वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२॥
पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)
सरल हिंदी भावार्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है।
English Translation:
As a human being casts off worn-out garments and puts on other new ones, so the embodied soul casts off worn-out bodies and enters into other new ones.
प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य
पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग
भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनों और संबंधियों की मृत्यु की आशंका से शोकग्रस्त अर्जुन का भ्रम दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण वस्त्र बदलने का प्रत्यक्ष दृष्टांत देते हैं — जिस प्रकार वस्त्र जीर्ण होने पर मनुष्य नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार जीवात्मा इस नश्वर देह के क्षीण होने पर नया शरीर धारण करती है। अतः आत्मा अविनाशी है और मृत्यु केवल देह का रूपांतरण है।
जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र
यह श्लोक शरीर (नश्वर परिधान) और देही (शाश्वत चेतन आत्मा) के मौलिक भेद को स्पष्ट करता है। शरीर षड्भाव विकारों (उत्पत्ति, अस्तित्व, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और विनाश) के अधीन है, जबकि आत्मा शाश्वत, अजर और अमर है।