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पाठ/कथा/Vishnu & Krishna
Vishnu & Krishna · व्रत कथा

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

राजा वैखानस, पर्वत मुनि और पिता की मुक्ति की कथा — पद्म पुराण से

पारंपरिक माहात्म्यपद्म पुराण · उत्तर खण्ड

इस कथा के बारे में

इस अध्याय में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछते हैं। श्रीकृष्ण उसका नाम मोक्षदा बताते हैं और राजा वैखानस की कथा सुनाते हैं।

↓ पूजन सामग्री↓ पूजन विधि↓ सम्पूर्ण कथा↓ मंत्र↓ आरती↓ तीर्थ
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पूजन सामग्री

॰भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का चित्र या प्रतिमा
॰तुलसी की मंजरी या दल (एकादशी से पहले तोड़े हुए)
॰फूल और माला
॰घी का दीपक और धूप
॰फल, और अन्न रहित नैवेद्य
॰रोली या चंदन
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पूजन विधि(एकादशी से द्वादशी के पारण तक / From Ekadashi until the parana on Dwadashi)

1

अध्याय के अनुसार: तुलसी की मंजरी से भगवान दामोदर की पूजा करें।

2

अध्याय के अनुसार: रात में भजन-कीर्तन और स्तुति के साथ जागरण करें।

3

अध्याय के अनुसार: व्रत का पुण्य दिवंगत पिता या पितरों को अर्पित किया जा सकता है।

4

रीति: व्रत का प्रकार परिवार और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।

5

रीति: एकादशी को चावल और अन्न न खाना प्रचलित रीति है; इस अध्याय में यह नहीं कहा गया।

6

पारण: व्रत का पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि के रहते किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।

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सम्पूर्ण कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन-सी है, उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा की जाती है। श्रीकृष्ण ने बताया कि इसका नाम मोक्षदा है, और इसकी एक पुरानी कथा सुनाई।

युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का नाम मोक्षदा बताया और उसकी कथा सुनाई।

चंपक नाम का एक नगर था, जहाँ बहुत-से विष्णु भक्त और वेदों के जानकार ब्राह्मण रहते थे। वहाँ वैखानस नाम के राजा राज करते थे, जो अपनी प्रजा को पुत्र की तरह पालते थे। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके पितर नीच योनि में पड़े हुए हैं।

चंपक नगर के राजा वैखानस ने स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में देखा।

सुबह राजा ने ब्राह्मणों को स्वप्न सुनाया। उन्होंने कहा कि मैंने अपने पितरों को नरक में देखा और वे मुझसे कह रहे थे कि हमें यहाँ से निकालो। तब से मुझे राज्य, हाथी, घोड़े, पत्नी और पुत्र, किसी में सुख नहीं मिलता। मुझे बताइए कि किस व्रत या तप से मेरे पितर मुक्त होंगे।

राजा ने ब्राह्मणों को स्वप्न सुनाया और पूछा कि किस व्रत से पितर मुक्त होंगे।

ब्राह्मणों ने कहा कि पास ही पर्वत मुनि का आश्रम है, जो भूत और भविष्य को जानते हैं; उनके पास जाइए। राजा तुरंत वहाँ गए। आश्रम में पर्वत मुनि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के जानकार मुनियों के बीच बैठे थे। राजा ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया, और मुनि ने राज्य का कुशल पूछा।

ब्राह्मणों के कहने पर राजा पर्वत मुनि के आश्रम गए और उन्हें प्रणाम किया।

राजा ने कहा कि राज्य में सब कुशल है, पर मैंने स्वप्न में अपने पितरों को नरक में देखा है; बताइए कि किस पुण्य से उनका उद्धार होगा। पर्वत मुनि ने कुछ देर आँखें बंद करके ध्यान किया। फिर उन्होंने बताया कि राजा के पिता ने, राज्य के अभिमान में, अपनी पत्नी को ऋतुकाल में छोड़ दिया और राजकार्य से एक गाँव चले गए। कथा के अनुसार इसी दोष के कारण वे और उनके पितर नरक में पड़े।

पर्वत मुनि ने ध्यान करके बताया कि राजा के पिता ने पत्नी को ऋतुकाल में छोड़ दिया था, और इसी दोष से वे नरक में पड़े।

मुनि ने कहा कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दो। राजा घर लौट आए। मार्गशीर्ष आने पर उन्होंने यह व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दिया।

मुनि के कहने पर राजा ने मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित किया।

पुण्य अर्पित करते ही आकाश से फूलों की वर्षा हुई। राजा के पिता अपने पितरों सहित मुक्त हो गए। पिता ने आकाश से पुत्र को आशीर्वाद दिया और स्वर्ग चले गए। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने वाले के पाप नष्ट होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष मिलता है, और इसे पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

राजा के पिता अपने पितरों सहित मुक्त हुए और पुत्र को आशीर्वाद देकर स्वर्ग गए। फलश्रुति इस व्रत से पाप-नाश और मोक्ष की बात कहती है।

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मंत्र एवं स्तोत्र

मंत्र

विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)

पाठ →

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

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आरती

मुख्य आरती

ॐ जय जगदीश हरे

पूरी आरती →

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे संपूर्ण जगत् के स्वामी ईश्वर! आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के कष्टों तथा संकटों को एक क्षण में दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का। स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

जो आपका ध्यान करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और उसके मन का दुख दूर हो जाता है। उसके घर में सुख-समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी। स्वामी शरण गहूं किसकी। तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप ही मेरे माता और पिता हैं, मैं आपके सिवा किसकी शरण में जाऊं? आपके अतिरिक्त मेरा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई आशा रखूं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप परिपूर्ण परमात्मा और सभी के हृदय की जानने वाले अन्तर्यामी हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर हैं और समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख खल कामी, मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दया और करुणा के सागर हैं तथा संपूर्ण जगत् के पालनहार हैं। मैं अज्ञानता और कामनाओं से घिरा हुआ हूँ, हे प्रभु! मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सब के प्राणपति। स्वामी सब के प्राणपति। किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप इन्द्रियों की पहुंच से परे (अगोचर) हैं और सभी जीवों के प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु प्रभु! मुझ जैसा सीमित बुद्धि वाला जीव आपको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है?

दीन-बंधु दुख-हर्ता, तुम ठाकुर मेरे। स्वामी तुम ठाकुर मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

आप दीनों के बंधु और दुखों का हरण करने वाले मेरे स्वामी हैं। मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ, अपना कृपाहस्त उठाकर मुझे संभालिए।

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

हे देव! मेरे मन के विषय-विकारों और पापों को नष्ट कर दीजिए। मेरे हृदय में श्रद्धा, भक्ति और सत्पुरुषों की सेवा की भावना को बढ़ाइए।

तन मन धन सब कुछ है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

मेरा शरीर, मन और धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। जो आपका है, वही आपको समर्पित करता हूँ; इसमें मेरा अपना क्या है?

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संबंधित तीर्थ एवं मंदिर