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पाठ/कथा/Vishnu
Vishnu · व्रत कथा

योगिनी एकादशी व्रत कथा

यक्ष हेममाली, कुबेर के शाप और मार्कंडेय मुनि की कथा — पद्म पुराण से

पारंपरिक माहात्म्यपद्म पुराण · उत्तर खण्ड
देवता:विष्णु

इस कथा के बारे में

आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी की यह कथा पद्म पुराण के उत्तर खण्ड के अध्याय 52 में है, जिसे श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं। इस अध्याय में हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी है; कई हिंदी पुस्तकों में उसे स्वरूपवती कहा गया है। अध्याय में उसके रोगमुक्त होने की बात है, अलका लौटने का वर्णन नहीं है।

↓ पूजन सामग्री↓ पूजन विधि↓ सम्पूर्ण कथा↓ मंत्र↓ आरती↓ तीर्थ
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पूजन सामग्री

॰भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र या प्रतिमा
॰तुलसी दल (एकादशी से पहले तोड़े हुए)
॰फूल और माला
॰घी का दीपक और धूप
॰फल, और अन्न रहित नैवेद्य
॰रोली या चंदन
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पूजन विधि(एकादशी से द्वादशी के पारण तक / From Ekadashi until the parana on Dwadashi)

1

अध्याय के अनुसार: योगिनी व्रत आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। अध्याय में इससे आगे कोई विधि नहीं दी गई है।

2

रीति: तुलसी, फूल, दीपक और नैवेद्य से भगवान विष्णु की पूजा, और कथा सुनना।

3

रीति: व्रत का प्रकार परिवार और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है। एकादशी को चावल और अन्न न खाना प्रचलित रीति है; इस अध्याय में यह नहीं कहा गया।

4

रीति: यह पारंपरिक धार्मिक कथा है। किसी बीमारी या त्वचा-सम्बंधी समस्या के लिए चिकित्सकीय सलाह और उपचार लें।

5

पारण: व्रत का पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि के रहते किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।

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सम्पूर्ण कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम क्या है। श्रीकृष्ण ने कहा कि इसका नाम योगिनी है, और इसकी एक कथा सुनाई।

श्रीकृष्ण ने बताया कि आषाढ़ कृष्ण एकादशी का नाम योगिनी है, और उसकी कथा सुनाई।

अलका नगरी में यक्षों के राजा कुबेर रहते थे, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। हेममाली नाम का एक यक्ष उनका सेवक था, जिसका काम उनके लिए फूल लाना था। वह मानसरोवर से फूल लाकर कुबेर को देता, जिनसे वे शिव की पूजा करते थे। हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था, और वह बहुत सुंदर थी।

कुबेर का सेवक यक्ष हेममाली उनकी शिव पूजा के लिए मानसरोवर से फूल लाता था; उसकी पत्नी विशालाक्षी थी।

एक दिन हेममाली फूल तो ले आया, पर पत्नी के प्रेम में डूबकर घर पर ही रह गया और कुबेर के पास नहीं गया। उधर कुबेर मंदिर में शिव की पूजा कर रहे थे और दोपहर तक फूलों की प्रतीक्षा करते रहे। देर होने पर क्रोधित होकर उन्होंने यक्षों को भेजा। यक्षों ने लौटकर बताया कि हेममाली अपनी पत्नी के साथ घर पर है। कुबेर ने उसे बुलवाया, और हेममाली बिना स्नान किए, डरता हुआ, उनके सामने आ खड़ा हुआ।

एक दिन हेममाली पत्नी के प्रेम में घर पर ही रह गया और कुबेर पूजा के लिए फूलों की प्रतीक्षा करते रहे।

कुबेर ने कहा कि तूने भगवान शिव का अनादर किया है। उन्होंने शाप दिया कि तू अपनी पत्नी से अलग हो जाएगा, तुझे अठारह प्रकार के कोढ़ होंगे और तू इस स्थान से गिर जाएगा। हेममाली वहाँ से गिर पड़ा और रोग से पीड़ित होकर भटकने लगा। उसे न दिन में सुख था, न रात में नींद। पर शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मृति बनी रही। भटकते हुए वह हिमालय पर पहुँचा, जहाँ उसे मार्कंडेय मुनि मिले।

कुबेर के शाप से हेममाली पत्नी से बिछुड़ गया और रोगी होकर भटकता हुआ हिमालय पर मार्कंडेय मुनि के पास पहुँचा।

हेममाली ने दूर से ही काँपते हुए मुनि के चरणों में प्रणाम किया। मुनि ने उसे पास बुलाकर पूछा कि तुम्हें यह रोग कैसे हुआ। हेममाली ने सच-सच बता दिया कि मैं कुबेर का सेवक हूँ और रोज़ उनकी शिव पूजा के लिए कमल लाता था; एक दिन पत्नी के मोह में समय का ध्यान न रहा और कुबेर ने मुझे शाप दे दिया। अब आप ही कोई उपाय बताइए।

हेममाली ने मुनि को सच-सच अपनी भूल और कुबेर के शाप की बात बताई और उपाय पूछा।

मार्कंडेय मुनि ने कहा कि तुमने सच बोला है, झूठ नहीं कहा, इसलिए मैं तुम्हें एक शुभ व्रत बताता हूँ। आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत करो। हेममाली ने मुनि को दंडवत प्रणाम किया और उनके कहे अनुसार व्रत किया। उसके अठारहों प्रकार के कोढ़ पूरी तरह दूर हो गए और वह सुखी हो गया। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि इस व्रत का पुण्य अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है।

सच बोलने से प्रसन्न होकर मुनि ने योगिनी एकादशी का व्रत बताया; व्रत करने पर हेममाली रोगमुक्त और सुखी हो गया।

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मंत्र एवं स्तोत्र

मंत्र

विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)

पाठ →

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

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आरती

मुख्य आरती

ॐ जय जगदीश हरे

पूरी आरती →

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे संपूर्ण जगत् के स्वामी ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के कष्टों तथा संकटों को एक क्षण में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

जो आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और उसके मन का दुख दूर हो जाता है। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप ही मेरे माता और पिता हैं, मैं आपके सिवा किसकी शरण में जाऊं? आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई आशा रखूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप परिपूर्ण परमात्मा और सभी के हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दया और करुणा के सागर हैं तथा संपूर्ण जगत् के पालनहार हैं। मैं अज्ञानता और कामनाओं से घिरा हुआ हूँ, हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं और सभी जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु प्रभु! मुझ जैसा सीमित बुद्धि वाला जीव आपको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

दीन-बंधु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दीनों के बंधु और दुखों का हरण करने वाले मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अपना कृपाहस्त उठाकर मुझे संभालिए।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे देव! मेरे मन के विषय-विकारों और पापों को नष्ट कर दीजिए। मेरे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सत्पुरुषों की सेवा की भावना को बढ़ाइए।

तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मेरा शरीर, मन और धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। जो आपका है, वही आपको समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना क्या है?

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संबंधित तीर्थ एवं मंदिर