भीमसेन को व्यास जी का उत्तर: वर्ष की एक निर्जल एकादशी — पद्म पुराण से
इस कथा के बारे में
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी की यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के अध्याय 51 में है, जहाँ व्यास जी भीमसेन को उत्तर देते हैं। इस अध्याय में अगले दिन को पांडव-द्वादशी कहा गया है; भीमसेनी एकादशी का प्रचलित नाम इसमें नहीं आता, और भीम के मूर्छित होने का प्रसंग भी इसमें नहीं है।
पूजन सामग्री
पूजन विधि(एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक / From sunrise on Ekadashi to sunrise on Dwadashi)
अध्याय के अनुसार: एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक बिना अन्न और जल के उपवास।
अध्याय के अनुसार: बाद के संकल्प-वचन में केवल घूँट भर जल लेने की छूट का उल्लेख आता है।
अध्याय के अनुसार: चंदन, धूप, फूल और वस्त्र से भगवान विष्णु की पूजा करें।
अध्याय के अनुसार: द्वादशी को जल से भरा घड़ा, शक्कर सहित, और सामर्थ्य हो तो स्वर्ण, वस्त्र, छाता या जूते दान करें; ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर स्वयं भोजन करें।
रीति: निर्जल व्रत कठिन हो सकता है, विशेषकर गर्मी के मौसम में। उपवास का रूप अपनी आयु, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत परिस्थिति के अनुसार तय करें; आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय सलाह लें।
पारण: अध्याय के अनुसार द्वादशी की सुबह स्नान और दान के बाद व्रत खोला जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।
सम्पूर्ण कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसके विषय में सत्यवती के पुत्र व्यास जी बताएँगे, जो शास्त्रों का सार जानते हैं। तब युधिष्ठिर ने व्यास जी से पूछा कि भगवान विष्णु के भक्तों के धर्म क्या हैं।
श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने व्यास जी से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी और विष्णु भक्तों के धर्म के बारे में पूछा।
व्यास जी ने कहा कि मनु और वसिष्ठ के बताए धर्म कलियुग में निभाना कठिन है, पर एकादशी का व्रत सरल है; इसमें धन और परिश्रम कम लगता है और फल बड़ा मिलता है। दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें, ब्राह्मण का सत्कार करें और फिर भोजन करें।
व्यास जी ने कहा कि एकादशी का व्रत सरल है: दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करें और द्वादशी को पूजा के बाद भोजन करें।
यह सुनकर भीमसेन पीपल के पत्ते की तरह काँप उठे। उन्होंने व्यास जी से कहा कि युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव एकादशी को कभी भोजन नहीं करते और मुझसे भी यही कहते हैं। पर मुझसे भूख सही नहीं जाती। मैं विधिपूर्वक दान दूँगा और भगवान विष्णु की पूजा करूँगा, पर उपवास मुझसे नहीं होगा।
भीमसेन ने कहा कि सब भाई और माता एकादशी का व्रत रखते हैं, पर मुझसे भूख सही नहीं जाती।
व्यास जी ने कहा कि यदि स्वर्ग चाहते हो और नरक से डरते हो, तो दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन मत करो। भीम ने कहा कि मैं तो दिन में एक बार खाकर भी नहीं रह सकता। मेरे पेट में वृक नाम की अग्नि सदा जलती रहती है, जो बार-बार खाने से ही शांत होती है। मुझे कोई एक ऐसा व्रत बताइए जिससे मुझे स्वर्ग मिल जाए।
भीम ने कहा कि पेट की वृक नाम की अग्नि के कारण मैं उपवास नहीं कर सकता; मुझे कोई एक व्रत बताइए।
तब व्यास जी ने कहा कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना जल के उपवास करो। उस दिन एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक न भोजन करो, न जल पियो; जल का एक घूँट भी व्रत तोड़ देता है। द्वादशी की सुबह स्नान करके ब्राह्मणों को जल और स्वर्ण का दान दो और फिर उनके साथ भोजन करो। कथा के अनुसार इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिलता है।
व्यास जी ने ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को सूर्योदय से सूर्योदय तक निर्जल उपवास बताया, जिससे वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिलता है।
भीमसेन ने यह व्रत किया। तभी से, कथा कहती है, यह द्वादशी पांडव-द्वादशी के नाम से प्रसिद्ध हुई। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि जो इस एकादशी को बिना जल के उपवास करता है और जल से भरे घड़े का दान देता है, वह पापों से छूटकर भगवान विष्णु के धाम को जाता है।
भीमसेन ने यह व्रत किया, और यह द्वादशी पांडव-द्वादशी कहलाई।
मंत्र एवं स्तोत्र
विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
आरती
अन्य आरतियाँ
