नरक चतुर्दशी क्या है?
नरक चतुर्दशी, जिसे आम बोलचाल में छोटी दिवाली भी कहा जाता है, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह पाँच दिनों के दीपोत्सव का दूसरा दिन है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसके कई रूप देखने को मिलते हैं: उत्तर और पश्चिमी भारत में इसे रूप चौदस या रूप चतुर्दशी कहते हैं, गुजरात में काली चौदस के रूप में मनाया जाता है, और दक्षिण भारत के कई राज्यों में यही मुख्य दीपावली का दिन होता है। इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण नियम सूर्योदय से पहले किया जाने वाला अभ्यंग स्नान है, जिसमें तिल का तेल और उबटन लगाकर स्नान किया जाता है।
यह क्यों मनाया जाता है?
श्रीमद्भागवत (10.59) में कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर का राजा नरकासुर, जिसे भौमासुर भी कहते हैं, देवमाता अदिति के कुंडल छीन ले गया था और उसने हजारों कन्याओं को बंदी बना रखा था। भगवान श्रीकृष्ण रानी सत्यभामा के साथ गरुड़ पर सवार होकर वहाँ गए, नरकासुर को पराजित किया और बंदियों को मुक्त कराया। बाद की एक बहुत प्रचलित परंपरा यह भी कहती है कि भूमि देवी का पुत्र नरकासुर केवल अपनी माता के हाथों ही मारा जा सकता था, और भूमि देवी का अवतार मानी जाने वाली सत्यभामा ने ही उस पर अंतिम प्रहार किया। लोकमान्यता है कि युद्ध के बाद श्रीकृष्ण ने सूर्योदय से पहले सुगंधित तेल लगाकर स्नान किया, और इसी से इस दिन के प्रातः स्नान की परंपरा जोड़ी जाती है।
इसे कैसे मनाया जाता है?
इस दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले अरुणोदय काल में होती है। शरीर पर तिल के तेल की मालिश की जाती है और बेसन, हल्दी, चंदन से बना पारंपरिक उबटन लगाकर स्नान किया जाता है। कई परिवारों में अपामार्ग की टहनी को सिर पर घुमाकर जल में प्रवाहित करने की परंपरा है, जो नकारात्मकता दूर करने का प्रतीक है। शाम को घर के मुख्य द्वार, आंगन और तुलसी के पास मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। परंपरा के अनुसार इस शाम चौदह दीपक (चौदस के दीये) जलाने का विशेष महत्व माना जाता है। दक्षिण भारत में इस स्नान के तुरंत बाद नए वस्त्र पहनकर दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।
यह कब मनाया जाता है?
नरक चतुर्दशी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मनाई जाती है। अभ्यंग स्नान सूर्योदय से पहले उस समय किया जाता है जब चतुर्दशी तिथि चल रही हो: अरुणोदय काल (सूर्योदय से चार घटी, लगभग 96 मिनट पहले) में, और कई पंचांग इसे इसी अवधि में चंद्रोदय के समय से तय करते हैं। स्नान भोर की तिथि से तय होता है, इसलिए कुछ वर्षों में यह लक्ष्मी पूजा वाले दिन की सुबह ही पड़ता है। शाम के दीये संध्या के समय जलाए जाते हैं।
मुख्य बातें
नरकासुर वध
सत्यभामा के साथ गए भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय और हजारों बंदी कन्याओं की मुक्ति की स्मृति।
अभ्यंग स्नान
सूर्योदय से पूर्व तिल का तेल और उबटन लगाकर स्नान करने का विधान, जो शरीर की शुद्धि और ताजगी का प्रतीक है।
चौदह दीपकों की परंपरा
शाम के समय घर की देहरी, तुलसी और आंगन में चौदह मिट्टी के दीये जलाने की लोकपरंपरा, जो अंधकार पर प्रकाश का प्रतीक मानी जाती है।
विविध क्षेत्रीय परंपराएं
उत्तर भारत में रूप चौदस, गुजरात में काली चौदस और दक्षिण भारत में मुख्य दीपावली के रूप में उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय से पहले अभ्यंग स्नान क्यों किया जाता है?
धर्मग्रंथों में उद्धृत एक पारंपरिक श्लोक के अनुसार इस दिन प्रातःकाल तेल में लक्ष्मी और जल में गंगा का वास माना जाता है, इसलिए सूर्योदय से पहले तिल का तेल लगाकर किया गया स्नान विशेष पवित्र माना गया है। परंपरा में यह भी कहा जाता है कि यह स्नान नरक के भय से बचाता है, और दिन के नाम की एक व्याख्या यही है। लोकमान्यता इसे नरकासुर पर विजय के बाद श्रीकृष्ण के स्नान से भी जोड़ती है।
नरकासुर से युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के साथ सत्यभामा क्यों गई थीं?
श्रीमद्भागवत में सत्यभामा गरुड़ पर श्रीकृष्ण के साथ जाती हैं और श्रीकृष्ण नरकासुर को पराजित करते हैं। बाद की एक बहुत प्रचलित परंपरा कहती है कि भूमि देवी का पुत्र नरकासुर केवल अपनी माता के हाथों ही मारा जा सकता था, और भूमि देवी का अवतार मानी जाने वाली सत्यभामा ने उस पर अंतिम प्रहार किया। आज दोनों रूप सुनाए जाते हैं।
छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) पर चौदह दीये क्यों जलाए जाते हैं?
यह पर्व चतुर्दशी (चौदहवीं तिथि) को पड़ता है, इसलिए शाम को चौदह मिट्टी के दीपक जलाने की लोकपरंपरा है। यह शास्त्र का नियम नहीं, घर-घर की रीति है। दीये मुख्य द्वार, आंगन और तुलसी के पास रखे जाते हैं; संख्या और स्थान परिवार के अनुसार बदलते हैं।
काली चौदस और नरक चतुर्दशी में क्या अंतर है?
दोनों एक ही तिथि पर आते हैं, लेकिन इनकी पूजा पद्धति में अंतर है। नरक चतुर्दशी में श्रीकृष्ण की विजय और सुबह के अभ्यंग स्नान का महत्व है, जबकि गुजरात व पश्चिमी भारत में काली चौदस की रात माँ काली या हनुमान जी की पूजा करके भय और नकारात्मकता को दूर किया जाता है।
दक्षिण भारत में इसी दिन मुख्य दीपावली क्यों मनाई जाती है?
दक्षिण भारत की परंपरा में दीपावली का मुख्य उत्सव नरकासुर पर भगवान श्रीकृष्ण की विजय से जुड़ा है। इसलिए वहाँ चतुर्दशी की सुबह ही सूर्योदय से पूर्व गंगा स्नान (तेल मालिश कर स्नान), नए कपड़े पहनना और पटाखे जलाना मुख्य दीपावली का उत्सव माना जाता है।
