✦ आज: कृष्ण पक्ष एकादशी· एकादशी · 1 दिन में· प्रदोष · 3 दिन में· अमावस्या · 5 दिन में· गणेश चतुर्थी · 8 दिन में
अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
The stone shikhara of Baba Baidyanath Dham temple in Deoghar surrounded by the sacred complex of twenty-two shrines in morning sunlight

Deoghar, Santhal Parganas, Jharkhand (with Parli, Maharashtra tradition)

बाबा बैद्यनाथ धाम (वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग)

Baidyanath (Vaidyanath) Temple

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में नौवां पावन धाम और इक्यावन शक्तिपीठों में हृदयपीठ। जहां रावण के तप से प्रसन्न होकर महादेव ने 'वैद्य' बनकर उसके क्षत-विक्षत शीशों का उपचार किया था। सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर 105 किमी की पदयात्रा करने वाले कांवड़ियों की यह परम साधना स्थली है।

परम पावन बाबा बैद्यनाथ धाम — देवघर

The Sanctum of the Divine Physician

झारखंड के संथाल परगना में स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम भारत के सबसे पावन और जागृत शिव तीर्थों में से एक है। 'देवघर' नाम का अर्थ ही है—'देवताओं का घर'।

मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जो फर्श से लगभग 4 इंच ऊंचा है। शिवलिंग के ऊपरी हिस्से पर एक गड्ढे जैसा निशान दिखाई देता है। जनआस्था के अनुसार, यह वही निशान है जो तब बना था जब लंकापति रावण ने इस अचल लिंग को जमीन से उखाड़ने का प्रयास किया था।

मुख्य मंदिर लगभग 72 फीट ऊंचा है। इसके शिखर पर पारंपरिक त्रिशूल की जगह एक दुर्लभ सोने का 'पंचशूल' (पांच फलकों वाला शूल) सुशोभित है। मुख्य गर्भगृह के चारों ओर एक विशाल प्रांगण में 21 अन्य मंदिर बने हैं, जिनमें माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय, ब्रह्मा, सरस्वती, काली और हनुमान जी के मंदिर शामिल हैं। यह प्रांगण शिव, शक्ति और वैष्णव भक्ति के सुंदर समन्वय का प्रतीक है।

रावण की तपस्या, वैद्य रूप में शिव और कामना लिंग प्राकट्य

The Puranic Legend: Ravana's Tapasya and the Immovable Lingam

शिवपुराण और पद्मपुराण में वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के प्राकट्य की बड़ी रोचक कथा आती है।

रावण अपनी राजधानी लंका को अजेय बनाना चाहता था। इसलिए उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत पर घोर तपस्या की। जब महादेव प्रकट नहीं हुए, तो रावण ने अपने एक-एक शीश काटकर हवन कुंड में अर्पित करना शुरू कर दिया।

जब वह अपना दसवां सिर काटने लगा, तब महादेव उसके समर्पण से प्रसन्न होकर साक्षात प्रकट हो गए। एक कुशल 'वैद्य' (चिकित्सक) की तरह भगवान शिव ने रावण के सभी कटे हुए शीशों को पुनः जोड़ दिया और उसके सारे घाव भर दिए। इस प्रकार देवताओं के वैद्य बनकर रोग और कष्ट हरने के कारण ही महादेव का नाम 'वैद्यनाथ' पड़ा।

इसके बाद रावण ने वरदान में भगवान शिव के स्वयंभू शिवलिंग को लंका ले जाने की प्रार्थना की। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, लेकिन एक शर्त रखी: रास्ते में जहां भी तुम इस लिंग को जमीन पर रख दोगे, यह वहीं सदा के लिए स्थापित हो जाएगा।

जब रावण शिवलिंग लेकर चला, तो देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश एक चरवाहे बालक का रूप धारण कर देवघर में मिले। लघुशंका के कारण रावण ने वह शिवलिंग कुछ देर के लिए उस बालक को थमा दिया। जैसे ही रावण गया, गणेश जी ने उस भारी शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। लौटकर रावण ने उसे उठाने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दी, लेकिन शिवलिंग टस से मस नहीं हुआ। अंततः रावण ने नतमस्तक होकर पूजा की और वहीं से यह पावन ज्योतिर्लिंग 'कामना लिंग' और 'बाबा बैद्यनाथ' के नाम से संसार भर में प्रसिद्ध हुआ।

शास्त्र सम्मत दो पावन परम्पराएं — देवघर एवं परली वैजनाथ

Scriptural Identifications: Deoghar and Parli Vaidyanath

वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के संदर्भ में भारत में दो परम पावन तीर्थ अत्यंत आदरणीय माने जाते हैं:

1. **देवघर का बैद्यनाथ धाम (झारखंड)**: - उत्तर, पूर्व और मध्य भारत में इसे प्रमुख ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। - शिवपुराण में इसका उल्लेख 'चिताभूमि' के रूप में आता है। - यह 51 शक्तिपीठों में से भी एक है (हृदयपीठ, जहां माता सती का हृदय गिरा था)। यहां शिव मंदिर और माता पार्वती के मंदिर के शिखरों को लाल पवित्र वस्त्र (गठबंधन) से बांधने की अनूठी परंपरा है, जो शिव और शक्ति के शाश्वत मिलन का प्रतीक है।

2. **परली वैजनाथ (बीड जिला, महाराष्ट्र)**: - आदि शंकराचार्य रचित 'द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्' की पंक्ति *"परल्यां वैद्यनाथं च..."* के अनुसार पश्चिमी और दक्षिणी भारत में परली को श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है। - यह मंदिर एक पहाड़ी पर काले पत्थरों से बना है और संत ज्ञानेश्वर व संत एकनाथ जैसे महाराष्ट्र के महान संतों ने इसका गुणगान किया है।

सनातन तीर्थ परंपरा इन दोनों धामों को एक ही परमेश्वर के पावन स्वरूप मानती है। श्रद्धालु दोनों ही स्थानों पर पूरी श्रद्धा से दर्शन करने जाते हैं।

श्रावणी मेला — सुल्तानगंज से देवघर की 105 किमी कांवड़ यात्रा

The Shravani Mela: The 105 km Barefoot Kanwar Yatra

सावन के पवित्र महीने में बैद्यनाथ धाम विश्व प्रसिद्ध 'श्रावणी मेले' का केंद्र बन जाता है। यह दुनिया की सबसे लंबी और सबसे बड़ी धार्मिक पैदल यात्राओं में से एक है।

लाखों श्रद्धालु (जिन्हें कांवड़िया या 'बोल-बम' यात्री कहा जाता है) केसरिया वस्त्र पहनकर बिहार के सुल्तानगंज में गंगा तट पर एकत्र होते हैं। यहां गंगा नदी उत्तर की ओर बहती है (उत्तरवाहिनी गंगा), जिसे विशेष रूप से पवित्र माना जाता है।

श्रद्धालु गंगाजल भरकर अपने बांस की सजी हुई कांवड़ में रखते हैं। इस यात्रा का नियम बहुत कड़ा होता है: - रास्ते में कांवड़ को कभी जमीन पर नहीं रखा जाता। - भक्त सुल्तानगंज से देवघर तक 105 किलोमीटर की दूरी नंगे पांव पैदल चलकर तय करते हैं। - रास्ते भर 'बोल बम, हर हर बम बम' का जयघोष गूंजता रहता है।

देवघर पहुंचकर कांवड़िए यह पवित्र गंगाजल बाबा बैद्यनाथ के शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।

दर्शन और यात्रा की जानकारी

दर्शन का समयप्रातः 4:00 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक (सुबह का दर्शन और जलाभिषेक); शाम 6:00 बजे से रात 9:00 बजे तक (संध्या आरती और विशेष श्रृंगार)। सावन मास के दौरान दर्शन तड़के 3:00 बजे से शुरू होकर लगभग दिन-रात निरंतर चलते रहते हैं।
पहनावा (वेशभूषा)पारंपरिक और शालीन भारतीय वस्त्र। गर्भगृह में स्वयं जाकर जलाभिषेक करने वाले श्रद्धालुओं के लिए सूती धोती पहनना उचित माना जाता है। चमड़े की वस्तुएं (बेल्ट, पर्स आदि) अंदर ले जाना पूरी तरह वर्जित है।
दर्शन का सर्वोत्तम समयअक्टूबर से मार्च का समय मौसम के लिहाज से सबसे उत्तम रहता है। कांवड़ यात्रा और श्रावणी मेले की अनूठी ऊर्जा का अनुभव करने के लिए सावन (जुलाई-अगस्त) में आएं, हालांकि इस समय भारी भीड़ रहती है।
विशेष पर्व व उत्सवश्रावणी मेला (पूरे एक महीने चलने वाला विश्व प्रसिद्ध कांवड़ मेला) · महाशिवरात्रि (रात्रि जागरण और शिव-पार्वती विवाहोत्सव) · बसंत पंचमी (बाबा बैद्यनाथ का पारंपरिक तिलकोत्सव) · भाद्रपद मेला

त्योहारों और सावन के दिनों में सामान्य कतार में कई घंटे लग सकते हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा शीघ्र दर्शन (वीआईपी टोकन) की भी व्यवस्था की जाती है।

मंदिर कैसे पहुँचें

हवाई मार्गदेवघर हवाई अड्डा (अटल बिहारी वाजपेयी हवाई अड्डा) मंदिर से मात्र 8 किमी दूर है, जहां से दिल्ली, कोलकाता, रांची और पटना के लिए सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं।
रेल मार्गनिकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन जसीडीह जंक्शन (JSME, लगभग 7 किमी) और देवघर जंक्शन हैं। जसीडीह हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है, जो कोलकाता, पटना, वाराणसी और दिल्ली से सीधा जुड़ा है।
सड़क मार्गदेवघर सड़क मार्ग द्वारा रांची (250 किमी), पटना (280 किमी), गया (240 किमी) और कोलकाता (320 किमी) से जुड़ा है। प्रमुख शहरों से सरकारी व निजी बसें नियमित चलती हैं।

जसीडीह स्टेशन से देवघर मंदिर तक ऑटो, ई-रिक्शा और टैक्सी से मात्र 15 से 20 मिनट का समय लगता है।

आस-पास के पवित्र स्थल

बासुकीनाथ मंदिर42 km

दुमका में स्थित प्रसिद्ध शिव धाम; परंपरा अनुसार बाबा बैद्यनाथ के दर्शन के बाद बासुकीनाथ के दर्शन करने से ही यात्रा पूर्ण मानी जाती है।

द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा

बारह ज्योतिर्लिंगों में नौवां पावन धाम।

51 शक्तिपीठ यात्रा (माँ पार्वती हृदयपीठ)

शिवलिंग के ठीक सामने माता सती का हृदयपीठ, जो शिव और शक्ति के मिलन का दुर्लभ केंद्र है।

परली वैजनाथ मंदिर (महाराष्ट्र)1,550 km

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र परंपरा में वर्णित महाराष्ट्र का पूज्य वैजनाथ धाम।

तपोवन गुफाएं और त्रिकूट पर्वत10 km

प्राकृतिक गुफाएं और पहाड़ जहां महर्षि वाल्मीकि और कई ऋषियों ने तपस्या की थी।

नौलखा मंदिर (युगल मंदिर)2 km

बेलूर मठ शैली में बना राधा-कृष्ण का भव्य और दर्शनीय संगमरमरी मंदिर।

सुल्तानगंज अजगैबीनाथ मंदिर105 km

उत्तरवाहिनी गंगा के मध्य चट्टान पर बना पवित्र मंदिर, जहां से कांवड़िए जल भरकर देवघर की पदयात्रा शुरू करते हैं।

स्रोत