धृतराष्ट्र उवाच— धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र ने कहा— हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
धृतराष्ट्र उवाच— धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र ने कहा— हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?
सञ्जय उवाच— दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥
संजय ने कहा— उस समय पांडवों की चक्रव्यूहाकार सेना को देखकर राजा दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः। हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते॥
संजय ने कहा— हे राजन्! इसके पश्चात कपिध्वज (जिसकी ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान हैं) अर्जुन ने धृतराष्ट्र के पुत्रों को शस्त्र चलाने के लिए उद्यत देखकर अपना धनुष उठाया और भगवान श्री कृष्ण (हृषीकेश) से यह वचन कहे।
अर्जुन उवाच— सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत। यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्॥
अर्जुन ने कहा— हे अच्युत (श्री कृष्ण)! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, ताकि मैं युद्ध की अभिलाषा से खड़े इन योद्धाओं को भलीभांति देख सकूँ।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्। सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
अर्जुन ने कहा— हे कृष्ण! युद्ध की इच्छा से उपस्थित अपने ही स्वजनों (बंधु-बांधवों) को सामने देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुख सूखा जा रहा है।
सञ्जय उवाच— एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
संजय ने कहा— युद्धभूमि में ऐसा कहकर शोकाकुल मन वाले अर्जुन ने अपने बाण सहित धनुष को त्याग दिया और रथ के पिछले भाग में बैठ गए।