गंधर्व ललित, उसकी पत्नी ललिता और व्रत से शाप-मुक्ति की कथा — पद्म पुराण से
इस कथा के बारे में
चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी की यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के अध्याय 47 में है। श्रीकृष्ण इसे युधिष्ठिर को उसी रूप में सुनाते हैं जैसे वसिष्ठ मुनि ने राजा दिलीप को सुनाई थी। इस अध्याय में वन के मुनि का नाम नहीं दिया गया है; कई हिंदी पुस्तकों में उन्हें श्रृंगी ऋषि कहा गया है।
पूजन सामग्री
पूजन विधि(एकादशी से द्वादशी के पारण तक / From Ekadashi until the parana on Dwadashi)
अध्याय के अनुसार: चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु के सामने व्रत रखा जाता है; कथा में ललिता एकादशी और द्वादशी दोनों दिन व्रत रखती है।
अध्याय के अनुसार: व्रत का पुण्य किसी और को अर्पित किया जा सकता है, जैसे ललिता अपने पति को करती है।
रीति: तुलसी, फूल, दीपक और नैवेद्य से भगवान विष्णु की पूजा, और कथा सुनना।
रीति: व्रत का प्रकार परिवार और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है। एकादशी को चावल और अन्न न खाना प्रचलित रीति है; इस अध्याय में यह नहीं कहा गया।
पारण: व्रत का पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि के रहते किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।
सम्पूर्ण कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन-सी है। श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं तुम्हें एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, जो वसिष्ठ मुनि ने राजा दिलीप को उनके पूछने पर सुनाई थी। वसिष्ठ ने बताया कि इस एकादशी का नाम कामदा है।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को वह कथा सुनाई जो वसिष्ठ ने राजा दिलीप को कही थी; चैत्र शुक्ल एकादशी का नाम कामदा है।
नागपुर नाम का एक नगर था, जो सोने और रत्नों से सजा था। वहाँ नागों के राजा पुंडरीक राज करते थे, और गंधर्व, किन्नर तथा अप्सराएँ उनकी सेवा में रहते थे। वहीं ललित नाम का एक गंधर्व और उसकी पत्नी ललिता नाम की अप्सरा रहते थे। दोनों में बहुत प्रेम था और दोनों सदा एक-दूसरे के मन में बसे रहते थे।
नागपुर में नागराज पुंडरीक के यहाँ गंधर्व ललित और उसकी पत्नी ललिता रहते थे, जिनमें बहुत प्रेम था।
एक बार राजा पुंडरीक की सभा में ललित गा रहा था और नृत्य कर रहा था; ललिता उसके साथ नहीं थी। गाते समय उसे ललिता की याद आ गई और गीत के शब्दों में उसकी जीभ लड़खड़ा गई। कर्कोटक नाम के नाग ने यह भूल पकड़ ली और राजा को बता दी।
सभा में गाते समय ललिता की याद से ललित के शब्द लड़खड़ा गए; कर्कोटक नाग ने यह राजा को बता दिया।
राजा पुंडरीक क्रोधित हो गए। उन्होंने ललित को शाप दिया कि तू मेरे सामने गाते समय पत्नी के प्रेम के वश में था, इसलिए कच्चा मांस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस हो जा। ललित उसी क्षण भयंकर राक्षस बन गया, जिसका शरीर आठ योजन ऊँचा था। पति की यह दशा देखकर ललिता बहुत दुखी हुई और उसे कहीं चैन नहीं मिला।
राजा के शाप से ललित भयंकर राक्षस बन गया; ललिता बहुत दुखी हुई।
राक्षस बना ललित एक घने वन में भटकने लगा, और ललिता रोती हुई उसके पीछे-पीछे चलती रही। वन में उसे एक सुंदर आश्रम और शांत स्वरूप वाले एक मुनि दिखाई दिए। ललिता ने उन्हें प्रणाम किया। मुनि ने दया से पूछा कि तुम कौन हो और यहाँ क्यों आई हो। ललिता ने कहा कि मैं वीरधन्वा नाम के गंधर्व की पुत्री ललिता हूँ; मेरे पति शाप से राक्षस हो गए हैं। बताइए कि किस पुण्य से वे इस दशा से मुक्त होंगे।
वन में ललिता ने एक मुनि से पूछा कि किस पुण्य से उसके पति राक्षस-दशा से मुक्त होंगे।
मुनि ने कहा कि अभी चैत्र का शुक्ल पक्ष चल रहा है; तुम कामदा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य अपने पति को दे दो, उसका पाप उसी क्षण दूर हो जाएगा। ललिता ने एकादशी और द्वादशी दोनों दिन व्रत रखा। द्वादशी को, एक ब्राह्मण की उपस्थिति में और भगवान विष्णु के सामने, उसने कहा कि कामदा व्रत से प्राप्त पुण्य के प्रभाव से मेरे पति की राक्षस-दशा दूर हो जाए।
मुनि के कहने पर ललिता ने एकादशी और द्वादशी दोनों दिन व्रत रखा और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित किया।
उसी क्षण ललित का पाप दूर हो गया और उसे अपना गंधर्व रूप फिर मिल गया। दोनों पहले से भी अधिक सुंदर होकर विमान पर चढ़कर चले गए। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि यह व्रत राक्षस-दशा जैसे पापों को भी दूर करता है, और इसे पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
ललित को गंधर्व रूप फिर मिला और दोनों विमान से चले गए। फलश्रुति इस व्रत से पाप-नाश की बात कहती है।
मंत्र एवं स्तोत्र
विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
