ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
dhyāyennityaṁ maheśaṁ rajatagirinibhaṁ cārucandrāvataṁsaṁ ratnākalpojjvalāṅgaṁ paraśumṛgavarābhītihastaṁ prasannam | padmāsīnaṁ samantāt stutamamaragaṇairvyāghrakṛttiṁ vasānaṁ viśvādyaṁ viśvabījaṁ nikhilabhayaharaṁ pañcavaktraṁ trinetram ||
भावार्थ: जो चांदी के पर्वत के समान कांतिमान हैं, जिनके मस्तक पर सुंदर चंद्रमा सुशोभित है, जो हाथ में परशु और मृग धारण किए अभय और वरद मुद्रा में हैं, व्याघ्रचर्मधारी, समस्त भयों को हरने वाले उन पंचमुख त्रिनेत्र महादेव का नित्य ध्यान करें।
स्रोत: Shiva Dhyanam (Puranic Liturgy)