यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ७॥
पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)
सरल हिंदी भावार्थ:
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप की रचना करता हूँ अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूँ।
English Translation:
Whenever and wherever there is a decline in righteousness, O descendant of Bharata, and an uprising of unrighteousness—at that time I manifest Myself upon the earth.
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ८॥
पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)
सरल हिंदी भावार्थ:
सत्पुरुषों के उद्धार के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
English Translation:
For the protection of the virtuous, for the destruction of the wicked, and for the firm re-establishment of righteousness, I appear age after age.
प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य
पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग
जब अर्जुन शंका करते हैं कि श्रीकृष्ण का जन्म तो हाल ही में हुआ है, फिर उन्होंने कल्प के आरंभ में सूर्यदेव को यह योग कैसे सिखाया, तब भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य अवतार के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हैं कि वे कर्मबंधन से नहीं, अपितु अपनी योगमाया से धर्म की रक्षा और दुष्टों के संहार हेतु समय-समय पर साकार रूप में अवतरित होते हैं।
जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र
श्लोक ७ में अवतार का काल और निमित्त बताया गया है: धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि। श्लोक ८ में अवतार के त्रिविध प्रयोजन उद्घाटित हैं: (१) साधु पुरुषों का उद्धार व रक्षा, (२) पापियों व दुराचारियों का समूल विनाश, और (३) धर्म की सुदृढ़ व न्यायसंगत स्थापना।