राजा वैखानस, पर्वत मुनि और पिता की मुक्ति की कथा — पद्म पुराण से
इस कथा के बारे में
इस अध्याय में युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में पूछते हैं। श्रीकृष्ण उसका नाम मोक्षदा बताते हैं और राजा वैखानस की कथा सुनाते हैं।
पूजन सामग्री
पूजन विधि(एकादशी से द्वादशी के पारण तक / From Ekadashi until the parana on Dwadashi)
अध्याय के अनुसार: तुलसी की मंजरी से भगवान दामोदर की पूजा करें।
अध्याय के अनुसार: रात में भजन-कीर्तन और स्तुति के साथ जागरण करें।
अध्याय के अनुसार: व्रत का पुण्य दिवंगत पिता या पितरों को अर्पित किया जा सकता है।
रीति: व्रत का प्रकार परिवार और संप्रदाय की परंपरा के अनुसार भिन्न हो सकता है।
रीति: एकादशी को चावल और अन्न न खाना प्रचलित रीति है; इस अध्याय में यह नहीं कहा गया।
पारण: व्रत का पारण द्वादशी को, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि के रहते किया जाता है। अपने शहर का समय पंचांग में देखें।
सम्पूर्ण कथा
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन-सी है, उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा की जाती है। श्रीकृष्ण ने बताया कि इसका नाम मोक्षदा है, और इसकी एक पुरानी कथा सुनाई।
युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का नाम मोक्षदा बताया और उसकी कथा सुनाई।
चंपक नाम का एक नगर था, जहाँ बहुत-से विष्णु भक्त और वेदों के जानकार ब्राह्मण रहते थे। वहाँ वैखानस नाम के राजा राज करते थे, जो अपनी प्रजा को पुत्र की तरह पालते थे। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके पितर नीच योनि में पड़े हुए हैं।
चंपक नगर के राजा वैखानस ने स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में देखा।
सुबह राजा ने ब्राह्मणों को स्वप्न सुनाया। उन्होंने कहा कि मैंने अपने पितरों को नरक में देखा और वे मुझसे कह रहे थे कि हमें यहाँ से निकालो। तब से मुझे राज्य, हाथी, घोड़े, पत्नी और पुत्र, किसी में सुख नहीं मिलता। मुझे बताइए कि किस व्रत या तप से मेरे पितर मुक्त होंगे।
राजा ने ब्राह्मणों को स्वप्न सुनाया और पूछा कि किस व्रत से पितर मुक्त होंगे।
ब्राह्मणों ने कहा कि पास ही पर्वत मुनि का आश्रम है, जो भूत और भविष्य को जानते हैं; उनके पास जाइए। राजा तुरंत वहाँ गए। आश्रम में पर्वत मुनि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के जानकार मुनियों के बीच बैठे थे। राजा ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया, और मुनि ने राज्य का कुशल पूछा।
ब्राह्मणों के कहने पर राजा पर्वत मुनि के आश्रम गए और उन्हें प्रणाम किया।
राजा ने कहा कि राज्य में सब कुशल है, पर मैंने स्वप्न में अपने पितरों को नरक में देखा है; बताइए कि किस पुण्य से उनका उद्धार होगा। पर्वत मुनि ने कुछ देर आँखें बंद करके ध्यान किया। फिर उन्होंने बताया कि राजा के पिता ने, राज्य के अभिमान में, अपनी पत्नी को ऋतुकाल में छोड़ दिया और राजकार्य से एक गाँव चले गए। कथा के अनुसार इसी दोष के कारण वे और उनके पितर नरक में पड़े।
पर्वत मुनि ने ध्यान करके बताया कि राजा के पिता ने पत्नी को ऋतुकाल में छोड़ दिया था, और इसी दोष से वे नरक में पड़े।
मुनि ने कहा कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दो। राजा घर लौट आए। मार्गशीर्ष आने पर उन्होंने यह व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दिया।
मुनि के कहने पर राजा ने मोक्षदा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित किया।
पुण्य अर्पित करते ही आकाश से फूलों की वर्षा हुई। राजा के पिता अपने पितरों सहित मुक्त हो गए। पिता ने आकाश से पुत्र को आशीर्वाद दिया और स्वर्ग चले गए। कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने वाले के पाप नष्ट होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष मिलता है, और इसे पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।
राजा के पिता अपने पितरों सहित मुक्त हुए और पुत्र को आशीर्वाद देकर स्वर्ग गए। फलश्रुति इस व्रत से पाप-नाश और मोक्ष की बात कहती है।
मंत्र एवं स्तोत्र
विष्णु मंत्र (शांताकारं एवं द्वादशाक्षर मंत्र)
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
