अनन्तमार्गडिजिटल पंचांग
Traditional temple sanctum depiction of Lord Dhanvantari with four arms holding the nectar kalash, conch, discus, and herbs

धनतेरस

धनत्रयोदशी — भगवान धन्वन्तरि की जयंती एवं दीपोत्सव का शुभारंभ

धनतेरस क्या है?

धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व पाँच दिनों के दीपोत्सव का पहला दिन है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान धन्वन्तरि की जयंती मनाई जाती है, जिन्हें आयुर्वेद और आरोग्य के प्रवर्तक के रूप में पूजा जाता है। इसके साथ ही धन के संरक्षक देव भगवान कुबेर और माँ लक्ष्मी का पूजन होता है। लोग इस दिन नए बर्तन, सोना-चांदी या झाड़ू खरीदकर घर में नई शुरुआत का स्वागत करते हैं।

यह क्यों मनाया जाता है?

परंपरा के अनुसार, समुद्र मंथन के समय कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन ही भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश और आरोग्य देने वाली औषधियां लेकर प्रकट हुए थे। इसके साथ ही एक लोकप्रिय लोककथा राजा हिम के सोलह वर्षीय पुत्र से भी जुड़ी है। भविष्यवाणी थी कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। उसकी चतुर पत्नी ने कमरे के द्वार पर सोने-चांदी के गहनों का ढेर लगा दिया और चारों ओर दीपक जला दिए। जब यमराज सर्प के रूप में आए, तो दीपों के प्रकाश के कारण वे अंदर नहीं जा सके और राजकुमार के प्राण बच गए।

इसे कैसे मनाया जाता है?

सुबह घर की साफ-सफाई की जाती है। शाम को प्रदोष काल (सूर्यास्त के तुरंत बाद) में भगवान धन्वन्तरि, माँ लक्ष्मी और कुबेर जी की पूजा की जाती है। इसी समय घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यम दीपदान किया जाता है, ताकि परिवार अकाल कष्टों से बचा रहे। दीपक के नियमों में क्षेत्रीय भिन्नता मिलती है: कई जगह चार बत्तियों वाला मिट्टी का दीपक सरसों या तिल के तेल से जलाया जाता है, तो कुछ क्षेत्रों में आटे का चौमुखा दीपक बनाने की परंपरा है। लोग अपनी सुविधा के अनुसार पीतल, तांबे या कांसे के बर्तन, सोने-चांदी के आभूषण या झाड़ू खरीदते हैं।

यह कब मनाया जाता है?

धनतेरस का निर्णय कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि के प्रदोष काल (शाम के समय) से होता है। जब त्रयोदशी तिथि सूर्यास्त के बाद के समय को स्पर्श करती है, उसी दिन यह पर्व और यम दीपदान संपन्न किया जाता है।

मुख्य बातें

धन्वन्तरि जयंती

समुद्र मंथन से अमृत कलश और आरोग्य का ज्ञान लेकर प्रकट हुए भगवान धन्वन्तरि का पारंपरिक पावन दिवस।

यम दीपदान

शाम को प्रदोष काल में घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाना, जिससे यमराज की कृपा से अकाल संकट दूर रहे।

कुबेर एवं लक्ष्मी पूजन

धन के संरक्षक देव कुबेर और माँ लक्ष्मी की आराधना, ताकि घर में सात्विक समृद्धि और शांति बनी रहे।

शुभ खरीदारी

पीतल, तांबे या चांदी के बर्तन, सिक्के अथवा झाड़ू खरीदना, जो स्वच्छता और घर में शुभता के आगमन का प्रतीक माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

धनतेरस पर नए बर्तन या सोना-चांदी खरीदने की परंपरा क्यों है?

भगवान धन्वन्तरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए ऐसी मान्यता है कि इस दिन पात्र (बर्तन) खरीदना शुभ होता है। धनतेरस पर पीतल, तांबे या कांसे के बर्तन, अथवा सोना-चांदी खरीदना घर में सुख-समृद्धि के आने का प्रतीक माना जाता है। यह एक शुभ परंपरा है, शास्त्र का अनिवार्य नियम नहीं।

यम दीपदान क्या है और इसे किस दिशा में रखा जाता है?

यम दीपदान कार्तिक त्रयोदशी की शाम प्रदोष काल में किया जाने वाला एक दीपदान है। इसमें यमराज के निमित्त एक दीपक घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है, ताकि परिवार अकाल कष्टों से सुरक्षित रहे।

धनतेरस पर मुख्य रूप से किसकी पूजा की जाती है — धन्वन्तरि, कुबेर या लक्ष्मी?

अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में परंपराएं भिन्न हैं। अधिकतर घरों में सायं पूजा में तीनों — भगवान धन्वन्तरि (आरोग्य के लिए), माँ लक्ष्मी (सुख-सौभाग्य के लिए) और भगवान कुबेर (समृद्धि के संरक्षक) — की एक साथ पूजा की जाती है। किसी एक निश्चित क्रम की बाध्यता नहीं है।

क्या धनतेरस के दिन उपवास रखा जाता है?

धनतेरस मुख्य रूप से पूजा, दीपदान और उत्सव का पर्व है, इसमें कठोर उपवास अनिवार्य नहीं होता। कई श्रद्धालु शाम की पूजा और यम दीपदान संपन्न होने तक सात्विक फलाहार या हल्का नियम रखते हैं।

धनतेरस पर झाड़ू खरीदना शुभ क्यों माना जाता है?

भारतीय लोकपरंपरा में झाड़ू को घर की स्वच्छता और दरिद्रता दूर करने का माध्यम माना जाता है। इसे घर लाकर नकारात्मकता को बाहर निकालने और माँ लक्ष्मी के स्वागत के लिए स्वच्छता तैयार करने का प्रतीक माना जाता है।

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