अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
Mahakaleshwar temple at Ujjain — the multi-tiered shikhara above the Shipra river ghats at dawn

Ujjain, Madhya Pradesh

महाकालेश्वर

Mahakaleshwar

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी पावन धाम, जहां ब्रह्ममुहूर्त में दिव्य भस्म आरती होती है। क्षिप्रा नदी के तट पर बसी प्राचीन अवंतिका (उज्जैन) नगरी में स्थित महाकालेश्वर मंदिर काल और मृत्यु के अधिपति भगवान शिव का परम धाम है।

महाकाल की नगरी — उज्जयिनी

City of Mahakaal

उज्जैन (प्राचीन अवंतिका) सनातन धर्म की सात पवित्र पुरियों (सप्त पुरियों) में से एक है, जो मध्य प्रदेश में पवित्र क्षिप्रा नदी के पूर्वी तट पर बसी है। यह प्राचीन भारत की महान ज्ञान व संस्कृति की राजधानी रही है — सम्राट विक्रमादित्य की नगरी, महाकवि कालिदास की कर्मभूमि और सदियों तक खगोल विज्ञान का प्रमुख केंद्र।

प्राचीन भारतीय ज्योतिष और खगोल शास्त्र में उज्जैन को पृथ्वी का केंद्र यानी 'शून्य देशांतर रेखा' (प्राइम मेरिडियन) माना जाता था, जहां से समय की गणना होती थी। इसी कारण उज्जैन को 'काल की नगरी' और इसके आराध्य को 'महाकाल' (काल और समय के स्वामी) कहा जाता है।

क्षिप्रा नदी का तट उन चार पावन स्थलों में से एक है जहां कुंभ मेला लगता है। जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तो उज्जैन में लगने वाले 'सिंहस्थ कुंभ' में देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु आते हैं।

City of Mahakaal

महाकाल — समय और मृत्यु के अधिपति

Mahakaal — Lord of Time

संस्कृत में 'काल' के दो अर्थ होते हैं — समय और मृत्यु। भगवान शिव जब महाकाल के रूप में पूजे जाते हैं, तो वे समस्त समय-चक्र और मृत्यु से भी परे परम तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वयंभू माना जाता है। इस पावन ज्योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'दक्षिणमुखी' होना है। सनातन परंपरा में दक्षिण दिशा को यमराज (मृत्यु के देवता) की दिशा माना जाता है। दक्षिण की ओर मुख करके विराजमान महादेव का यह स्वरूप भक्तों को अकाल मृत्यु और भय से मुक्ति प्रदान करता है।

स्कंद पुराण के अवंतिका महात्म्य के अनुसार, दूषण नामक असुर के अत्याचार से अवंतिका के ब्राह्मणों और नगरवासियों की रक्षा के लिए भगवान शिव हुंकार भरकर धरती फाड़कर प्रकट हुए थे और नगर के स्थायी रक्षक बन गए।

अलौकिक भस्म आरती

The Bhasma Aarti

महाकालेश्वर मंदिर की भस्म आरती विश्व की सबसे अनूठी और दिव्य पूजा परंपराओं में से एक है।

यह आरती प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में (प्रातः लगभग 4:00 बजे) सूर्योदय से पूर्व होती है। आरती से पहले ज्योतिर्लिंग का पंचामृत से अभिषेक और श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद मंत्रोच्चार के बीच पवित्र भस्म से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

भोर का शांत वातावरण, दीपकों का प्रकाश, डमरू और शंख की गूंज और भस्म में रमे महादेव का दर्शन भक्त के मन से मृत्यु और भय के सारे संशय मिटा देता है। भस्म आरती में सम्मिलित होने के लिए मंदिर समिति की वेबसाइट से पहले से पंजीकरण कराना होता है।

The Bhasma Aarti

इतिहास और भव्य स्वरूप

History

महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' और प्राचीन पुराणों में महाकाल मंदिर की भव्यता का सुंदर वर्णन मिलता है, जो सिद्ध करता है कि यह मंदिर ईसा पूर्व से ही अत्यंत वैभवशाली रहा है।

1234 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के शासक इल्तुतमिश ने उज्जैन पर आक्रमण कर मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। इसके बाद सदियों तक भक्तों ने इसकी पूजा जारी रखी।

18वीं शताब्दी में जब मालवा पर मराठा साम्राज्य का अधिकार हुआ, तब ग्वालियर के सिंधिया राजवंश के सेनापति रामचंद्र बाबा शेणवी ने वर्तमान बहुमंजिला पाषाण मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कराया।

मंदिर के ऊपरी तल पर ओंकारेश्वर महादेव का मंदिर भी स्थापित है। हाल ही में निर्मित भव्य 'श्री महाकाल लोक' कॉरिडोर ने इस तीर्थ क्षेत्र को और भी सुंदर व सुगम बना दिया है।

दर्शन और यात्रा की जानकारी

दर्शन का समयभस्म आरती: प्रातः 4:00 बजे (पहले से ऑनलाइन बुकिंग अनिवार्य)। सामान्य दर्शन: प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 11:00 बजे तक। प्रमुख आरतियां: नैवेद्य आरती (प्रातः 7:30 बजे), महाभोग आरती (प्रातः 10:30 बजे), एवं संध्या आरती (सायं काल)।
पहनावा (वेशभूषा)भस्म आरती के समय नंदी हॉल में पुरुषों के लिए बिना सिला सूती धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी अनिवार्य है। सामान्य दर्शन के लिए शालीन भारतीय वस्त्र।
दर्शन का सर्वोत्तम समयअक्टूबर से मार्च का समय यात्रा के लिए सबसे सुखद रहता है। श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर विशेष मेला लगता है। सिंहस्थ कुंभ हर 12 वर्ष में आयोजित होता है।
विशेष पर्व व उत्सवमहाशिवरात्रि · श्रावण मास की महाकाल सवारी · सिंहस्थ कुंभ मेला · प्रदोष व्रत · कार्तिक पूर्णिमा

भस्म आरती के लिए आधिकारिक वेबसाइट (mahakaleshwar.com) से पहले से ऑनलाइन अनुमति लेना आवश्यक है। गर्भगृह में मोबाइल और कैमरा ले जाना वर्जित है।

मंदिर कैसे पहुँचें

हवाई मार्गइंदौर का देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (IDR) उज्जैन से केवल 55 किमी दूर है। हवाई अड्डे से टैक्सी और बसें आसानी से मिल जाती हैं।
रेल मार्गउज्जैन जंक्शन (UJN) भारत के प्रमुख रेल मार्गों से जुड़ा है। इंदौर (55 किमी), भोपाल (185 किमी), दिल्ली और मुंबई से सीधी ट्रेनें हैं।
सड़क मार्गउज्जैन राष्ट्रीय राजमार्ग 52 पर स्थित है। इंदौर से 55 किमी (लगभग 1 घंटा), भोपाल से 185 किमी। इंदौर-उज्जैन के बीच हर 10 मिनट में बसें और टैक्सियां चलती हैं।

अधिकांश श्रद्धालु इंदौर को आधार बनाकर एक ही दिन में उज्जैन और ओंकारेश्वर के दर्शन की योजना बनाते हैं।

आस-पास के पवित्र स्थल

द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा

तीसरा पावन ज्योतिर्लिंग, जो काल और समय का एकमात्र दक्षिणमुखी केंद्र है।

काल भैरव मंदिर (उज्जैन)2 km

उज्जैन के सेनापति और रक्षक — यहां की मदिरा भोग की अनूठी परंपरा विश्वप्रसिद्ध है।

राम घाट (उज्जैन)1 km

क्षिप्रा नदी का मुख्य स्नान घाट, जहां सिंहस्थ कुंभ का शाही स्नान आयोजित होता है।

हरसिद्धि शक्तिपीठ मंदिर1 km

उज्जैन का पावन शक्तिपीठ — जहां मां सती की कुहनी गिरी थी, सम्राट विक्रमादित्य की कुलदेवी।

सांदीपनि आश्रम4 km

वह पावन तपोभूमि जहां भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुदामा ने शिक्षा प्राप्त की थी।

मध्य प्रदेश का दूसरा पावन ज्योतिर्लिंग, जो पवित्र नर्मदा नदी के ॐ आकार द्वीप पर स्थित है।

स्रोत