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पाठ/कथा/Vishnu
Vishnu · व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत कथा

भीमसेन को व्यास जी का उत्तर: वर्ष की एक निर्जल एकादशी — पद्म पुराण से

पारंपरिक माहात्म्यपद्म पुराण · उत्तर खण्ड
देवता:विष्णु

इस कथा के बारे में

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी की यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के अध्याय 51 में है, जहाँ व्यास जी भीमसेन को उत्तर देते हैं। इस अध्याय में अगले दिन को पांडव-द्वादशी कहा गया है; भीमसेनी एकादशी का प्रचलित नाम इसमें नहीं आता, और भीम के मूर्छित होने का प्रसंग भी इसमें नहीं है।

↓ पूजन सामग्री↓ पूजन विधि↓ सम्पूर्ण कथा↓ मंत्र↓ आरती↓ तीर्थ
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पूजन सामग्री

॰भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र या प्रतिमा
॰तुलसी दल (एकादशी से पहले तोड़े हुए)
॰फूल और माला
॰घी का दीपक और धूप
॰द्वादशी के लिए फल और अन्न रहित नैवेद्य
॰रोली या चंदन
॰द्वादशी दान के लिए जल से भरा घड़ा और शक्कर, जहाँ यह परंपरा प्रचलित हो
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पूजन विधि(एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक / From sunrise on Ekadashi to sunrise on Dwadashi)

1

अध्याय के अनुसार: एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक बिना अन्न और जल के उपवास।

2

अध्याय के अनुसार: बाद के संकल्प-वचन में केवल घूँट भर जल लेने की छूट का उल्लेख आता है।

3

अध्याय के अनुसार: चंदन, धूप, फूल और वस्त्र से भगवान विष्णु की पूजा करें।

4

अध्याय के अनुसार: द्वादशी को जल से भरा घड़ा, शक्कर सहित, और सामर्थ्य हो तो स्वर्ण, वस्त्र, छाता या जूते दान करें; ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करें।

5

रीति: निर्जल व्रत कठिन हो सकता है, विशेषकर गर्मी के मौसम में। उपवास का रूप अपनी आयु, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थिति के अनुसार तय करें; आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

6

पारण: अध्याय के अनुसार द्वादशी की सुबह स्नान और दान के बाद व्रत खोला जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।

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सम्पूर्ण कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसके विषय में सत्यवती के पुत्र व्यास जी बताएँगे, जो शास्त्रों का सार जानते हैं। तब युधिष्ठिर ने व्यास जी से पूछा कि भगवान विष्णु के भक्तों के धर्म क्या हैं।

श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने व्यास जी से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी और विष्णु भक्तों के धर्म के बारे में पूछा।

व्यास जी ने कहा कि मनु और वसिष्ठ के बताए धर्म कलियुग में निभाना कठिन है, पर एकादशी का व्रत सरल है; इसमें धन और परिश्रम कम लगता है और फल बड़ा मिलता है। दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें, ब्राह्मण का सत्कार करें और फिर भोजन करें।

व्यास जी ने कहा कि एकादशी का व्रत सरल है: दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करें और द्वादशी को पूजा के बाद भोजन करें।

यह सुनकर भीमसेन पीपल के पत्ते की तरह काँप उठे। उन्होंने व्यास जी से कहा कि युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव एकादशी को कभी भोजन नहीं करते और मुझसे भी यही कहते हैं। पर मुझसे भूख सही नहीं जाती। मैं विधिपूर्वक दान दूँगा और भगवान विष्णु की पूजा करूँगा, पर उपवास मुझसे नहीं होगा।

भीमसेन ने कहा कि सब भाई और माता एकादशी का व्रत रखते हैं, पर मुझसे भूख सही नहीं जाती।

व्यास जी ने कहा कि यदि स्वर्ग चाहते हो और नरक से डरते हो, तो दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन मत करो। भीम ने कहा कि मैं तो दिन में एक बार खाकर भी नहीं रह सकता। मेरे पेट में वृक नाम की अग्नि सदा जलती रहती है, जो बार-बार खाने से ही शांत होती है। मुझे कोई एक ऐसा व्रत बताइए जिससे मुझे स्वर्ग मिल जाए।

भीम ने कहा कि पेट की वृक नाम की अग्नि के कारण मैं उपवास नहीं कर सकता; मुझे कोई एक व्रत बताइए।

तब व्यास जी ने कहा कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना जल के उपवास करो। उस दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक न भोजन करो, न जल पियो; जल का एक घूँट भी व्रत तोड़ देता है। द्वादशी की सुबह स्नान करके ब्राह्मणों को जल और स्वर्ण का दान दो और फिर उनके साथ भोजन करो। कथा के अनुसार इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिलता है।

व्यास जी ने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को सूर्योदय से सूर्योदय तक निर्जल उपवास बताया, जिससे वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिलता है।

भीमसेन ने यह व्रत किया। तभी से, कथा कहती है, यह द्वादशी पांडव-द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि जो इस एकादशी को बिना जल के उपवास करता है और जल से भरे घड़े का दान देता है, वह पापों से छूटकर भगवान विष्णु के धाम को जाता है।

भीमसेन ने यह व्रत किया, और यह द्वादशी पांडव-द्वादशी कहलाई।

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मंत्र एवं स्तोत्र

मंत्र

विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)

पाठ →

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

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आरती

मुख्य आरती

ॐ जय जगदीश हरे

पूरी आरती →

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे संपूर्ण जगत् के स्वामी ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के कष्टों तथा संकटों को एक क्षण में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

जो आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और उसके मन का दुख दूर हो जाता है। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप ही मेरे माता और पिता हैं, मैं आपके सिवा किसकी शरण में जाऊं? आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई आशा रखूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप परिपूर्ण परमात्मा और सभी के हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दया और करुणा के सागर हैं तथा संपूर्ण जगत् के पालनहार हैं। मैं अज्ञानता और कामनाओं से घिरा हुआ हूँ, हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं और सभी जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु प्रभु! मुझ जैसा सीमित बुद्धि वाला जीव आपको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

दीन-बंधु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दीनों के बंधु और दुखों का हरण करने वाले मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अपना कृपाहस्त उठाकर मुझे संभालिए।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे देव! मेरे मन के विषय-विकारों और पापों को नष्ट कर दीजिए। मेरे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सत्पुरुषों की सेवा की भावना को बढ़ाइए।

तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मेरा शरीर, मन और धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। जो आपका है, वही आपको समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना क्या है?

अन्य आरतियाँ

ॐ जय तुलसी माता

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ॐ जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। सब विधि कर कल्याण, जन सुख दाता॥ ॐ जय तुलसी माता॥

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