रत्येक वस्तु ईश्वर से परिपूर्ण है, अतः किसी भी वस्तु पर मनुष्य का व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं है। व्यक्ति को त्यागभाव से जीवन का आनंद लेना चाहिए और दूसरों के धन या संपदा का लोभ कभी नहीं करना चाहिए।
जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र
इस मंत्र के दो मुख्य सूत्र हैं: (१) 'ईशा वास्यमिदं सर्वम्' — यह सारा चराचर जगत ईश्वर से आच्छादित है, और (२) 'तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्' — अनासक्त भाव से कर्तव्य करते हुए जीवन निर्वाह करो; किसी के भी धन का लालच मत करो, क्योंकि वास्तविक स्वामी केवल परमात्मा हैं।