तुलसी और भगवान विष्णु की दो पौराणिक कथाएँ, अलग-अलग: वृंदा और जालंधर, तथा तुलसी और शंखचूड़
पूजन सामग्री
पूजन विधि(शाम को, परंपरा के अनुसार / In the evening, by custom)
रीति: शाम को तुलसी के पौधे को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, और शालिग्राम या भगवान विष्णु की प्रतिमा को वर के रूप में पास रखा जाता है।
रीति: छोटा मंडप बनाया जाता है, प्रायः गन्ने का; दीपक जलाया जाता है, और फूल, फल तथा मिठाई अर्पित की जाती है।
रीति: विवाह की तरह दोनों को मौली या माला से जोड़ा जाता है, मंगल गीत गाए जाते हैं और कथा सुनी जाती है।
रीति: अंत में आरती होती है और प्रसाद बाँटा जाता है। यह विधि क्षेत्र और परिवार के अनुसार बहुत बदलती है।
तिथि: परंपरा से तुलसी विवाह प्रबोधिनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा के बीच किया जाता है; बहुत से लोग एकादशी या द्वादशी को करते हैं। अपनी परंपरा का दिन पंचांग में देखें।
सम्पूर्ण कथा
समुद्र के पुत्र कहे जाने वाले जालंधर की पत्नी वृंदा पतिव्रता थी। कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने उसका व्रत भंग करने का निश्चय किया। वृंदा ने अशुभ स्वप्न देखे: उसने अपने पति को भैंसे पर दक्षिण दिशा की ओर जाते और अपनी नगरी को डूबते देखा। वह भयभीत होकर वन की ओर चली गई, जहाँ दो राक्षसों ने उसे डराया, पर एक मुनि ने उन्हें वहाँ से भगा दिया।
पतिव्रता वृंदा ने अशुभ स्वप्न देखे और भयभीत होकर वन में गई, जहाँ एक मुनि ने उसे राक्षसों से बचाया।
वन में दो वानर जालंधर का कटा हुआ सिर और शरीर लेकर आए। वृंदा के कहने पर मुनि ने कहा कि वे उसे जीवित कर देंगे और अंतर्धान हो गए; तभी जालंधर वहाँ प्रकट हुआ। वृंदा उसे अपना पति समझकर कुछ समय वन में उसके साथ रही। बाद में उसे पता चला कि वह वास्तव में भगवान विष्णु थे।
मुनि के अंतर्धान होते ही जालंधर प्रकट हुआ; वृंदा उसे पति समझकर साथ रही, फिर जाना कि वह भगवान विष्णु थे।
वृंदा ने भगवान विष्णु को शाप दिया कि जो दो द्वारपाल तुमने मुझे दिखाए, वे राक्षस बनकर तुम्हारी पत्नी का हरण करेंगे, और तुम उसके वियोग में वन-वन भटकोगे, जहाँ वानर तुम्हारी सहायता करेंगे। इसके बाद, भगवान के रोकने पर भी, वृंदा अग्नि में प्रवेश कर गई।
वृंदा ने शाप दिया कि विष्णु की पत्नी का हरण होगा और वे वानरों की सहायता से वन में भटकेंगे; फिर वह अग्नि में प्रवेश कर गई।
भगवान विष्णु वृंदा की चिता की भस्म से ढके हुए वहीं रह गए, और किसी के समझाने पर भी उन्हें शांति नहीं मिली। उधर भगवान शिव ने चक्र से जालंधर का सिर काट दिया, और उसका तेज भगवान शिव में समा गया।
विष्णु वृंदा की चिता की भस्म लगाए वहीं रहे; शिव ने चक्र से जालंधर का वध किया।
देवताओं ने भगवान शिव को भगवान विष्णु की दशा बताई। शिव के कहने पर उन्होंने मूल प्रकृति की स्तुति की, जिन्होंने उन्हें गौरी, लक्ष्मी और स्वरा के पास भेजा। इन तीनों ने बीज दिए और कहा कि इन्हें वहाँ बो दो जहाँ विष्णु हैं। उन बीजों से तीन पौधे उत्पन्न हुए: धात्री, मालती और तुलसी।
गौरी, लक्ष्मी और स्वरा के दिए बीजों से धात्री, मालती और तुलसी उत्पन्न हुईं।
तुलसी और धात्री को देखकर भगवान विष्णु का दुःख दूर हुआ और वे उन दोनों के साथ वैकुंठ चले गए। पद्म पुराण के इसी प्रसंग में कार्तिक व्रत की समाप्ति पर तुलसी की जड़ में भगवान विष्णु की पूजा का वर्णन है।
विष्णु का दुःख दूर हुआ और वे धात्री तथा तुलसी के साथ वैकुंठ गए।
राजा धर्मध्वज और माधवी की पुत्री तुलसी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ। उन्होंने भगवान नारायण को पति रूप में पाने की इच्छा से बदरी वन में बहुत लंबे समय तक तपस्या की।
धर्मध्वज की पुत्री तुलसी ने नारायण को पति रूप में पाने के लिए बदरी वन में तपस्या की।
कथा के अनुसार तुलसी पूर्वजन्म में गोलोक की एक गोपी थीं और राधा के शाप से पृथ्वी पर जन्मी थीं। ब्रह्मा ने उन्हें बताया कि शंखचूड़ भी पूर्वजन्म में गोलोक का गोप सुदामा था, और यह कि वे पहले उसकी पत्नी बनेंगी और बाद में भगवान नारायण की।
तुलसी और शंखचूड़ दोनों पूर्वजन्म में गोलोक में थे; ब्रह्मा ने कहा कि तुलसी पहले शंखचूड़ की और फिर नारायण की पत्नी बनेंगी।
ब्रह्मा की आज्ञा से शंखचूड़ बदरी वन पहुँचा। ब्रह्मा ने दोनों को गांधर्व विधि से विवाह करने को कहा, और उनका विवाह हुआ। शंखचूड़ ने बहुत लंबे समय तक राज्य किया और देवताओं के अधिकार भी अपने हाथ में ले लिए।
ब्रह्मा के कहने पर तुलसी और शंखचूड़ का गांधर्व विवाह हुआ; शंखचूड़ ने देवताओं के अधिकार ले लिए।
देवता ब्रह्मा के पास गए, ब्रह्मा उन्हें भगवान शिव के पास ले गए, और शिव उन्हें वैकुंठ में भगवान विष्णु के पास ले गए। भगवान ने बताया कि शंखचूड़ को उसके कवच के रहते नहीं मारा जा सकता, और ब्रह्मा के वरदान के कारण उसकी मृत्यु तभी होगी जब उसकी पत्नी का पातिव्रत्य भंग हो।
भगवान विष्णु ने बताया कि कवच के रहते और पत्नी के पातिव्रत्य के रहते शंखचूड़ नहीं मारा जा सकता।
भगवान शिव और शंखचूड़ के बीच सौ वर्ष तक युद्ध हुआ, पर कोई नहीं जीता। तब भगवान विष्णु ने वृद्ध ब्राह्मण का रूप लेकर शंखचूड़ से उसका कवच माँग लिया, और फिर शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी के पास पहुँचे।
विष्णु ने ब्राह्मण बनकर शंखचूड़ का कवच माँगा, फिर शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी के पास गए।
उसी समय भगवान शिव के त्रिशूल से शंखचूड़ भस्म हो गया। मृत्यु के बाद वह गोप रूप में गोलोक चला गया, और उसकी अस्थियाँ शंख बन गईं।
शिव के त्रिशूल से शंखचूड़ का अंत हुआ; वह गोलोक गया और उसकी अस्थियाँ शंख बन गईं।
तुलसी ने पहचान लिया कि जो उनके सामने है वह उनका पति नहीं, भगवान नारायण हैं। उन्होंने भगवान को पत्थर हो जाने का शाप दिया। तब भगवान ने उनसे कहा कि दिव्य शरीर धारण करके मुझसे विवाह करो। कथा के अनुसार उनका शरीर गंडकी नदी बना, उनके केशों से तुलसी का पौधा हुआ, और भगवान गंडकी के तट पर शालिग्राम शिला के रूप में स्थित हुए।
तुलसी ने नारायण को पत्थर होने का शाप दिया; उनका शरीर गंडकी नदी, केश तुलसी का पौधा और भगवान शालिग्राम शिला बने।
इसके बाद तुलसी भगवान के साथ वैकुंठ चली गईं। इसी प्रसंग में तुलसी दल को शालिग्राम से अलग करना दोष बताया गया है।
तुलसी भगवान के साथ वैकुंठ गईं; तुलसी दल को शालिग्राम से अलग करना दोष कहा गया है।
तुलसी विवाह से एक से अधिक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हैं, और यहाँ दो कथाएँ अलग-अलग दी गई हैं। प्रचलित कथाओं में इन दोनों के प्रसंग अक्सर एक-दूसरे में मिला दिए जाते हैं। पर इन ग्रंथों में दोनों कथाएँ अलग हैं: वृंदा और जालंधर की कथा में विष्णु को पत्थर होने का शाप नहीं है, जबकि तुलसी और शंखचूड़ की कथा में तुलसी का यह शाप और शालिग्राम की उत्पत्ति दोनों हैं। दोनों में से किसी कथा में विवाह की तिथि नहीं दी गई है।
पत्थर होने का शाप और शालिग्राम तुलसी-शंखचूड़ की कथा में हैं, वृंदा-जालंधर की कथा में नहीं; प्रचलित कथाएँ दोनों को मिला देती हैं।
आरती
अन्य आरतियाँ
