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अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
पाठ/श्लोक/Shrimad Bhagavad Gita
अध्याय ४, श्लोक ७ एवं ८शास्त्रसम्मत प्रामाणिकअनुष्टुप् छंद (३२ अक्षर प्रति श्लोक)भगवान श्रीकृष्ण

यदा यदा हि धर्मस्य (श्रीमद्भगवद्गीता ४.७-४.८)

धर्म की पुनर्स्थापना हेतु भगवान के अवतार का अमर उद्घोष — यदा यदा हि धर्मस्य

0:00 / 0:00Traditional Gita Dhyanam & Chanting with Shloka Meaning

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ७॥

पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)

यदा यदाyadā yadā
जब-जब, जिस-जिस काल में
हिhi
निश्चय ही
धर्मस्यdharmasya
धर्म की, सत्य आचार की
ग्लानिःglāniḥ
हानि, क्षय, पतन
भवतिbhavati
होती है
भारतbhārata
हे भरतवंशी अर्जुन
अभ्युत्थानम्abhyutthānam
उत्थान, अत्यधिक वृद्धि
अधर्मस्यadharmasya
अधर्म की, अन्याय की
तदाtadā
तब, उस समय
आत्मानम्ātmānam
अपने आपको
सृजामिsṛjāmi
रचता हूँ, प्रकट करता हूँ
अहम्aham
मैं

सरल हिंदी भावार्थ:

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने रूप की रचना करता हूँ अर्थात् साकार रूप से प्रकट होता हूँ।

English Translation:

Whenever and wherever there is a decline in righteousness, O descendant of Bharata, and an uprising of unrighteousness—at that time I manifest Myself upon the earth.

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ८॥

पदार्थ (शब्द-दर-शब्द अर्थ)

परित्राणायparitrāṇāya
पूर्ण रक्षा एवं उद्धार के लिए
साधूनाम्sādhūnām
सज्जन पुरुषों, संतों की
विनाशायvināśāya
विनाश एवं संहार के लिए
ca
और
दुष्कृताम्duṣkṛtām
पापियों, अत्याचारियों की
धर्म-संस्थापन-अर्थायdharma-saṁsthāpana-arthāya
धर्म की सम्यक स्थापना के निमित्त
सम्भवामिsambhavāmi
अवतार लेता हूँ, प्रकट होता हूँ
युगे युगेyuge yuge
प्रत्येक युग में

सरल हिंदी भावार्थ:

सत्पुरुषों के उद्धार के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

English Translation:

For the protection of the virtuous, for the destruction of the wicked, and for the firm re-establishment of righteousness, I appear age after age.

प्रसंग एवं दार्शनिक तात्पर्य

पौराणिक / ऐतिहासिक प्रसंग

जब अर्जुन शंका करते हैं कि श्रीकृष्ण का जन्म तो हाल ही में हुआ है, फिर उन्होंने कल्प के आरंभ में सूर्यदेव को यह योग कैसे सिखाया, तब भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य अवतार के गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करते हैं कि वे कर्मबंधन से नहीं, अपितु अपनी योगमाया से धर्म की रक्षा और दुष्टों के संहार हेतु समय-समय पर साकार रूप में अवतरित होते हैं।

जीवन दर्शन एवं साधना सूत्र

श्लोक ७ में अवतार का काल और निमित्त बताया गया है: धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि। श्लोक ८ में अवतार के त्रिविध प्रयोजन उद्घाटित हैं: (१) साधु पुरुषों का उद्धार व रक्षा, (२) पापियों व दुराचारियों का समूल विनाश, और (३) धर्म की सुदृढ़ व न्यायसंगत स्थापना।

शास्त्र प्रमाण
मूल ग्रंथ:श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय / पर्व:ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (भीष्म पर्व, महाभारत)
श्लोक संदर्भ:अध्याय ४, श्लोक ७ एवं ८
वक्ता:भगवान श्रीकृष्ण
छंद:अनुष्टुप् छंद (३२ अक्षर प्रति श्लोक)