गोवर्धन पूजा क्या है?
गोवर्धन पूजा, जिसे अन्नकूट भी कहा जाता है, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाई जाती है। यह पाँच दिनों के दीपोत्सव का चौथा दिन है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा ब्रजवासियों और पशुधन को मूसलाधार वर्षा से बचाने के लिए अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाने की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन घर के आंगन में गाय के गोबर या मिट्टी से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है, फूलों से सजाकर उसकी परिक्रमा की जाती है और भगवान को विविध प्रकार के अन्न व व्यंजनों (छप्पन भोग) का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। गुजरात में इस दिन से नववर्ष (बेस्तु वरस) शुरू होता है, जबकि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इसे बलि प्रतिपदा के रूप में मनाया जाता है।
यह क्यों मनाया जाता है?
श्रीमद्भागवत (10.24–27) के अनुसार, श्रीकृष्ण ने देखा कि ब्रज के ग्वाले वर्षा के देवता इंद्र के वार्षिक यज्ञ की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने पिता नंदबाबा और बड़ों को समझाया कि हमारी जीविका गायों, वनों और गोवर्धन पर्वत से चलती है, जो चारा और जल देते हैं; तब ब्रजवासियों ने गोवर्धन की पूजा की। इससे रुष्ट होकर इंद्र ने सांवर्तक मेघों से ब्रज पर घोर वर्षा कराई। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को उठाकर सात दिनों तक एक हाथ पर धारण किए रखा और लोगों तथा पशुओं को उसके नीचे आश्रय दिया; परंपरा और चित्रों में इसे बाएं हाथ की छोटी उंगली पर दिखाया जाता है। अंत में इंद्र का अभिमान टूटा और उन्होंने सुरभि गाय के साथ आकर भगवान की स्तुति की।
इसे कैसे मनाया जाता है?
सुबह घर के आंगन में गाय के गोबर या मिट्टी से गोवर्धन जी की प्रतिमा बनाई जाती है, जिसे फूलों, दीयों और आकृतियों से सजाया जाता है। परिवार के सदस्य धूप, दीप, दूध और जल अर्पित करते हुए गोवर्धन जी की परिक्रमा करते हैं। इस दिन का मुख्य अंग अन्नकूट है, जिसमें विभिन्न प्रकार के अन्न, शाक-सब्जियां, कढ़ी, पूड़ी और मिठाइयों के ढेर भगवान को अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें बाद में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। गायों और बछड़ों को नहलाकर उनके सींगों पर हल्दी लगाई जाती है, माला पहनाई जाती है और उन्हें गुड़ व हरी घास खिलाई जाती है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत में इस दिन बलि पूजा की परंपरा भी निभाई जाती है।
यह कब मनाया जाता है?
गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, परंपरा से सुबह के समय की जाती है; कुछ पंचांग शाम का समय भी देते हैं। सामान्यतः यह दिवाली के अगले दिन पड़ती है। जब अमावस्या अगले दिन तक चलती है और प्रतिपदा देर से शुरू होती है, तब पूजा एक दिन और आगे हो जाती है, इसलिए कुछ वर्षों में दिवाली और गोवर्धन पूजा के बीच एक दिन का अंतर रहता है। इस पर पंचांगों में भेद हो सकता है, इसलिए अपने परिवार के पंचांग के अनुसार चलें।
मुख्य बातें
गोवर्धन पर्वत धारण
ब्रजवासियों और पशुओं को वर्षा से बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सात दिनों तक गोवर्धन धारण करने की स्मृति।
अन्नकूट एवं छप्पन भोग
प्रकृति और अन्नदाता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए विविध अन्न, पकवानों और मिठाइयों का भव्य नैवेद्य।
गो-पूजन की परंपरा
गायों और बछड़ों को नहलाकर, सजाकर और प्रेमपूर्वक भोजन कराकर उनके प्रति आभार व्यक्त करने की सुंदर परंपरा।
विविध क्षेत्रीय उत्सव
गुजरात में नववर्ष (बेस्तु वरस) के रूप में, और महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में बलि प्रतिपदा के रूप में उत्साह से मनाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोवर्धन पूजा और अन्नकूट में क्या अंतर है?
ये दोनों एक ही उत्सव के दो पहलू हैं। गोवर्धन पूजा में गोवर्धन पर्वत और गायों की पूजा व परिक्रमा की जाती है, जबकि अन्नकूट उस परंपरा को कहते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण को विविध प्रकार के अन्न, शाक-सब्जियों और मिठाइयों का विशाल भोग लगाया जाता है।
गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन पर्वत क्यों बनाया जाता है?
भारतीय परंपरा में गाय के गोबर को अत्यंत पवित्र और भूमि की उर्वरता से जुड़ा माना जाता है। चूंकि यह त्योहार पशुधन और ग्रामीण जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने का है, इसलिए गोबर से गोवर्धन बनाकर सीधे प्रकृति और गायों से जुड़ने की परंपरा चली आ रही है।
गोवर्धन पूजा के दिन गायों की पूजा क्यों की जाती है?
भगवान श्रीकृष्ण ब्रज के ग्वालों के बीच बड़े हुए और गोपाल कहलाते हैं। भागवत में वे ग्वालों से कहते हैं कि गो-पालन ही उनकी अपनी वृत्ति है और गायें तथा गोवर्धन ही उनका पालन करते हैं, इसलिए यह दिन गायों के प्रति कृतज्ञता के साथ मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा कभी-कभी दिवाली के तुरंत अगले दिन न होकर एक दिन बाद क्यों पड़ती है?
गोवर्धन पूजा कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के अनुसार होती है। जब दिवाली के अगले दिन तक अमावस्या चलती है और प्रतिपदा देर से शुरू होती है, तब पूजा उसके अगले दिन की जाती है और बीच में एक दिन का अंतर रह जाता है। इस पृष्ठ पर दी गई तिथि इस वर्ष के लिए जाँची हुई है; पंचांगों में भेद हो सकता है, इसलिए अपने परिवार के पंचांग के अनुसार चलें।
बलि प्रतिपदा क्या है और इसका इस दिन से क्या संबंध है?
महाराष्ट्र, कर्नाटक और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह दिन राजा बलि की स्मृति में मनाया जाता है, जिन्हें भगवान वामन ने पाताल का राज्य दिया और, परंपरा के अनुसार, वर्ष में एक बार पृथ्वी पर आने की अनुमति दी। उत्तर भारत में जहाँ श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला प्रमुख है, वहीं इन क्षेत्रों में राजा बलि का स्वागत किया जाता है; गुजरात में इसी दिन से नववर्ष शुरू होता है।
